नई दिल्ली। जरा सोचिए, आप थिएटर में फिल्म देखने बैठे हैं. लेकिन इस बार न हीरो की धांसू एंट्री होती है, न कोई विलेन धमकी देता है और न ही बैकग्राउंड में अचानक गाना बजने लगता है. स्क्रीन पर बस एक बच्चा है, जो अपने शहर से दूर गांव पहुंचा है. उसके लिए वहां सब कुछ नया है. लोग, जगह, रहन-सहन… यहां तक कि जिंदगी को देखने का तरीका भी बिलकुल नया है.
अब कहानी दूसरी तरफ मुड़ती है. एक महिला सुबह से काम में लगी है. एक घर का काम खत्म हुआ, तो दूसरे घर की चिंता. उसके लिए दिन और रात के बीच फर्क शायद सिर्फ इतना है कि काम कब खत्म होगा. और फिर एक ऐसी दुनिया सामने आती है, जहां इंसान अपने रिश्तों और आजादी के बीच रास्ता तलाश रहा है.
आप सोच रहे होंगे कि ऐसी कहानियों में भला फिल्म जैसा क्या है? तो जनाब, यही तो असली खेल है! हर कहानी में हीरो का दुनिया बचाना जरूरी नहीं. कभी-कभी किसी आम इंसान की जिंदगी को करीब से देखना भी आपको अंदर तक हिला सकता है.
बुसान इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल – 2026
भारतीय सिनेमा की ऐसी ही अलग दुनिया की चर्चा बुसान इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल 2026 को लेकर हो रही है. इस फेस्टिवल में भारत की 9 फिल्मों के चुने जाने की जानकारी सामने आई है. इन फिल्मों को लेकर दिलचस्पी इसलिए है, क्योंकि यहां बात सिर्फ बड़े सितारों और बॉक्स ऑफिस की नहीं है, बल्कि उन कहानियों की है, जो आम जिंदगी के ऐसे हिस्सों को पर्दे पर लाती हैं, जिन्हें हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं.
इन फिल्मों को समझने के लिए आपको फिल्म क्रिटिक होने की जरूरत नहीं है. बस इतना सोचिए कि अगर किसी फिल्म में न कोई बड़ा विलेन हो, न जबरदस्त एक्शन और न ही हीरो की एंट्री पर तालियां बजाने वाला सीन, तो क्या वह आपको बांध सकती है? इंडिपेंडेंट सिनेमा इसी सवाल का जवाब तलाशता है.
बुसान फिल्म फेस्टिवल में चुनी गई ये 9 भारतीय फिल्में
इस बार बुसान में जिन 9 भारतीय फिल्मों ने अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई है, उनमें शामिल हैं –
- ‘नॉट अ हीरो’ (रिमा दास)
- ‘सेल्वी’ (शैलेश रत्नकुमार)
- ‘बर्ड्स इन द डार्क’ (शशांक वालिया)
- अबाउट एन इंटिमेट मैटर (संदीप कुमार पॉल)
- बर्ड्स ऑन आइस (साहिल एच. शाह)
- चेविट्टोर्मा – द सोल व्हिस्परर (लियो थैडियस)
- खोरिया – (विश्वेंद्र सिंह)
- लवर्स इन द ब्लू नाइट (अनुपर्णा रॉय)
बुसान में पहुंची 9 भारतीय फिल्मों में से कुछ प्रमुख फिल्मों का अंदाज बिल्कुल अलग है:
बच्चे की नजर से गांव और शहर का फर्क दिखाएगी ‘नॉट अ हीरो’
निर्देशक: रीमा दास
क्या आपने कभी सोचा है कि शहर में पला-बढ़ा बच्चा जब अचानक किसी गांव में पहुंचता है, तो उसे वहां की दुनिया कैसी लगती होगी? जो चीज गांव के बच्चे के लिए रोजमर्रा की है, वही शहर से आए बच्चे के लिए बिल्कुल नया अनुभव हो सकती है.
रीमा दास की फिल्म ‘नॉट अ हीरो’ की कहानी मिवान नाम के बच्चे के इर्द-गिर्द घूमती है. शहर में पला मिवान जब असम के एक गांव में अपनी मौसी के पास पहुंचता है, तो उसकी दुनिया बदलने लगती है. यहां कहानी का मजा सिर्फ गांव और शहर के फर्क में नहीं, बल्कि उस बच्चे की नजर में है, जो अपने आसपास की हर चीज को नए सिरे से देख रहा है.
आज की Gen Z के लिए भी इस कहानी में जुड़ने की जगह है. आखिर जगह बदलने पर दोस्त बदलते हैं, रहन-सहन बदलता है और कई बार खुद को देखने का नजरिया भी बदल जाता है. यह फिल्म उसी अनुभव को एक बच्चे की नजर से दिखाने की कोशिश करती है.
‘सेल्वी’: घरों में काम करने वालों की जिंदगी कितनी मुश्किल है?
निर्देशक: शैलेश रत्नकुमार
हम अक्सर किसी घर में काम करने वाली महिला को सुबह से शाम तक मेहनत करते देखते हैं, लेकिन क्या कभी उसके दिन की थकान के बारे में सोचते हैं? एक घर का काम खत्म हुआ, तो दूसरे घर की बारी. अपने लिए वक्त कब मिलता है, आराम कब मिलता है और उसकी अपनी जिंदगी कैसी है?
‘सेल्वी’ घरेलू काम करने वाली एक महिला के काम और संघर्ष को केंद्र में रखती है. इसकी खासियत सिर्फ विषय नहीं, बल्कि इसे फिल्माने का तरीका भी बताया गया है. लगातार हिलता कैमरा और शिफ्ट के लंबे घंटों का एहसास दर्शकों को उस महिला की थकान के करीब ले जाने की कोशिश करता है.
आज सोशल मीडिया पर वर्क-लाइफ बैलेंस, बर्नआउट और काम के दबाव पर खूब बातें होती हैं. लेकिन हर किसी के पास अपनी थकान बताने के लिए सोशल मीडिया अकाउंट या उसे सुनने वाला कोई मंच नहीं होता. ‘सेल्वी’ इसी अनदेखी दुनिया की तरफ ध्यान खींचती है.
इसकी कहानी एक बड़ा सवाल भी छोड़ती है: जिन लोगों की मेहनत से दूसरों के घर चलते हैं, उनकी अपनी जिंदगी को हम कितना समझते हैं?
‘बईस इन द डार्क’: जब कहानी कहने के लिए रंगों की जरूरत नहीं पड़ती
निर्देशक: शशांक वालिया
आज फिल्मों में शानदार सिनेमैटोग्राफी और रंगों का खूब इस्तेमाल होता है. ऐसे में सोचिए कि कोई फिल्म पूरी तरह ब्लैक एंड व्हाइट में बनाई जाए. क्या बिना रंगों के भी कोई कहानी उतनी ही असरदार हो सकती है?
‘बईस इन द डार्क’ निजी रिश्तों, आजादी और मुक्ति की तलाश को दिखाने वाली फिल्म के तौर पर सामने आती है. इसका ब्लैक एंड व्हाइट अंदाज इसे बाकी फिल्मों से अलग पहचान देता है.
लेकिन यहां दिलचस्पी सिर्फ फिल्म के विजुअल स्टाइल में नहीं है. सामाजिक माहौल में इंसानी रिश्ते कैसे आकार लेते हैं, लोगों की निजी इच्छाएं किस तरह बड़ी परिस्थितियों से टकराती हैं और आजादी का मतलब हर व्यक्ति के लिए एक जैसा क्यों नहीं होता – ये ऐसे सवाल हैं, जिनके जवाब आसान नहीं होते.
यही प्रयोगधर्मी सिनेमा की एक खासियत है. यह हर बात का जवाब सीधे नहीं देता, बल्कि दर्शक को अपनी तरफ से सोचने की जगह देता है.
बुसान में भारतीय फिल्मों ने क्यों खींचा सबका ध्यान?
सिनेमा के जानकारों के मुताबिक, इस बार फेस्टिवल में तीन बड़े बदलाव साफ दिखाई दे रहे हैं:
मुख्यधारा से बाहर की भाषाएं: इस बार सिर्फ मुख्यधारा की हिंदी फिल्में नहीं, बल्कि असमिया, मलयालम, तमिल, पंजाबी और लद्दाख की स्थानीय कहानियां वैश्विक मंच पर गूंज रही हैं.
कहानी कहने के पुराने नियम टूटे: फिल्ममेकर्स अब पुराने ढर्रे पर नहीं चल रहे; वे कहानी के विषय और कैमरे की तकनीक दोनों के साथ खुलकर नए प्रयोग कर रहे हैं.
सफलता का बदला पैमाना: सिनेमा की कामयाबी अब केवल पहले वीकेंड के बॉक्स ऑफिस आंकड़ों तक सीमित नहीं है. अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सराहना और आलोचकों की मान्यता भी फिल्म की बड़ी जीत बन रही है.
59 देशों की 247 फिल्मों के बीच चमकीं भारतीय कहानियां
दक्षिण कोरिया के बुसान शहर में होने वाला बुसान इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल एशियाई सिनेमा के बड़े मंचों में से एक है. 2026 में इसका 31वां आयोजन 6 से 15 अक्टूबर तक हो रहा है. इस बार फेस्टिवल में 59 देशों की 247 फिल्में आधिकारिक चयन का हिस्सा हैं. ऐसे में भारतीय फिल्मों का यहां जगह बनाना इस बात की ओर इशारा करता है कि भारतीय सिनेमा की पहचान सिर्फ बॉलीवुड तक सीमित नहीं है. अलग-अलग भाषाओं, क्षेत्रों और अनुभवों से निकली ये कहानियां दुनिया भर के दर्शकों तक पहुंचने का मौका पा रही हैं.





















































