नई दिल्ली। जिस तरह हमें जिंदा रहने के लिए हवा की जरूरत होती है, ठीक उसी तरह पानी की भी जरूरत होती है. यही वजह है कि जल को जीवन माना जाता है. पानी तो सभी लोग पीते हैं, लेकिन यह भी जरूरी है कि पानी सही बर्तन में पिया जाए. कई लोग पानी पीने के लिए कांच के बर्तन इस्तेमाल करते हैं, तो कुछ लोग प्लास्टिक के बर्तन यूज करते हैं. पिछले कुछ समय से ताम्रजल यानी तांबे के बर्तन में रखे पानी का चलन तेजी से बढ़ा है.
इसे एक जादुई नुस्खा मानकर हर कोई अपना रहा है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि आयुर्वेद के अनुसार तांबे का पानी हर किसी के लिए फायदेमंद नहीं होता है. तांबा एक सक्रिय धातु है जो पानी के गुणों को पूरी तरह बदल देती है. आयुर्वेद का सिद्धांत है कि कोई भी औषधि हर व्यक्ति पर एक जैसा प्रभाव नहीं डालती है. जो एक के लिए दवा है, वह दूसरे के लिए जहर भी हो सकती है.
आयुर्वेद के अनुसार तांबे की प्रकृति गर्म और तीक्ष्ण होती है. यह शरीर में अग्नि तत्व को बढ़ाता है, जिससे पाचन तो सुधरता है, लेकिन पित्त दोष को भी बढ़ा जेता है. जिन लोगों का शरीर पहले से ही गर्म प्रकृति का है या जिन्हें गर्मी से जुड़ी समस्याएं रहती हैं, उनके लिए ताम्रजल फायदे की जगह नुकसान पहुंचा सकता है. आयुर्वेद स्पष्ट करता है कि किसी भी द्रव्य का सेवन व्यक्ति की प्रकृति, अवस्था और वर्तमान ऋतु को देखकर ही किया जाना चाहिए.
जिन लोगों की शारीरिक प्रकृति पित्त प्रधान है, उन्हें तांबे के बर्तन में रखा पानी पीने से बचना चाहिए. पित्त के बढ़ने से शरीर में अत्यधिक गर्मी, एसिडिटी, हाथ-पैरों में जलन और त्वचा पर चकत्ते जैसी समस्याएं हो सकती हैं. अगर आप पहले से ही नकसीर फूटने या भारी ब्लीडिंग जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं, तो ताम्रजल आपकी मुश्किलों को बढ़ा सकता है.
आधुनिक विज्ञान और आयुर्वेद दोनों इस बात पर सहमत हैं कि लिवर और किडनी के रोगियों को ताम्रजल के सेवन में बेहद सावधानी बरतनी चाहिए. तांबा शरीर में संचित होने वाली धातु है. अगर लिवर या किडनी सही तरीके से काम नहीं कर रहे हैं, तो शरीर अतिरिक्त कॉपर को बाहर नहीं निकाल पाता है. इससे अंगों पर फिल्टर करने का दबाव बढ़ जाता है और कॉपर टॉक्सिसिटी का खतरा पैदा हो जाता है, जो स्वास्थ्य के लिए गंभीर स्थिति हो सकती है.
इसके अलावा डायबिटीज के मरीजों के लिए भी तांबे का जल हमेशा लाभकारी नहीं होता. कई मामलों में डायबिटीज के रोगियों की शारीरिक प्रवृत्ति पित्त की ओर झुकी होती है. रीर में कॉपर की अधिकता ब्लड शुगर के स्तर को असंतुलित कर सकती है. साथ ही, यह रक्त वाहिकाओं पर अतिरिक्त दबाव डालता है, जिससे ब्लड प्रेशर से जुड़ी जटिलताएं बढ़ सकती हैं.
छोटे बच्चों की पाचन अग्नि यानी डाइजेस्टिव फायर वयस्कों जितनी मजबूत नहीं होती. सुबह खाली पेट ताम्रजल पीना शरीर के लिए काफी भारी होता है और इसे पचाने में तंत्र को कड़ी मेहनत करनी पड़ती है. बच्चों के कोमल अंगों के लिए कॉपर की सांद्रता को संभालना मुश्किल हो सकता है.
विशेषज्ञों के अनुसार बच्चों को प्राकृतिक रूप से शुद्ध और सामान्य तापमान वाला जल देना ही सबसे सुरक्षित और लाभकारी रहता है. अगर आप स्वस्थ हैं और ताम्रजल पीना चाहते हैं, तो इसके नियमों का पालन करना अनिवार्य है. पानी को तांबे के बर्तन में कम से कम 8 घंटे तक रखा जाना चाहिए, लेकिन इसे कभी भी 12 घंटे से अधिक न रखें. लगातार इसे पीने के बजाय 3 महीने के सेवन के बाद 1 महीने का गैप जरूर दें.

























































