नई दिल्ली। ‘वर्चुअल ऑटिज्म’ एक ऐसी समस्या है जिसके लक्षण बिल्कुल ‘ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर’ (ASD) जैसे होते हैं। इसमें बच्चा बार-बार एक ही हरकत करता है, उसे बोलने में देरी होती है, वह लोगों से दूरी बनाने लगता है और बातचीत करने में स्ट्रगल करता है। आसान शब्दों में कहें तो बच्चा असली दुनिया से कटकर पूरी तरह से स्क्रीन में खो जाता है।
हालांकि, पारंपरिक ऑटिज्म के विपरीत, वर्चुअल ऑटिज्म एक राहत की बात भी लेकर आता है- अगर बच्चे का स्क्रीन टाइम कम कर दिया जाए, तो इसके लक्षणों को सुधारा जा सकता है। आइए, डॉ. आशिमा श्रीवास्तव (सीनियर कंसल्टेंट – क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट, मैक्स सुपर स्पेशलिटी अस्पताल, पटपड़गंज) से जानते हैं इसके बारे में।
दिमाग पर स्क्रीन का खतरनाक असर
आजकल तकनीक इतनी बढ़ गई है कि छोटे बच्चे रोजाना औसतन 2 घंटे स्क्रीन देखते हैं, लेकिन अगर कोई बच्चा दिन में 4 घंटे से ज्यादा समय मोबाइल या टीवी पर बिता रहा है, तो उसमें ऑटिज्म जैसे लक्षण विकसित होने का खतरा काफी बढ़ जाता है। हालांकि इसे 100% कारण नहीं माना गया है, लेकिन कई शोध बताते हैं कि ज्यादा स्क्रीन टाइम का सीधा संबंध बच्चों में भाषा और समझने की देरी से है।
ज्यादा स्क्रीन देखने से बच्चे के दिमाग की केमिस्ट्री बिगड़ जाती है। इससे ग्रे/व्हाइट मैटर में बदलाव आते हैं और न्यूरल कनेक्शन कमजोर पड़ जाते हैं। इसके अलावा, दिमाग में ‘गाबा’, डोपामाइन और मेलाटोनिन जैसे जरूरी तत्वों का उत्पादन कम हो जाता है। इसका सीधा और बुरा असर बच्चे के मानसिक विकास और उसकी नींद की साइकिल पर पड़ता है। स्क्रीन से चिपके रहने के कारण बच्चे असली दुनिया और लोगों से नहीं मिल पाते, जिससे उनके मानसिक विकास में लंबे समय तक रहने वाली रुकावट आ सकती है।
तुरंत पहचानें 5 रेड फ्लैग्स
अगर आप वर्चुअल ऑटिज्म से बचना चाहते हैं, तो बच्चों में इन 5 लक्षणों पर बारीकी से नजर रखें:
बोलने में देरी या न बोलना: अगर बच्चा 2 साल का होने पर भी नहीं बड़बड़ाता है या नहीं बोलता है। वह बातचीत करने से ज्यादा स्क्रीन देखना पसंद करता है, उसके पास शब्दों की कमी है, वह इशारों को नहीं समझता है या एक ही बात को बार-बार दोहराता है।
आंखें न मिलाना: बात करते समय दूसरों की आंखों में न देखना और इंसानों से ज्यादा स्क्रीन के साथ बिजी रहना।
लोगों से दूरी बनाना: चेहरे पर कोई भाव न होना, खिलौनों या लोगों के साथ न खेलना। आवाज देने पर कोई ध्यान न देना और हमेशा अकेले रहना व खेलना पसंद करना।
एक ही हरकत बार-बार करना: अपने हाथों को फड़फड़ाना, गोल-गोल घूमना, आगे-पीछे हिलना, बेचैन रहना और स्क्रीन को लेकर एक जिद या जुनून होना।
ध्यान साझा न कर पाना: अपनी पसंद की किसी चीज को उंगली से इशारा करके न दिखाना, दूसरों के इशारों को न समझना और अपनी खुशी दूसरों के साथ बांटने में परेशानी महसूस करना।
भारत में स्थिति और इसका इलाज
भारत में, खासकर मध्यम वर्गीय परिवारों में, ऑटिज्म के मामले तेजी से बढ़े हैं। चिंताजनक बात यह है कि इनमें से 50-60% मामले सीधे तौर पर ज्यादा स्क्रीन टाइम से जुड़े हैं।
हालांकि, स्थिति को समय रहते संभाला जा सकता है। छोटे बच्चों का दिमाग बहुत लचीला होता है और तेजी से बदलावों को अपना सकता है। अगर आप तुरंत कदम उठाते हैं और बच्चे का स्क्रीन टाइम एकदम कम कर देते हैं, तो यह समस्या ठीक हो सकती है। स्क्रीन की जगह बच्चों को असली दुनिया के खेलकूद और माता-पिता व दोस्तों के साथ बातचीत करने का मौका दें।
बचाव के तरीके और WHO की गाइडलाइंस
इस समस्या से निपटने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिशानिर्देशों का पालन करना सबसे जरूरी है:
- 18 महीने से कम उम्र के बच्चों को बिल्कुल भी स्क्रीन नहीं दिखानी चाहिए।
- 2 से 5 साल के बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम दिन में 1 घंटे से कम होना चाहिए।
- घर में ‘स्क्रीन-फ्री जोन’ बनाएं। अगर बच्चे को कुछ दिखाना ही है, तो माता-पिता अपनी देखरेख में सिर्फ अच्छी एजुकेशनल चीजें ही दिखाएं। इसके साथ ही, बच्चों के मानसिक और सामाजिक विकास के लिए बाहर मैदान में खेलना और किताबें पढ़ना बहुत जरूरी है।
अगर बच्चों में लक्षण ज्यादा गंभीर हैं, तो बिना देरी किए ‘स्पीच और ऑक्यूपेशनल थेरेपी’ की मदद लेनी चाहिए। बच्चों के स्वस्थ विकास के लिए शुरुआती उम्र में स्क्रीन टाइम को कंट्रोल करना ही सबसे बेहतरीन उपाय है।

























































