नई दिल्ली: कई बार आपसी विवादों में खासकर वैवाहिक मामलों में यह देखने में आया है कि वकील विपक्षी पक्ष को कानूनी पचड़े में फंसाने के लिए कई बड़ा आरोप लगा देते है। इस तरह के मामलों में बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा प्रदान करने के लिए बनाए गए पॉक्सो POCSO कानून के दुरुपयोग एक बड़ा उदाहरण है। ऐसे मामलों में इसके दुरुपयोग को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है।
इस पूरे मामले को गंभीरता से समझना जरूरी है। इसके लीगल एंगल को समझेंगे…और इससे जुड़े खास पहलू क्या हैं? शीर्ष अदालत को क्या चिंता है?
क्या बच्चों को कानूनी लड़ाई का हथियार बनाया जा रहा है?
हाल के वर्षों में वैवाहिक विवादों के दौरान पति और उसके परिवार पर दबाव बनाने, आर्थिक समझौते में बढ़त हासिल करने तथा व्यक्तिगत प्रतिशोध लेने का चलन ज्यादा हो गया है। पक्ष-विपक्ष इसके लिए कानूनी प्रावधानों का सहारा लेते हैं। ऐसे मामलों में झूठे पॉक्सो मामलों का इस्तेमाल बढ़ता दिखाई दे रहा है।POCSO चूंकि बच्चों से जुड़े यौन-दुर्व्यवहारों के मामलों से गंभीरता से जुड़ा है, और इसके कड़े प्रावाधानों के जरिए कड़ी सजा तय की गई है, इसलिए यह सच है कि बच्चों को कानूनी लड़ाई का हथियार बनाया जा रहा है।
वैवाहिक विवादों में झूठे POCSO मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा
सु्प्रीम कोर्ट ने इस प्रवृत्ति को चिंताजनक बताते हुए कहा कि इससे न केवल निर्दोष लोगों को परेशानी होती है, बल्कि वास्तविक पीड़ितों के मामलों की गंभीरता भी प्रभावित होती है।
न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने यह टिप्पणी एक ऐसे मामले की सुनवाई के दौरान की, जिसमें पति और उसके परिवार के खिलाफ पॉक्सो अधिनियम, दुष्कर्म और अन्य आपराधिक धाराओं के तहत दर्ज 10 से अधिक मामलों को चुनौती दी गई थी।
अदालत ने रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों की जांच के बाद पाया कि आरोप सामान्य, अस्पष्ट और पर्याप्त सबूतों से रहित थे। इसके बाद अदालत ने सभी आपराधिक कार्यवाहियों को रद्द कर दिया।
आपराधिक कानूनों का दुरुपयोग केवल वैवाहिक विवादों तक सीमित नहीं है, बल्कि पारिवारिक, व्यावसायिक और वित्तीय विवादों में भी POCSO एक्ट के प्रावधानों का गलत इस्तेमाल किया जा रहा है, जो कि चिंताजनक है। ऐसे झूठे मुकदमे निर्दोष लोगों को परेशान करने के साथ-साथ न्यायिक व्यवस्था पर भी अनावश्यक बोझ डालते हैं। इनसे बचना होगा।
अदालत ने वकीलों और निचली अदालतों को क्या सलाह दी
- अदालतों और वकीलों की जिम्मेदारी है कि वे निराधार मुकदमों को बढ़ावा न दें।
- न्यायालय ने कहा कि अधिवक्ताओं को अपने मुवक्किलों को झूठे या दुर्भावनापूर्ण आपराधिक मुकदमे दर्ज कराने के बजाय कानूनी और वैधानिक उपायों का सहारा लेने की सलाह देनी चाहिए।
- सुप्रीम कोर्ट इस मसले पर काफी गंभीर रहा। अदालत ने साफ किया कि न्याय प्रणाली का उद्देश्य व्यक्तिगत बदला लेने का मंच उपलब्ध कराना नहीं है। ऐसे में न्यायलयों के साथ साथ और वकीलों की जिम्मेदारी है कि जानबूझ कर अपने मुवक्किलों को झूठे या दुर्भावनापूर्ण आपराधिक मुकदमे दर्ज कराने से बचने की कोशिश करें।
फिर वास्तविक पीड़ितों और झूठे मामलों के बीच संतुलन बनाने की कवायद
सुप्रीम कोर्ट की बड़ी चिंता एक यह भी है। पॉक्सो चूंकि कड़ा कानूनी प्रावधान है, जिसमें जमानत मिलने में मुश्किल होती है। इसलिए अदालत का मानना है कि केवल आरोपों के आधार पर किसी व्यक्ति को लंबे समय तक आपराधिक मुकदमे में उलझाए रखना न्याय के मूल सिद्धांतों के विपरीत है। सभी अदालतों को एक ही साथ बच्चों और महिलाओं को प्रभावी कानूनी संरक्षण उपलब्ध कराना और दूसरा, कानून के दुरुपयोग से निर्दोष लोगों को बचाना, का पालन करना चाहिए। न्यायालयों को शुरुआती चरण में ही शिकायतों की विश्वसनीयता और उपलब्ध साक्ष्यों की सावधानीपूर्वक जांच कर के संतुष्ट हो जाना चाहिए।
आखिर में कानून का गलत इस्तेमाल न्याय व्यवस्था पर बोझ
- यदि मामला दर्ज कराते हुए अधिवक्ता शीर्ष अदालक के निर्देशों का पालन करें, तो सचमुच में न्यायवस्था पर बोझ कम होगा। लंबी अदालती प्रक्रियाओं में जाया होने वाला समय बचेगा।
- खास बात यह है कि कानून का उद्देश्य न्याय सुनिश्चित करना है, न कि उसे व्यक्तिगत संघर्षों में हथियार के रूप में इस्तेमाल करना।
- कुल मिलाकर , यह कहा जा सकता है …सुप्रीम कोर्ट ने अपनी चिंता के जरिए साफ कर दिया है कि संदेश गया है कि जहां वास्तविक पीड़ितों को कानून का पूरा संरक्षण मिलना चाहिए, वहीं झूठे और मनगढ़ंत मामलों के प्रति भी न्यायपालिका को समान रूप से सचेत और प्रभावी रहना होगा।
























































