मॉस्को: रूस की टैंक बनाने वाली कंपनी UVZ ने 2000 के दशक की शुरुआत में भारत को एडवांस्ड T-90S टैंक बेचकर खूब मुनाफ़ा कमाया था लेकिन अब ये कंपनी एक अदद ग्राहक के लिए परेशान है। भारत अब खुद T-90 टैंक बनाता है। T-90S मेन बैटल टैंक (MBT) को रूस में बने MBT की T-90 सीरीज के सबसे एडवांस्ड वेरिएंट में से एक माना जाता है और सोवियत/रूसी टैंक डिजाइन के इतिहास में बने अब तक के सबसे बेहतरीन टैंकों में से एक बताया जाता है। शुरू में इसे रूस की बड़ी इंडस्ट्रियल कंपनी Uralvagonzavod (UVZ) ने बनाया था और 1990 के दशक में रूसी सेना ने इसे T-90A के तौर पर अपनाया था।
इसके बाद इसे बेचने के लिए डेवलप किया गया और 2004 में भारतीय सेना ने इसे आधिकारिक तौर पर अपना लिया। भारत में इसका नाम T-90S भीष्म नाम दिया गया। महाभारत के भीष्ण पितामह के नाम पर। भारतीय सेना के पास 1100 से ज्यादा T-90S भीष्म टैंक सेवा में हैं। भारतीय सेना की क्षमताओं को बढ़ाने के अलावा इस MBT को अपनाने को “रूसी टैंक निर्माण के लिए लाइफलाइन” बताया गया था जो 1990 के दशक और 2000 के दशक की शुरुआत में बड़े आर्थिक संकट के बीच संघर्ष कर रहा था।
एशियाई देशों को T-90 टैंक बेचना चाहता है रूस
रूस की कोशिश एक बार फिर से एशियाई देशों को इस टैंक को बेचने की है। उसने इस हफ्ते मलेशिया में आयोजित ‘डिफेंस सिक्योरिटी एशिया’ अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रदर्शनी में T-90S टैंक पेश किया है। इसमें 63 देशों की 1,456 कंपनियों ने हिस्सा लिया है। रूस ने इस साल DAS/NATSEC में पहली बार हिस्सा लिया है और T-90S उसके मुख्य आकर्षणों में से एक है। रूस की सरकारी समाचार एजेंसी TASS की एक रिपोर्ट के मुताबिक UVZ ने बताया है कि इस टैंक को “ग्राहकों से काफी तारीफ मिली है।”
टैंक बनाने वाली कंपनी का दावा है कि 2000 के दशक में ओपन टेंडर प्रक्रिया के दौरान पूरी दुनिया में T-90S एकमात्र ऐसा टैंक था जिसने पूरे टेस्टिंग साइकिल को पास किया था।
इसने माइनस 50°C से लेकर प्लस 55°C तक के तापमान में, ऊंचाई वाले इलाकों में और उष्णकटिबंधीय नमी वाली स्थितियों में भी अपनी क्षमता साबित की थी।
इस टैंक ने तीन अलग-अलग तरह के जलवायु क्षेत्रों जैसे रेगिस्तान, पहाड़ी और नमी वाले उष्णकटिबंधीय क्षेत्र जैसे मलेशिया में काम करने की अपनी क्षमता दिखाई है।
इसमें 125mm की ‘स्मूथबोर गन’ लगी होती है जो न सिर्फ गोले दागती है बल्कि इसके जरिए एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल (ATGM) भी छोड़ी जा सकती है।
यह 4 से 5 किलोमीटर दूर स्थित दुश्मन के टैंक या कम ऊंचाई पर उड़ रहे हेलिकॉप्टरों को अपनी मिसाइल से सटीक निशाना बना सकता है।
इसके अलावा T-90 पर ‘कॉन्टैक्ट-5’ ईआरए लगा होता है। जब दुश्मन का गोला इस पर गिरता है तो यह छोटा धमाका कर गोले के असर को टैंक के भीतर पहुंचने से पहले ही खत्म कर देता है।
भारत की आत्मनिर्भरता ने रूस को दिया बड़ा झटका
भारत अब खुद इस टैंक को बनाता है जिससे रूस के पास अब भारत जैसा ग्राहक नहीं है। यह रूस के लिए एक समस्या है। हालांकि भारत की रूस के साथ T-90S की डील रूसी टैंक उद्योग के लिए एक बहुत जरूरी सहारा साबित हुई लेकिन भारत ने इसी शर्त के साथ खरीदा था कि रूस भारत को T-90S का घरेलू उत्पादन बढ़ाने में मदद करेगा। करीब दो दशक बाद अब यह प्रक्रिया लगभग पूरी हो चुकी है और रूस से मंगाए जाने वाले टैंकों के लिए भारत की जरूरत काफी कम हो गई है जिसके चलते टैंक बनाने वाली कंपनी UVZ को नए ग्राहक खोजने के लिए दूसरे देशों का रुख करना पड़ रहा है।

























































