नई दिल्ली। एक सदी पहले तक भारत में महिलाएं आयुर्वेद और देसी जड़ी बूटियों से ही अपनी त्वचा की देखभाल करती थीं. वे घर पर ही रसोई और बगीचे में मौजूद जड़ी बूटियों या औषधियों से अपने स्किन केयर प्रोडक्ट खुद ही बना लेती थीं. वे स्वास्थ्य और आराम के लिए प्रकृति का सहारा लेती थीं. लेकिन फिर एक दौर आया और स्किनकेयर, पर्सनल केयर और वेलनेस उत्पादों में केमिकल का इस्तेमाल होने लगा. उसका तत्काल रिजल्ट लोगों को चौंकाने लगा, लेकिन आज एक बार फिर साइंटिफिक रिसर्च और नवाचार के बाद ज्यादातर स्किन केयर उत्पादों में चुनिंदा जड़ी-बूटियों और वनस्पतियों का उपयोग होने लगा है.
विशेषज्ञों की मानें तो सिर्फ महिलाओं के स्किनकेयर उत्पादों में ही नहीं बल्कि इंटिमेट हाइजीन उत्पादों से लेकर न्यूट्रिशनल सप्लीमेंट्स और यहां तक कि सैनिटरी पैड्स तक में इन पारंपरिक पौधों और औषधियों का इस्तेमाल होने लगा है. आइए एक्सपर्ट से विस्तार से जानते हैं इसके बारे में…
प्राचीन वनस्पतियां फिर क्यों लोकप्रिय हो रही हैं?
दिल्ली-एनसीआर स्थित वरुण हर्बल क्लिनिक की सीनियर कंसल्टेंट, आयुर्वेद गायनेकोलॉजी, डॉ. मंजू सिंह कहती हैं, “आज के उपभोक्ता रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाले उत्पादों में मौजूद सामग्री को लेकर पहले से कहीं अधिक जागरूक हैं. वे ऐसे उत्पादों की तलाश करते हैं जो त्वचा के लिए कोमल हों, डर्मेटोलॉजिकल रूप से जांचे-परखे हुए हों, प्राकृतिक सामग्रियों से बने हों और जिनका पारंपरिक उपयोग लंबे समय से होता आया हो. इसके साथ ही इनके साइड इफैक्ट्स कम से कम हों.”
बढ़ती मांग को देखते हुए शोधकर्ता भी पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों में दर्ज औषधीय पौधों के वैज्ञानिक अध्ययन में बढ़ती रुचि दिखा रहे हैं. वैद्य अच्युत कुमार त्रिपाठी, सदस्य, नेशनल एकेडमी ऑफ आयुर्वेद, आयुष मंत्रालय, कहते हैं, “कई वनस्पतियों का उनके एंटीऑक्सीडेंट, त्वचा को आराम देने वाले, मॉइस्चराइजिंग या एंटीमाइक्रोबियल गुणों के लिए अध्ययन किया जा रहा है. बाजार में उपलब्ध नए उत्पादों में आधुनिक फॉर्मूलेशन के साथ चुनिंदा पौधों के अर्क को शामिल किया जाने लगा है.”
वे बताते हैं कि आजकल कुछ वनस्पतियों या औषधीय पौधों का सबसे ज्यादा इस्तेमाल स्किन केयर या हेल्थ केयर प्रोडक्ट में होने लगा है. इसके पीछे इनपर सदियों से होने वाला भरोसा भी है.
एलोवेरा: त्वचा के आराम के लिए भरोसेमंद सामग्री
एलोवेरा को सदियों से अपने ठंडक देने वाले और मॉइस्चराइजिंग गुणों के लिए महत्व दिया जाता रहा है. आज यह फेस वॉश, शैंपू, बॉडी लोशन, आफ्टर-सन उत्पादों, फेसियल ब्यूटी ऑयल्स, माउथवॉश, इंटिमेट वॉश और फेमकेयर उत्पादों में आमतौर पर पाया जाता है. त्वचा में नमी बनाए रखने में मदद करने की इसकी क्षमता ने इसे दुनिया भर में पर्सनल केयर उत्पादों में इस्तेमाल होने वाली लोकप्रिय वनस्पति सामग्रियों में शामिल कर दिया है.
मोरिंगा: फेमिनिन केयर में नए उपयोग
मोरिंगा उन बहुउपयोगी वनस्पतियों में शामिल हो गया है, जिन पर वैज्ञानिक समुदाय का ध्यान बढ़ रहा है. आयुर्वेद में पारंपरिक रूप से अपने पोषण संबंधी गुणों के लिए जाना जाने वाला मोरिंगा इसकी पत्तियों में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले विटामिन, खनिज, एंटीऑक्सीडेंट और अन्य पौध-आधारित यौगिकों के लिए भी जाना जाता है, जिनके विभिन्न क्षेत्रों में उपयोग की संभावनाएं हैं.
डर्मेटोलॉजिकल रूप से परीक्षण किए गए मोरिंगा-युक्त सैनिटरी पैड फेमिनिन हाइजीन उत्पादों में एक नया चलन बनकर उभरे हैं. इन पैड्स में मोरिंगा को उस परत में शामिल किया जाता है जो सीधे संवेदनशील त्वचा के संपर्क में आती है. इसके साथ आधुनिक एब्जॉर्बेंट सामग्री और मुलायम टॉप शीट का इस्तेमाल किया जाता है. कुछ स्किनकेयर उत्पादों में भी कंडीशनिंग गुणों के लिए मोरिंगा एक्सट्रैक्ट शामिल किए जाते हैं.
नीम: रोजमर्रा की सफाई में कारगर
नीम पीढ़ियों से आयुर्वेदिक परंपराओं का अभिन्न हिस्सा रहा है. आज नीम के अर्क का इस्तेमाल साबुन, शैंपू, ओरल केयर उत्पादों और इंटिमेट हाइजीन फॉर्मूलेशन में आमतौर पर किया जाता है. इसका उपयोग ऐसे पर्सनल केयर उत्पादों के प्रति उपभोक्ताओं की बढ़ती पसंद को दर्शाता है, जिनमें पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक निर्माण मानकों का संयोजन हो.
कैमोमाइल: संवेदनशील त्वचा के लिए कोमल देखभाल
कैमोमाइल अपने त्वचा को शांत करने वाले गुणों के लिए जाना जाता है और अब इसे संवेदनशील या नाजुक त्वचा के लिए बनाए गए उत्पादों में अक्सर शामिल किया जाता है. बेबी केयर लोशन से लेकर फेमिनिन वॉश, इंटिमेट हेयर रिमूवर क्रीम और स्किनकेयर उत्पादों तक, कैमोमाइल कोमल देखभाल के लिए पसंद किया जाता है.
हल्दी: रसोई के मसाले से स्किनकेयर स्टेपल तक
आयुर्वेद में हरिद्रा के नाम से जानी जाने वाली हल्दी (Turmeric) का लंबे समय से स्वस्थ त्वचा के साथ संबंध माना जाता रहा है. आधुनिक कॉस्मेटिक उत्पादों में अब हल्दी के अर्क का इस्तेमाल फेस वॉश, क्लींजर, सीरम और क्रीम में किया जाता है, जिन्हें त्वचा को अधिक निखरी और स्वस्थ दिखने में मदद करने के लिए तैयार किया जाता है. इसकी लोकप्रियता यह दर्शाती है कि पारंपरिक सामग्रियां किस तरह आधुनिक स्किनकेयर में अपनी जगह बना सकती हैं.
कुसुम (Safflower): संवेदनशील त्वचा के लिए वनस्पति-आधारित इमोलिएंट
कुसुम को पारंपरिक स्वास्थ्य एवं वेलनेस प्रथाओं में सदियों से महत्व दिया जाता रहा है और आज इसका व्यापक इस्तेमाल आधुनिक स्किनकेयर और पर्सनल केयर फॉर्मूलेशन में किया जाता है. लिनोलिक एसिड और अन्य आवश्यक फैटी एसिड से भरपूर कुसुम का तेल हल्का होता है और त्वचा की प्राकृतिक नमी की परत को बनाए रखने में मदद करता है.
इसके कंडीशनिंग गुणों के कारण इसका इस्तेमाल मॉइस्चराइजर, बॉडी लोशन और क्लींजर में किया जाता है, ताकि त्वचा को मुलायम और स्वस्थ दिखने में मदद मिल सके. इसका इस्तेमाल फेमिनिन और मेंस्ट्रुअल हाइजीन उत्पादों में भी किया जाता है, जहां इसे घर्षण और रैशेज से होने वाली असहजता को शांत करने के लिए उपयोग किया जाता है.
आयुर्वेद पर साइंस की मुहर
वैद्य त्रिपाठी कहते हैं कि फेमिनिन केयर में वनस्पतियों का बढ़ता इस्तेमाल उत्पाद विकास के एक व्यापक रुझान को दर्शाता है. सदियों पुराने पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक वैज्ञानिक शोध और निर्माण तकनीकों के साथ जोड़ना.
चाहे इंटिमेट वॉश में एलोवेरा हो, आधुनिक सैनिटरी पैड्स में मोरिंगा, संवेदनशील त्वचा की देखभाल में कैमोमाइल या हाइजीन उत्पादों में नीम ये फॉर्मूलेशन दिखाते हैं कि प्राचीन पौधे आज भी आधुनिक समाधानों के लिए प्रेरणा बन सकते हैं.
जैसे-जैसे औषधीय पौधों पर वैज्ञानिक शोध आगे बढ़ रहा है, वैसे-वैसे और भी वनस्पति-आधारित सामग्रियां महिलाओं के पर्सनल केयर में उपयोगी भूमिका पा सकती हैं. हालांकि उत्पादों के विकास और स्वास्थ्य संबंधी दावों की नींव हमेशा वैज्ञानिक प्रमाणों पर आधारित होनी चाहिए, लेकिन पारंपरिक ज्ञान भविष्य के नवाचारों के लिए मूल्यवान प्रेरणा प्रदान कर सकता है.
समय-परीक्षित पारंपरिक ज्ञान को जिम्मेदार वैज्ञानिक शोध और उत्पाद नवाचार के साथ जोड़कर निर्माता आज की महिलाओं की जरूरतों के अनुरूप प्रभावी और सोच-समझकर तैयार किए गए पर्सनल केयर समाधान विकसित कर सकते हैं.





















































