चेन्नई : आने वाले दो महीनों में पश्चिम बंगाल, असम, केरल के साथ तमिलनाडु में भी विधानसभा चुनाव होंगे। तमिलनाडु एक ऐसा राज्य है, जहां बीजेपी बड़ी ताकत नहीं बन पाई है। इस दक्षिणी राज्य में बीजेपी की परफॉर्मेंस एनडीए के सहयोगी दलों के भरोसे टिकी रही। आगामी विधानसभा चुनावों में भी बीजेपी AIADMK, पीएमके, AMMK को एनडीए के छतरी के नीचे लाने में कामयाब हो गई है। गठबंधन के जरिये बीजेपी तमिलनाडु में भी सोशल इंजीनियरिंग का वही प्रयोग आजमा रही है, जिसके आधार पर पार्टी ने बिहार में एनडीए की जीत सुनिश्चित की थी।
बिहार में सफल रहा जातिगत गठबंधन
बिहार विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने आरजेडी के MY (मुस्लिम यादव) समीकरण के सामने एनडीए में जाति आधारित नेताओं और छोटी-छोटी पार्टियों से गठबंधन किया था। चिराग पासवान और जीतन राम मांझी एनडीए के दलित चेहरे थे तो राष्ट्रीय लोक मोर्चा के उपेंद्र कुशवाहा अति पिछड़े के नुमाइंदा बने।
जेडी यू को गैर यादव ओबीसी जातियों की पार्टी भी सबसे बड़ी सहयोगी पार्टी है। बिहार में सवर्ण और बनिया बीजेपी के पारंपरिक वोटर रहे हैं। इस सोशल इंजीनियरिंग का नतीजा यह रहा कि 243 सदस्यों वाली बिहार विधानसभा में एनडीए ने 202 सीटें जीत लीं। बिहार पहला राज्य था, जहां बीजेपी ने अपने सहयोगी जेडी-यू सुप्रीमो नीतीश कुमार को सीएम फेस घोषित किया था।
तमिलनाडु में भी जाति वाली पार्टी एनडीए में
बिहार के बाद तमिलनाडु दूसरा ऐसा राज्य है, जहां बीजेपी ने खुले तौर से AIADMK के एडप्पादी के पलानीस्वामी (EPS) के नेतृत्व में विधानसभा चुनाव लड़ने की घोषणा की है। द्रविड़ राजनीति के दबदबे वाले तमिलनाडु में भी बीजेपी ने उन दलों को एनडीए में शामिल किया है, जिनका खास इलाके में जातीय पहचान और नेतृत्व के कारण जनाधार है। AIADMK की दलित वोटरों में पैठ है। राज्य में दलित समुदाय की आबादी 20 फीसदी है। उत्तरी तमिलनाडु में मजबूत PMK भी एनडीए की पार्टनर है। PMK नेता अंबुमणि रामदास वन्नियार समुदाय में लोकप्रिय हैं। AMMK के महासचिव टी टी वी दिनाकरन ने एनडीए में वापसी की है।
क्रिश्चियन वोटरों का कोई विकल्प नहीं
बीजेपी के पास तमिलनाडु के 6 फीसदी क्रश्चियन समुदाय के लिए कोई नेता या पार्टी नहीं है। इस कमी को पूरा करने के लिए बीजेपी ने टीवीके प्रमुख एक्टर विजय से गठबंधन की कोशिश की, मगर उसे सफलता नहीं मिली। पिछले चुनावों तक क्रिश्चियन वोटर डीएमके के साथ रहे। इसके अलावा एनडीए की एक और टेंशन है। AIADMK के पूर्व नेता ओ पनीरसेल्वम भी गठबंधन में आना चाहते हैं, मगर बीजेपी अभी तक इसके लिए पलानीस्वामी को राजी कर पाई है। पिता-पुत्र के मतभेद के कारण पीएमके की ताकत बंटी हुई है।
तमिलनाडु एक शहरीकृत राज्य है इसलिए चुनाव सिर्फ जातिगत समीकरणों के आधार पर नहीं जीते जा सकते। तमिलनाडु में ऐसे उम्मीदवारों के जीतने की संभावना ज़्यादा होती है, जिनकी सभी जातियों में पकड़ होती है। बीजेपी को एक ब्राह्मणों और सवर्णों की पार्टी के तौर पर देखा जाता है। यही कारण रहा कि जब बीजेपी खास प्रभावशाली समुदायों के नेताओं को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया, तो भी नहीं जीत पाई।
पॉलिटिकल एक्सपर्ट कन्नन आर ने टाइम्स ऑफ इंडिया से बातचीत में कहा है कि तमिलनाडु की चुनावी राजनीति में जाति और पैसा महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहेंगे। बीजेपी पिछड़ी जातियों के कई नेता हैं। वह अलग-अलग जातियों को एक मंच पर लाने की कोशिश कर रही है, मगर उसे अब तक सफलता नहीं मिली है। एक अन्य एक्सपर्ट श्याम शनमुगा का मानना है कि तमिलनाडु में चुनाव सिर्फ जातिगत समीकरणों के आधार पर नहीं जीते जा सकते। उन्होंने कहा कि तमिलनाडु के ग्रामीण इलाकों में जातिगत समीकरण हमेशा काम करते हैं। लेकिन शहरी इलाकों में इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।
तमिलनाडु में कौन जाति है पावरफुल
दक्षिणी राज्य में दलितों की आबादी 19 से 21 फीसदी मानी जाती है। वह सभी जिलों में हैं, कुड्डालोर, विल्लुपुरम, तिरुवल्लूर और मदुरै में सबसे ज्यादा निर्णायक हैं। दलितों के कारण ही द्रविड़ आंदोलन को सफलता मिली और डीएमके-एआईएडीएमके जैसी पार्टियों अस्तित्व के आने के बाद सत्ता के शिखर पर पहुंच गई। एक अन्य जाति थेवर का दक्षिणी तमिलनाडु के जिलों जैसे मदुरै, थेनी, डिंडीगुल, शिवगंगा और रामनाथपुरम में काफी प्रभाव है। वी के शशिकला और बागी नेता ओ पन्नीरसेल्वम थेवर समुदाय से ही हैं। थेवर आबादी 10 से 12 फीसदी आंकी जाती है।
उत्तरी तमिलनाडु में वन्नियार का वर्चस्व
उत्तरी तमिलनाडु में वन्नियार समुदाय का वर्चस्व है। दलितों के संघर्ष में इसी समुदाय का नाम आता है। पटाली मक्कल कच्ची (PMK) के नेता एस. रामदास इस समुदाय के नेता हैं। वन्नियार तमिलनाडु की आबादी का लगभग 12 से से 15 फीसदी हैं, जिनकी विल्लुपुरम, कुड्डालोर, तिरुवन्नामलाई और वेल्लोर के कुछ हिस्सों में मजबूत उपस्थिति है। एक अन्य जाति नाडारा तमिलनाडु के बनिया माने जाते हैं। इसकी आबादी 4 से 6 फीसदी है। प्रसिद्ध कांग्रेस नेता के. कामराज नाडर समुदाय से थे। दक्षिणी तमिलनाडु के जिलों जैसे कन्याकुमारी, तिरुनेलवेली, थूथुकुडी और विरुधुनगर में नाडर निर्णायक हैं। ओबीसी कैटिगरी के गौंडर की कुल आबादी 5 से 7 फीसदी है। पश्चिमी तमिलनाडु के कोयंबटूर, तिरुपुर, इरोड, नमक्कल, करूर और सेलम जैसे जिले में निर्णायक होते हैं।

























































