नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव ने पूरी दुनिया को हैरान कर दिया है. जंग की आग में कई देश झुलस रहे हैं. अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ (Operation Epic Fury) के तहत 28 फरवरी 2026 को ईरान के खिलाफ युद्ध का ऐलान तो कर दिया, लेकिन इस जंग को अब लगभग दो हफ्ते होने वाले हैं और अभी तक इसका कोई अंतिम नतीजा सामने नहीं आया है. दुनिया में अपनी ताकत के लिए मशहूर अमेरिकी सेना अब तक जीत का झंडा नहीं फहरा पाई है.
हालांकि, ट्रंप बार-बार दावा कर रहे हैं कि “हमने पहले ही दिन ईरान को खत्म कर दिया, ईरान तबाह हो गया, खामेनेई को मार दिया और कई बड़े नेताओं को खत्म कर दिया.” लेकिन जमीनी हालात इन दावों से काफी अलग नजर आ रहे हैं. अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर अमेरिका यह जंग जीत क्यों नहीं पा रहा है? दरअसल, ट्रंप एक ऐसे जाल में फंस गए हैं जहां से निकलना आसान नहीं दिख रहा. वह न तो पूरी तरह जीत का दावा कर पा रहे हैं और न ही युद्ध से पीछे हट सकते हैं.
कुल मिलाकर, ईरान के साथ इस संघर्ष में ट्रंप एक ऐसे मोड़ पर खड़े हैं जहां हर तरफ जोखिम ही जोखिम दिखाई दे रहा है. ईरान की सेना भले ही संसाधनों के मामले में कमजोर लगती हो, लेकिन वह ऐसे तरीके से मुकाबला कर रही है कि अमेरिका की पूरी ताकत भी फिलहाल निर्णायक साबित नहीं हो पा रही. CNN में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, आइए जानते हैं वे सात बड़ी वजहें, जिनकी वजह से ट्रंप को इस जंग में साफ जीत हासिल करने में मुश्किल हो रही है.
दुनिया की तेल नस पर वार: होर्मुज जलडमरूमध्य बंद कर ईरान ने बढ़ाई टेंशन: ईरान ने दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों में से एक होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने का फैसला किया है. यह वही रास्ता है जिससे होकर दुनिया के करीब 20 प्रतिशत तेल का व्यापार होता है. इस रास्ते के बंद होने से वैश्विक तेल आपूर्ति पर सीधा असर पड़ा है और कई देशों की चिंता बढ़ गई है.
खास बात यह है कि अमेरिका के अंदर भी पेट्रोल और गैस की कीमतों को लेकर दबाव बढ़ने लगा है. विश्लेषकों का मानना है कि अगर यह रास्ता लंबे समय तक बंद रहा तो वैश्विक ऊर्जा संकट खड़ा हो सकता है. ऐसे में अमेरिका के लिए सिर्फ सैन्य ताकत के दम पर इस जलडमरूमध्य को दोबारा खोलना आसान नहीं माना जा रहा. जिससे पूरी दुनिया में अमेरिका के प्रति एक सवाल उठ सकते हैं.
‘बूट्स ऑन ग्राउंड’ से बच रहा अमेरिका, जंग अधूरी रहने का खतरा: अमेरिका और इजरायल अभी तक इस युद्ध में मुख्य रूप से हवाई हमलों पर निर्भर हैं. इन हमलों से ईरान की सैन्य क्षमताओं को कुछ नुकसान जरूर पहुंचा है, लेकिन किसी देश की सत्ता बदलने या उसे पूरी तरह नियंत्रण में लेने के लिए सिर्फ हवाई हमले काफी नहीं होते. डोनाल्ड ट्रंप पहले ही साफ कर चुके हैं कि वे “बूट्स ऑन ग्राउंड” यानी जमीनी सेना भेजने के पक्ष में नहीं हैं. इराक और अफगानिस्तान के लंबे और महंगे युद्धों के अनुभव के बाद अमेरिका में इस तरह के फैसले को राजनीतिक रूप से बेहद जोखिम भरा माना जाता है.
ईरान की ‘लंबी जंग’ की रणनीति, उम्मीद से ज्यादा मजबूत निकला खामेनेई का सिस्टम: अमेरिका को उम्मीद थी कि शुरुआती हमलों के बाद ईरान का राजनीतिक और सैन्य सिस्टम जल्दी कमजोर पड़ जाएगा. लेकिन ऐसा होता नजर नहीं आ रहा है. ईरान की क्रांतिकारी सरकार, उसकी सुरक्षा व्यवस्था और क्षेत्रीय नेटवर्क काफी मजबूत साबित हो रहे हैं. कई विशेषज्ञ मानते हैं कि ईरान लंबे समय तक चलने वाले युद्ध के लिए तैयार है. अगर वहां की सत्ता व्यवस्था अचानक ढहती है तो पूरे मध्य-पूर्व में अराजकता फैल सकती है, जिससे हालात और खतरनाक हो सकते हैं.
ड्रोन और मिसाइलों का नया खेल, कम लागत में बड़ा नुकसान: इस युद्ध में ईरान ने ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइलों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल शुरू कर दिया है. सैन्य विशेषज्ञों का कहना है कि कम लागत वाले ड्रोन और समुद्री हमलों के जरिए ईरान अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए लगातार खतरा पैदा कर सकता है. खासतौर पर तेल टैंकरों और नौसैनिक जहाजों पर ड्रोन हमले से समुद्री व्यापार को गंभीर नुकसान हो सकता है. यही कारण है कि फारस की खाड़ी का पूरा इलाका इन दिनों बेहद संवेदनशील बना हुआ है.
अमेरिका में ट्रंप पर बढ़ता राजनीतिक दबाव: डोनाल्ड ट्रंप ने अपने चुनाव अभियान के दौरान वादा किया था कि अमेरिका को “नई जंगों से दूर” रखा जाएगा. लेकिन ईरान के साथ यह संघर्ष उनकी राजनीतिक छवि पर दबाव बना रहा है. अमेरिका में विपक्षी डेमोक्रेट्स और कई विश्लेषक इस युद्ध की वैधता पर सवाल उठा रहे हैं. नागरिक हताहतों की खबरें और तेल की बढ़ती कीमतें भी अमेरिकी जनता की चिंता बढ़ा रही हैं. ऐसे में ट्रंप प्रशासन पर युद्ध को जल्द खत्म करने का दबाव लगातार बढ़ रहा है.
खामेनेई की मौत के बाद भी नहीं डगमगाया ईरान का सिस्टम: युद्ध के शुरुआती दौर में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत ने पूरी दुनिया को चौंका दिया था. माना जा रहा था कि इससे ईरान की सत्ता व्यवस्था में भारी उथल-पुथल मचेगी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. खामेनेई के बेटे मोजतबा खामेनेई को नया नेता बनाए जाने के बाद सत्ता का ढांचा तेजी से स्थिर हो गया. इससे अमेरिका की वह उम्मीद कमजोर पड़ गई कि ईरान के अंदर राजनीतिक अस्थिरता बढ़ेगी और सरकार गिर सकती है.
अमेरिका-इजरायल साथ जरूर, लेकिन रणनीति अलग-अलग: हालांकि इस युद्ध में अमेरिका और इजरायल एक साथ खड़े नजर आते हैं, लेकिन दोनों देशों की प्राथमिकताएं पूरी तरह एक जैसी नहीं हैं. इजरायल लंबे समय तक संघर्ष जारी रखने के लिए तैयार दिखाई देता है, क्योंकि वह ईरान की सैन्य ताकत को स्थायी रूप से कमजोर करना चाहता है.
दूसरी ओर अमेरिका जल्दी परिणाम चाहता है. ट्रंप ने शुरुआत में इस युद्ध को “जल्दी खत्म होने वाला संघर्ष” बताया था, लेकिन अब प्रशासन की बदलती बयानबाजी से साफ है कि कोई स्पष्ट रणनीति सामने नहीं है. अमेरिका “बिना शर्त समर्पण” की मांग कर रहा है, जबकि ईरान झुकने को तैयार नहीं है. यही वजह है कि यह युद्ध अभी भी अनिश्चित दिशा में बढ़ता दिखाई दे रहा है.

























































