नई दिल्ली। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ऐतिहासिक निचले स्तर 97 के करीब पहुंचे भारतीय रुपये को संभालने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने कड़े कदम उठाए हैं. शनिवार को रिजर्व बैंक द्वारा उठाए गए इन सख्त कदमों का असर अब अंतर्राष्ट्रीय और ऑफशोर (ऑफशोर NDF) बाजारों में भी दिखने लगा है.
वन-मंथ नॉन-डिलीवरेबल फॉरवर्ड्स (NDF) बाजार में रुपया डॉलर के मुकाबले 2.7% तक मजबूत होकर 94.17 के स्तर पर पहुंच गया. हालांकि बाद में यह तेजी थोड़ी घटकर 0.7% रह गई. सोमवार को घरेलू बाजार खुलते ही रुपये में तेजी आने की पूरी उम्मीद है. आइए समझते हैं कि रिजर्व बैंक के इन फैसलों का बाजार और आम लोगों पर क्या असर पड़ेगा.
RBI ने डॉलर की मांग घटाने के लिए क्या फैसले लिए?
सट्टेबाजी रोकने और बाजार में डॉलर की आर्टिफिशल मांग को खत्म करने के लिए RBI ने ये कड़े कदम उठाए हैं:
तेल कंपनियों को सीधा डॉलर: सरकारी तेल कंपनियों को अपनी डॉलर की जरूरतें पूरी करने के लिए अब सीधे RBI की स्पेशल विंडो का इस्तेमाल करना होगा, जिससे वे आम बाजार से डॉलर नहीं खरीदेंगी.
फारेन एक्सचेंज रिस्क रिजर्व: बैंकों के लिए $2 मिलियन से ऊपर के इम्पोर्टर्स हेज का 20% रिस्क रिजर्व के रूप में RBI के पास जमा करना अनिवार्य कर दिया गया है.
सट्टेबाजी पर शिकंजा: बिना वास्तविक लेनदेन वाले डेरिवेटिव पोजीशन की सीमा को $100 मिलियन से घटाकर सीधे $5 मिलियन कर दिया गया है. साथ ही कैंसल किए गए फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट्स को रीबुक करने पर रोक लगा दी गई है.
आम जनता की जेब पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा?
हाल ही में RBI ने रेपो रेट 0.25% बढ़ाकर 5.50% कर दिया था और आगे भी ब्याज दरें बढ़ाने के संकेत दिए हैं. इन फैसलों का सीधा असर आपकी जेब पर पड़ेगा:
महंगाई का खतरा: त्योहारी सीजन की शुरुआत हो चुकी है. आयातक कंपनियों पर हेजिंग लागत बढ़ने से इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटो पार्ट्स और अन्य आयातित सामान महंगे हो सकते हैं.
लोन की EMI बढ़ेगी: ब्याज दरों में बढ़ोतरी के कारण होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन की दरें बढ़ सकती हैं, जिससे हर महीने जाने वाली EMI का बोझ बढ़ेगा.
विदेश यात्रा और पढ़ाई: डॉलर के मुकाबले रुपये में आने वाले सुधार से विदेश यात्रा करने वालों और पढ़ाई कर रहे छात्रों को थोड़ी राहत मिलेगी.
क्या ये कदम रुपये को स्थायी मजबूती दे पाएंगे?
विशेषज्ञों का कहना है कि RBI के ये फैसले तात्कालिक राहत तो देंगे, लेकिन यह समस्या का स्थायी समाधान नहीं है. भारत और अमेरिका के 10 साल वाले बॉन्ड यील्ड का अंतर घटकर 205 बेसिस पॉइंट रह गया है, जो 22 साल के निचले स्तर पर है.
अमेरिका में ज्यादा रिटर्न मिलने की वजह से विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से पैसा निकाल रहे हैं. यदि अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में लगातार बढ़ोतरी जारी रहती है, तो रिजर्व बैंक को आने वाले समय में रुपये की गिरावट रोकने के लिए ब्याज दरों में और अधिक बढ़ोतरी का कड़ा फैसला लेना पड़ सकता है.























































