नई दिल्ली: कोई भी ग्रह किन विशिष्ट स्थितियों में श्रेष्ठ फल देगा, अशुभ फल देगा अथवा प्रभावहीन हो जाएगा, इसका विचार ग्रहों के बल के बारे में जानकारी होने पर होता है। ज्योतिष सीखने की प्रारम्भिक अवस्था में ज्यादा विस्तार से न जाकर उच्च ग्रह, परम उच्च ग्रह, नीच ग्रह, परम नीच ग्रह, मूल त्रिकोण ग्रह, अस्त ग्रह आदि की जानकारी रखना बेहद जरूरी है। भचक्र में ग्रहों की गति के कारण राशि और नक्षत्रों के किन्हीं अंशों के माध्यम से जब ग्रह गुजरते हैं, तो वे बल को प्राप्त करते हैं अथवा बल से हीन, निर्बल हो जाते हैं।
ग्रहों की निर्बलता के प्रभाव को इस प्रकार समझा जा सकता है, जैसे कोई भिक्षुक दूसरों से मिली सहायता पर ही आश्रित रहता है, वह स्वयं स्थिति का चुनाव नहीं कर सकता है, उसी प्रकार जन्म कुण्डली में ग्रह निर्बल होने पर व्यक्ति का कल्याण करने में असक्षम हो जाते हैं।
उच्च का ग्रह बलवान होने के कारण उच्च भावना या प्रवृत्ति दर्शाता है। उच्च का ठीक उल्टा नीच होता है, नीच का ग्रह बलहीन होने के कारण नीचता की ओर प्रवृत्ति या सोच जातक को देता है, ऐसा अभिप्राय लगाया जा सकता है। शोधकार्य में संलग्न विद्यार्थियों को चाहिए कि वे कुछ जन्मपत्रियों को एकत्र करें, जिनमें उच्च का ग्रह होने पर और नीच का ग्रह होने पर व्यवहार में जो अंतर आ जाता है, उसका तुलनात्मक अध्ययन करके देखें, इससे फलित करने में माहिरता आने लगेगी।
परन्तु एक बात ज्योतिषीय फलादेश करते समय हमेशा याद रखना चाहिए कि जब तक जन्मकुण्डली का पूर्ण विश्लेषण, ज्योतिष के फलित के अन्य सभी सिद्धांतों को लागू करके न देख लिया जाए, तब तक कोई सही अथवा अन्तिम निष्कर्ष नहीं दिया जा सकता है।
ग्रहों के तुलनात्मक अथवा सापेक्ष बल को समझने के लिए ग्रहों की प्रत्येक प्रकार की स्थिति को जानना अति आवश्यक है। जैसे ग्रह स्वराशि में है, या उच्च राशि में है, मूल त्रिकोण राशि में है, अथवा मित्र राशि में है, नीच की राशि में है अथवा शत्रु की राशि में है।

























































