पुरी। ओडिशा के पुरी में ऐतिहासिक गुंडिचा मंदिर मंगलवार को छह साल के लंबे अंतराल के बाद एक बार फिर श्रद्धालुओं के लिए खोल दिया गया. मंदिर के कपाट खुलने के साथ ही बड़ी संख्या में श्रद्धालु और तीर्थयात्री यहां दर्शन के लिए पहुंचे. श्रद्धालुओं को चतुर्धा मूर्ति की जन्मवेदी यानी आडप मंडप के दर्शन का अवसर मिला. श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन की प्रबंध समिति के निर्णय के अनुसार गुंडिचा मंदिर में प्रवेश के लिए श्रद्धालुओं को 10 रुपये का शुल्क देना होगा. मंदिर प्रशासन ने श्रद्धालुओं की सुविधा को ध्यान में रखते हुए जूते-चप्पल और मोबाइल फोन जमा करने की निशुल्क व्यवस्था की है. वहीं दिव्यांगजन, बच्चों और 80 वर्ष से अधिक आयु के बुजुर्गों को निशुल्क दर्शन की अनुमति दी जाएगी.
मंदिर खुलने के पहले दिन श्रद्धालुओं, तीर्थयात्रियों और पर्यटकों के प्रवेश के लिए सिंहद्वार का इस्तेमाल किया जा रहा है. दर्शन के बाद श्रद्धालुओं की निकासी की व्यवस्था भी इसी द्वार से की गई है. मंदिर परिसर में सुरक्षा और श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए प्रशासन की ओर से आवश्यक इंतजाम किए गए हैं. मंदिर के दोबारा खुलने के मौके पर मुख्य प्रशासक डॉ. अरविंद पाढ़ी, पुलिस अधीक्षक प्रतीक सिंह, मंदिर प्रबंध समिति के सदस्य, सेवायत और अन्य अधिकारी मौजूद रहे.
बाबेना भूत की लोकमान्यता भी चर्चा में
गुंडिचा मंदिर स्थानीय मान्यताओं को लेकर भी चर्चा में रहता है. स्थानीय लोगों के बीच एक लोकमान्यता प्रचलित है कि मंदिर में बाबेना भूत का वास है. मंदिर के श्रद्धालुओं के लिए खुलने के बाद स्थानीय स्तर पर इस मान्यता को लेकर चर्चाएं भी शुरू हो गई हैं. हालांकि यह पूरी तरह स्थानीय लोकविश्वास है और इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है.
रथ यात्रा से जुड़ा है विशेष धार्मिक महत्व
गुंडिचा मंदिर पुरी स्थित मुख्य जगन्नाथ मंदिर से करीब तीन किलोमीटर की दूरी पर है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसे भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा की मौसी का घर माना जाता है. विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ मुख्य मंदिर से निकलकर गुंडिचा मंदिर पहुंचते हैं और यहां कुछ दिनों तक विराजमान रहते हैं.
गुंडिचा मंदिर को रथ यात्रा का प्रमुख गंतव्य माना जाता है. पुराणों और धार्मिक परंपराओं में इस स्थान को भगवान जगन्नाथ की जन्मवेदी और पवित्र स्थल के रूप में भी महत्व दिया गया है. मंदिर पारंपरिक कलिंग वास्तुकला का उदाहरण है और चारों ओर सुंदर बगीचों व प्राचीरों से घिरा हुआ है. वर्ष के अधिकांश समय मंदिर अपेक्षाकृत शांत रहता है, जबकि रथ यात्रा के दौरान यहां देश-विदेश से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं. छह साल बाद मंदिर के खुलने से श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह देखने को मिला.




















































