नई दिल्ली: भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में 206 सीटें जीतकर दो-तिहाई से अधिक बहुमत हासिल कर इतिहास रच दिया है। भगवा पार्टी ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 15 साल के शासन का अंत कर दिया है। TMC 80 सीटों पर सिमट गई है। पश्चिम बंगाल की 294 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 148 है। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव का जनादेश केवल सत्ता परिवर्तन का संकेत नहीं है, बल्कि यह उस राजनीतिक व्यवस्था में संरचनात्मक दरार को दर्शाता है जिसे ममता बनर्जी ने पिछले डेढ़ दशक में खड़ा किया था।
ममता बनर्जी की हार के 5 कारण
मुस्लिम वोटों का बिखराव
पश्चिम बंगाल के स्थापित राजनीतिक समीकरणों को उलट देने वाले इस चुनाव में BJP की जीत को यह निर्णायक गति केवल पारंपरिक गढ़ों में ही नहीं मिली। बल्कि मुस्लिम बहुल जिलों में अप्रत्याशित बढ़त से भी मिली है। जहां बिखरे हुए अल्पसंख्यक मतों ने खामोशी से उस कहानी को बदल दिया, जो लंबे समय से तृणमूल कांग्रेस (TMC) के पक्ष में रही थी। एक दशक से अधिक समय तक मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर दिनाजपुर जैसे जिलों में TMC का दबदबा मुस्लिम मतों के लगभग पूरी तरह एकजुट होने पर आधारित रहा, जो इस क्षेत्र के बड़े हिस्सों में आबादी का 50 प्रतिशत या उससे अधिक हिस्सा है।
वाम मोर्चे के 2011 में पतन के बाद बना। फिर 2021 के ध्रुवीकृत चुनाव के दौरान और मजबूत हुआ यह समूह इस बार बिखरता हुआ दिखाई दिया है, जिसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। आंकड़े बेहद स्पष्ट कहानी बताते हैं। BJP ने 2021 के विधानसभा चुनाव में इन तीन जिलों की 43 विधानसभा सीट में से केवल आठ सीट पर जीत हासिल की थी, जो अब बढ़कर 19 हो गई है।
वहीं, TMC को 2021 में इस क्षेत्र की 35 सीटों पर जीत मिली थी, जो घटकर अब 22 सीट पर आ गई है। बाकी सीट कांग्रेस, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) और छोटे दलों की झोली में गई हैं, जिनमें हुमायूं कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी (एजेयूपी) भी शामिल है। यह अल्पसंख्यक मतों के बिखराव को दर्शाता है और यह सत्तारूढ़ पार्टी के लिए महंगा साबित हुआ। चुनाव से पहले व्यापक रूप से किए गए आकलनों में कहा गया था कि SIR से मुस्लिम मतदाता टीएमसी के पक्ष में एकजुट हो जाएंगे, लेकिन परिणाम इसके उलट संकेत देता है।
रणनीतिक एकता के बजाय, अल्पसंख्यक वोट कई दलों में बंट गया, जिससे कड़े मुकाबले वाली सीटों पर टीएमसी की बढ़त कमजोर हो गई। इस बदलाव का केंद्र रहे मुर्शिदाबाद में स्थिति विशेष रूप से नाटकीय है। यहां मुस्लिम आबादी 66 प्रतिशत से अधिक है। यह जिला टीएमसी का गढ़ माना जाता था। वर्ष 2021 में पार्टी ने यहां की 22 में से 20 सीट जीती थीं। इस बार उसका प्रदर्शन घटकर 9 सीटों तक सीमित रह गया है। जबकि BJP ने भी इतनी ही सीट हासिल की हैं, जो पिछले चुनाव में उसकी केवल दो सीट के मुकाबले लंबी छलांग है।
महिलाओं के वोट
BJP के अंदरूनी सूत्रों ने ‘इंडियन एक्सप्रेस’ को बताया कि पिछले महीने NDA सरकार द्वारा संसद में महिलाओं के लिए आरक्षण लागू करने की कोशिशों से मिली मजबूती के चलते विपक्षी पार्टियों के महिला-विरोधी होने का नैरेटिव पश्चिम बंगाल में जमीनी स्तर पर काफी असरदार साबित हुआ। सूत्रों ने कहा कि हालांकि वे अभी भी इसके असर का आकलन कर रहे हैं। लेकिन राज्य में महिलाओं के वोट BJP के पक्ष में कम से कम 5 फीसदी तक बढ़ने की उम्मीद है। यह ऐसा राज्य है जहां महिला मतदाताओं की संख्या पुरुषों के लगभग बराबर है।
स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के तहत वोटर लिस्ट को दुरुस्त करने के बाद कुल 6.44 करोड़ मतदाताओं में से 3.16 करोड़ महिला मतदाताएं थीं। जबकि पुरुष मतदाताओं की संख्या 3.28 करोड़ थी। 2021 में महिला-पुरुष मतदाताओं का अनुपात 3.74 करोड़ पुरुषों के मुकाबले 3.59 करोड़ महिलाओं का था। 2021 में TMC ने 48.02% वोटों पर कब्जा किया था। जबकि BJP को 38.1% और कांग्रेस को सिर्फ 10% वोट मिले थे।
सरकारी कर्मचारियों को लुभाना
सूत्रों ने बताया कि ममता बनर्जी के खिलाफ सत्ता-विरोधी लहर, सरकारी कर्मचारियों के अधिकारों से वंचित किए जाने की भावना और सातवें वेतन आयोग जैसे मुद्दों ने 20 से 50 लाख मतदाताओं के दिलों में अपनी जगह बनाने में कामयाबी हासिल की। इनमें केंद्र और राज्य दोनों सरकारों के मौजूदा कर्मचारी शामिल थे।
साथ ही वे युवा वोटर्स भी शामिल थे जो सरकारी नौकरियों की तलाश में थे। राज्य में BJP की ‘परिवर्तन यात्रा’ की शुरुआत के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने वादा किया था कि सत्ता में आने के 45 दिनों के भीतर राज्य में सातवें वेतन आयोग को लागू किया जाएगा। साथ ही सरकारी नौकरियों में खाली पड़े पदों को भरा जाएगा।
सुरक्षा बलों की तैनाती और सत्ता-विरोधी लहर
एक ऐसे राज्य में जो चुनावों के दौरान होने वाली राजनीतिक हिंसा के लिए जाना जाता है BJP के अंदरूनी सूत्रों ने इसका श्रेय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की उस क्षमता को दिया। इसके तहत RSS मतदाताओं को उनकी विचारधारा की परवाह किए बिना एकजुट कर सका। इस तरह उसने आम मतदाता में आत्मविश्वास जगाया कि वे बिना किसी डर के अपनी पसंद के उम्मीदवार को वोट दे सकें। उन्होंने राज्य में केंद्रीय बलों की अभूतपूर्व तैनाती का भी जिक्र किया।
ECI (भारत निर्वाचन आयोग) के अनुसार, CAPF (केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल) की 500 कंपनियां वोटों की गिनती पूरी होने के बाद भी अगले आदेश तक चुनाव के बाद कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पश्चिम बंगाल में तैनात रहेंगी। इसके अलावा, चुनाव आयोग ने यह भी घोषणा की थी कि CAPF की 200 कंपनियाँ EVM/स्ट्रांगरूम और मतगणना केंद्रों की सुरक्षा व्यवस्था के लिए तैनात रहेंगी। वह राज्य में वोटों की गिनती पूरी होने तक वहीं बनी रहेंगी।
SIR और बाहरी लोगों का मुद्दा
भारतीय जनता पार्टी (BJP) के अंदरूनी सूत्रों ने SIR (वोटर लिस्ट की समीक्षा) प्रक्रिया को इस बात का श्रेय दिया कि उसने यह सुनिश्चित किया कि केवल असली मतदाता ही अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकें, भले ही उनके वोट किसी भी पार्टी के खाते में गए हों। इसके अलावा, BJP ने वोटर लिस्ट को बाहरी लोगों से मुक्त करके उन्हें शुद्ध करने के अभियान को लेकर मतदाताओं के बीच एक माहौल बनाया। इस कारण राज्य की मतदाता सूची से 27 लाख से ज्यादा नाम हटा दिए गए। जबकि 2021 के चुनावों की तुलना में इस बार 30 लाख से अधिक वोट पड़े।

























































