नई दिल्ली। स्मार्टफोन की दुनिया अब एक नए और रोमांचक दौर में प्रवेश कर रही है। वह दिन अब दूर नहीं जब खराब नेटवर्क या “नो सिग्नल” जैसी बातें बीते जमाने की हो जाएंगी। प्रसिद्ध रिसर्च फर्म ‘काउंटरपॉइंट रिसर्च’ की एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार, सैटेलाइट कनेक्टिविटी वाले स्मार्टफोन्स अब बहुत तेजी से बाजार में अपनी जगह बना रहे हैं। अनुमान है कि साल 2030 तक दुनिया भर में बिकने वाले कुल स्मार्टफोन्स में से 46 प्रतिशत (लगभग आधे) फोन ‘डायरेक्ट-टू-सैटेलाइट’ (NTN-capable) कनेक्टिविटी से लैस होंगे।
हालांकि, शुरुआत में यह सुविधा कंपनियों के अपने खास नेटवर्क पर ही ज्यादा चलेगी, क्योंकि एक कॉमन ग्लोबल स्टैंडर्ड (जैसे 3GPP NTN) को पूरी तरह तैयार होने में अभी समय लगेगा।
एपल ने की थी शुरुआत, अब कई ब्रांड्स दौड़ में
इस तकनीक की शुरुआत का श्रेय एपल (Apple) को जाता है। साल 2022 में आईफोन 14 के साथ एप्पल ने सैटेलाइट एसओएस (SOS) फीचर पेश कर पूरी दुनिया को चौंका दिया था। इसके लिए एपल ने सैटेलाइट कंपनी ‘ग्लोबलस्टार’ से हाथ मिलाया था। मजेदार बात यह है कि हाल ही में ई-कॉमर्स दिग्गज अमेजन (Amazon) ने ग्लोबलस्टार को खरीद लिया है, जिससे अमेजन के लिए भी ‘कनेक्टिविटी-एज-ए-सर्विस’ का एक नया और बड़ा बाजार खुल गया है।
एपल के बाद साल 2023 में चीनी कंपनी हुआवेई (Huawei) ने अपने फोन में यह सुविधा दी। आज, हालात यह हैं कि सैमसंग, गूगल, शाओमी, ओप्पो और वीवो जैसे 10 से अधिक बड़े स्मार्टफोन ब्रांड्स अपने चुनिंदा फोन्स में सैटेलाइट कनेक्टिविटी दे रहे हैं।
कौन सी कंपनी है कितनी आगे?
काउंटरपॉइंट के प्रिंसिपल एनालिस्ट, सौमेन मंडल का कहना है कि जब बात सैटेलाइट कनेक्टिविटी वाले फोन्स बेचने की आती है, तो एप्पल आज भी सबसे बड़ा खिलाड़ी है। वहीं, एंड्रॉइड (Android) की दुनिया में सैमसंग (Samsung) सबसे आगे चल रहा है। एपल, हुआवेई और गूगल अपने खुद के प्राइवेट सैटेलाइट नेटवर्क इस्तेमाल करने की रणनीति पर चल रहे हैं। दूसरी तरफ, सैमसंग और अन्य चीनी ब्रांड्स 3GPP NTN नाम के एक कॉमन स्टैंडर्ड को अपना रहे हैं, ताकि भविष्य में इसे बड़े पैमाने पर और आसानी से सभी के लिए उपलब्ध कराया जा सके।
महंगे फोन्स तक ही सीमित क्यों है यह फीचर?
फिलहाल, सैटेलाइट कॉलिंग की सुविधा ज्यादातर बहुत ही प्रीमियम (महंगे) स्मार्टफोन्स में ही मिल रही है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि अभी इस तकनीक का इस्तेमाल सिर्फ इमरजेंसी मैसेज भेजने (SOS) तक ही सीमित है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक इस तकनीक में कोई “किलर यूज़ केस” (जैसे आम कॉलिंग या इंटरनेट) नहीं जुड़ता, तब तक आम लोग इसे तवज्जो नहीं देंगे। 3GPP रिलीज 18 के आने से यह प्रीमियम फोन्स में तो और फैलेगा, लेकिन आम आदमी के बजट वाले मिड-रेंज फोन्स में इसकी एंट्री 3GPP रिलीज 19 के आने के बाद ही संभव हो पाएगी।
अमेरिका बना लीडर, दुनिया को है इंतजार
वर्तमान में सैटेलाइट कनेक्टिविटी के मामले में अमेरिका सबसे आगे है। वहां की बड़ी टेलीकॉम कंपनियों जैसे टी-मोबाइल ने स्पेसएक्स (SpaceX) के साथ, तो एटीएंडटी ने एएसटी मोबाइल के साथ बड़े करार किए हैं। हालांकि, यूरोप और चीन जैसे अन्य बड़े बाजारों में टेलीकॉम कंपनियां अभी इस तकनीक को लाने में कोई जल्दबाजी नहीं दिखा रही हैं।

























































