नई दिल्ली: इस साल यानी 2026 में कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं लेकिन जिस राज्य में सबसे ज्यादा दिलचस्प मुकाबला होगा, वह पश्चिम बंगाल है। 2021 के विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी को सत्ता से बाहर करने के लिए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अपना पूरा दम-खम लगा दिया था लेकिन वह टीएमसी को हरा नहीं पाई।
टीएमसी को इस बार हराने के लिए भगवा पार्टी अभी से अपनी चुनावी रणनीति में जुट गई है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह लगातार इस राज्य का दौरा कर संगठन को मजबूत और कार्यकर्ताओं में जोश भर रहे हैं। राज्य में मुख्य मुकाबला टीएमसी और भाजपा के बीच होना है और इसकी सियासी बिसात भी बिछनी शुरू हो गई है। बंगाल में विधानसभा चुनाव अप्रैल-मई में होने हैं।
कांग्रेस ने भी ‘एकला चलो’ का फैसला किया
बंगाल में कांग्रेस, लेफ्ट, एआईएमआईएम और हुमायूं कबीर की पार्टी भी चुनाव लड़ेंगी। पिछली बार कांग्रेस और लेफ्ट साथ मिलकर चुनाव लड़ा था लेकिन इस बार ये दोनों पार्टियां साथ आएंगी कि नहीं, अभी इस बारे में कुछ साफ नहीं है। टीएमसी ने स्पष्ट कर दिया है कि चुनाव के लिए वह कांग्रेस के साथ गठबंधन नहीं करेगी तो कांग्रेस ने भी ‘एकला चलो’ का फैसला किया है। लेफ्ट और कांग्रेस के बीच गठबंधन होगा या नहीं, यह भी स्पष्ट नहीं है। टीएमसी, कांग्रेस और लेफ्ट के इस रुख से बंगाल में ‘इंडिया’ गठबंधन बिखर गया है। इस बिखराव के पीछे इन तीनों दलों की अपनी सियासी मजबूरी है जो इन्हें अकेले चुनाव लड़ने के लिए बाध्य कर रही है।
टीएमसी से गठबंधन नहीं चाहते बंगाल कांग्रेस के नेता
दरअसल, कुछ दिनों पहले बंगाल कांग्रेस के नेता दिल्ली में पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी से मिले। इस बैठक में उन्होंने प्रदेश कांग्रेस की हालत और चुनावी समीकरणों पर चर्चा की। रिपोर्टों में सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि कांग्रेस, टीएमसी के साथ मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ना चाहती थी लेकिन टीएमसी की ओर से उसे चुनाव लड़ने के लिए जो सीटें दी जा रही थीं, वे बेहद कम थीं।
टीएमसी ने कांग्रेस को चुनाव लड़ने के लिए दो सीटों देने की पेशकश की थी लेकिन यह कांग्रेस को स्वीकार्य नहीं था। ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी बंगाल के प्रभारी गुलाम अहमद मीर का कहना है कि इस बैठक में बंगाल चुनाव पर रोडमैप और तैयारियों पर चर्चा हुई। बैठक में सभी नेताओं ने अपनी राय दी। चर्चा के बाद नेताओं ने बंगाल चुनाव अकेले लड़ने का फैसला किया और अकेले चुनाव लड़ने के प्रदेश नेताओं की राय का शीर्ष नेतृत्व ने समर्थन किया।
2016 में कांग्रेस ने जीती थीं 44 सीटें
साल 2016 और 2021 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस ने लेफ्ट के साथ मिलकर लड़ा था। 2016 में कांग्रेस ने 92 सीटों पर चुनाव लड़ा और उसे 44 सीटों पर जीत हासिल हुई। इस चुनाव में उसका वोट प्रतिशत 12.55 था लेकिन पांच साल बाद हुए चुनाव में कांग्रेस को भारी झटका लगा। 2021 के विधानसभा चुनाव में पार्टी एक भी सीट नहीं जीत पाई और इसका वोट शेयर भी घटकर तीन प्रतिशत पर आ गया। इस बैठक के बारे में जानकारी रखने वाले सूत्रों का कहना है कि बंगाल प्रदेश के नेताओं का कहना है कि दूसरों पर निर्भर होने की वजह से पार्टी दो दशकों से खुद को राज्य में खड़ा नहीं कर पाई है। नेताओं का मानना है कि इस बार पार्टी यदि अकेले चुनाव लड़ेगी तो उसके पास खुद को साबित करने और जमीनी स्तर पर लोगों से जुड़ने का एक मौका होगा।
लेफ्ट के साथ गठबंधन का लाभ नहीं मिला
प्रदेश कांग्रेस के नेता यह भी मानते हैं कि बंगाल में लेफ्ट के साथ गठबंधन का लाभ भी उसे नहीं मिला। बंगाल चुनाव के लिए कांग्रेस के पर्यवेक्षक सुदीर रॉय बर्मन ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि भविष्य को देखते हुए बंगाल चुनाव अकेले लड़ने का फैसला किया गया है।
कांग्रेस के साथ गठबंधन नहीं करेगा लेफ्ट
उन्होंने कहा, ‘2021 के चुनाव में हम एक भी सीट जीत नहीं पाए। इससे बुरा और कुछ नहीं हो सकता, इसलिए हमने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया है।’ लेफ्ट भी इस बार कांग्रेस के साथ गठबंधन करने का इच्छुक नहीं है। लेफ्ट का कहना है कि बंगाल में कांग्रेस का वोट शेयर लगातार गिरा है, और साथी दलों के लिए वह एक ‘बोझ’ बन गई है।
तो इस बार त्रिकोणीय मुकाबले के आसार कम
मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी (माकपा) के राज्य सचिव मोहम्मद सलीम ने कोलकाता में कहा कि ‘हम टीएमसी एवं भाजपा विरोधी ताकतों को एक साथ एकजुट करना चाहते हैं लेकिन हमें पता चला कि टीएमसी और कांग्रेस के बीच गठबंधन को लेकर बातचीत चल रही है। ऐसे में कांग्रेस के साथ गठबंधन में जाने के बारे में हम नहीं सोच रहे।’ हालांकि, बंगाल कांग्रेस में एक धडा़ ऐसा भी है जिसका मानना है कि मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने के लिए लेफ्ट के साथ उसका गठबंधन होना चाहिए।
कांग्रेस और लेफ्ट के बीच गठबंधन नहीं होने पर मुकाबला टीएमसी और भाजपा के बीच का रह जाएगा। ऐसे में कांग्रेस चुनावी रेस में पिछड़ जाएगी। वामपंथी दलों ने 2021 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस और इंडियन सेकुलर फ्रंट (आईएसएफ) के साथ गठबंधन में लड़ा था। हालांकि, उन दोनों का खाता तक नहीं खुला और केवल आईएसएफ को एक सीट मिली।
BJP-टीएमसी को मिल सकता है इसका फायदा
बहरहाल, पार्टियां अकेले या मिलकर चुनाव लड़ेंगी, यह हार-जीत, वोट बैंक, चुनावी समीकरण को देखकर तय किया जाता है। जानकारों का कहना है कि बंगाल में कांग्रेस और वाम दल यदि अकेले चुनाव लड़ते हैं तो इसका फायदा टीएमसी को होगा क्योंकि इन दोनों दलों का परंपरागत वोट बैंक काफी हद तक एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है। अकेले लड़ने पर इन वोटों में बिखराव होगा। ममता बनर्जी के खिलाफ जो वोट बैंक है, वह बंट जाएगा और सीधा फायदा ममता को होगा।
बंगाल में कुछ सीटों पर लेफ्ट और कांग्रेस मजबूत स्थिति में मानी जाती हैं। साथ मिलकर लड़ने पर ये टीएमसी और भाजपा को टक्कर और मुकाबले को त्रिकोणीय बना सकती हैं। साथ नहीं आने पर इन सीटों पर सीधा मुकाबला भाजपा और टीएमसी के बीच होगा। यही नहीं लेफ्ट एवं कांग्रेस के कमजोर दिखने पर ममता विरोधी वोटों का ट्रांसफर भाजपा की तरफ भी हो सकता है।

























































