तेहरान: ईरान ने इजराल और अमेरिका के खिलाफ युद्ध में बड़े पैमाने पर नुकसान का सामना किया है। 28 फरवरी से चल रहे अमेरिका और इजरायल के हमलों ने उसके नेतृत्व और सैन्य कमान के ढांचे को बुरी तरह कमजोर किया है। ईरान आर्थिक तौर पर जंग से पहले ही मुश्किल का सामना कर रहा है। इस गंभीर संकट के बावजूद ईरान ने झुकने के बजाय लंबा युद्ध लड़ने का संकेत दिया है। ऐसे में सवाल उठता है कि कमजोर होकर भी ईरान लड़ाई लंबे समय तक क्यों जारी रखना चाहता है।
सीएनएन के मुताबिक, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बार-बार ईरान से बिना शर्त सरेंडर की मांग की है। दूसरी ईरान के बचे हुए नेतृत्व ने सरेंडर के बजाय अमेरिका से शर्ते मानने की मांग रखी है। ईरान ने सीजफायर के लिए युद्ध के हर्जाने और खाड़ी के अरब देशों से अमेरिकी सैन्य अड्डों को हटाने जाने जैसी मांगे रखी हैं।
ईरानी नेता अपनी शर्तो पर अड़े
ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघर गालिबफ का कहना है कि युद्धविराम तभी तर्कसंगत होगा जब यह गारंटी मिले कि जंग दोबारा शुरू नहीं होगा। हम सिर्फ इसलिए युद्ध नहीं रोकेंगे कि दुश्मन को नष्ट हुए रडार की मरम्मत करना या इंटरसेप्टर मिसाइलों की कमी को पूरा करने का मौका मिल जाए और कुछ दिन बाद वह हम पर फिर से हमला कर दे।
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा है कि उनकी मांग की है कि युद्ध के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य के लिए एक नया प्रोटोकॉल होना चाहिए। इसमें ईरान के हितों का ध्यान रखा जाए और जहाजों के सुरक्षित गुजरने की व्यवस्था कुछ खास शर्तों के तहत ही होनी चाहिए। ईरान इसे अपनी युद्धविराम की शर्त में शामिल करेगा।
ईरान की मांगें और बढ़ सकती हैं
विश्लेषकों का कहना है कि तेहरान की मांगे अभी और बढ़ सकती हैं। वह विदेशों में प्रतिबंधों के कारण जब्त की गई अपनी संपत्तियों को मुक्त करने की मांग कर सकता है। वह उन देशों से शुल्क (टोल) वसूल सकता है, जो उस संकरे समुद्री गलियारे का इस्तेमाल करते हैं, जो अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में ईरान के तट के पास स्थित है।
अमेरिका और इजरायल के खिलाफ ईरान के जवाबी हमलों पर सेंटर फॉर इंटरनेशनल पॉलिसी के वरिष्ठ अनिवासी फेलो सीना तूसी कहते हैं कि ईरान एक ऐसे भविष्य की तलाश में है, जहां वह आइसोलेट ना रहे। वह एक नए क्षेत्रीय संतुलन का हिस्सा बनना चाहेगा, जहां उसकी स्थिरता को फारस की खाड़ी और वैश्विक अर्थव्यवस्था की स्थिरता से जुड़ा देखा जाए।
ईरान का लक्ष्य सैन्य जीत नहीं
जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर नरगिस बाजोघली ने सीएनएन को बताया, ‘पारंपरिक सैन्य नजरिए से देखें तो ईरान जीत नहीं रहा है। उसे युद्ध को पूरी तरह से जीतने की जरूरत भी नहीं है। ईरान की पूरी रणनीति असममित युद्ध (एसिमेट्रिकल वारफेयर) पर आधारित है। वे युद्ध जारी रखने को बहुत महंगा बना देना चाहते हैं।’
होर्मुज ब्लॉक करने और अरब देशों के खिलाफ ईरान के अभूतपूर्व आक्रामक रवैये ने उसकी बदली हुई रणनीति को दिखाया है। अमेरिका और अरब देश तेल व्यापार में रुकावट और बढ़ती कीमतों को अनिश्चित काल तक बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं। वह जल्दी ही ये कहेंगे कि अब बहुत हो गया है और इसे खत्म किया जाए।
भविष्य को बचाने के लिए लंबी लड़ाई
ईरान की रणनीति इस बात पर केंद्रित है कि वह अपने भविष्य को पूरे व्यापक क्षेत्र के भविष्य से जोड़कर बचाया जाए। ईरान के मौजूदा शासन का अंतिम लक्ष्य जीत नहीं बल्कि अस्तित्व बचाना है। वह अपनी निवारक शक्ति को बहाल करने और युद्ध के बाद की स्थितियों को तय करने की ताकत हासिल करने की लड़ाई में है। ऐसे में ईरान इस लड़ाई को लंबा खींचने में लगा है ताकि अपनी कुछ शर्तों को मनवाया जा सके।

























































