नई दिल्ली। कार्तिक आर्यन और अनन्या पांडे की मूवी तू मेरी मैं तेरा मैं तेरा तू मेरी अमेजन प्राइम वीडियो पर आ चुकी है। फिल्म बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप रही। अब ओटीटी पर लोग इसे देख भी रहे हैं। कई बार ऐसा भी होता है कि थिएटर में पिटी फिल्म ओटीटी पर खूब देखी जाती है। क्या कभी आपने सोचा कि फिल्म पिटने के बाद भी ओटीटी राइट्स क्यों बिक जाते हैं? खरीदा भी होगा तो कितने में और ओटीटी को इससे क्या फायदा होगा। चलिए समझते हैं ओटीटी का गणित।
ओटीटी डील होती कब है?
ये पॉइंट काफी इंट्रेस्टिंग है। ओटीटी राइट्स की डील ज्यादातर तब होती है जब फिल्म की शूटिंग चल रही होती है या कई बार जब ट्रेलर आने वाला होता है। उसी वक्त ओटीटी की तरफ से फिल्म के राइट्स खरीदने की बात चलने लगती है। यानी थिएटर में फिल्म हिट हुई या फ्लॉप, ओटीटी को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता, डील पहले ही तय हो जाती है।
कीमत कैसे तय होती है?
ओटीटी प्लेटफॉर्म किसी फिल्म के राइट्स खरीदते वक्त कई चीजें देखता है। पहला फैक्टर स्टार पावर होता। अगर फिल्म में शाहरुख खान, आलिया भट्ट या रणवीर सिंह हैं, तो राइट्स की कीमत अपने आप बढ़ जाती है। ओटीटी जानता है कि इन नामों से सब्सक्राइबर्स आकर्षित होते हैं।
दूसरा फैक्टर है ओरिजिनल बजट। जिस फिल्म को बनाने में 100 करोड़ लगे हों, उसकी ओटीटी डील 50 करोड़ तक भी हो सकती है भले ही वो थिएटर में फ्लॉप हो गई हो। वजह कि ओटीटी को क्वॉलिटी प्रोडक्ट चाहिए।
तीसरा है कंटेंट का टाइप। ओटीटी प्लेटफॉर्म्स हमेशा ऐसी फिल्में चाहते हैं जो अलग-अलग दर्शकों को खींचें। एक थ्रिलर, एक फैमिली ड्रामा, एक ऐक्शन फिल्म – उनकी लाइब्रेरी डाइवर्स होनी चाहिए। इसलिए कभी-कभी ऐवरेज मूवी को भी ठीक दाम में ले लेते हैं क्योंकि उन्हें हर तरह के दर्शक को खींचना है।
फ्लॉप फिल्म ज्यादा महंगी कैसे?
यह सुनने में अजीब लगता है, लेकिन कई बार थिएटर में फ्लॉप फिल्म ओटीटी पर ब्लॉकबस्टर बन जाती है। वजह यह है कि थिएटर जाने से पहले लोग कई चीजें सोचते हैं जैसे टिकट, पॉपकॉर्न, समय निकालना लेकिन ओटीटी पर वही फिल्म सोफे पर लेटे-लेटे देख सकते हैं। बहुत सी फिल्में हैं जो बड़े पर्दे के एक्सपीरियंस के लिए नहीं बनी होतीं, लेकिन घर पर देखने के लिए एकदम परफेक्ट होती हैं।
विंडो पीरियड क्या होता है?
पहले नियम था कि फिल्म थिएटर में रिलीज़ के आठ हफ्ते बाद ही ओटीटी पर आ सकती है – इसे थिएट्रकल विंडो कहते हैं। लेकिन अब यह विंडो छोटी होती जा रही है। कुछ फिल्में चार हफ्तों में ओटीटी पर आ जाती हैं। अगर थिएटर में बहुत बुरी हालत हो, तो प्रोड्यूसर जल्दी ओटीटी पर शिफ्ट करना चाहता है ताकि नुकसान कम हो।
प्रोड्यूसर को फायदा कैसे?
कई बार ओटीटी डील इतनी बड़ी होती है कि प्रोड्यूसर का पूरा बजट उसी से निकल आता है। मतलब थिएटर में एक भी टिकट न बिके, तब भी प्रोड्यूसर घाटे में नहीं। जैसे धुरंधर पार्ट 2 को तगड़ी रकम मिल चुकी है। इसीलिए आजकल बड़े प्रोड्यूसर्स थिएटर फर्स्ट, ओटीटी बैकअप की स्ट्रैटेजी पर काम करते हैं। सीधे शब्दों में कहें तो ओटीटी ने फिल्म इंडस्ट्री का रिस्क मॉडल पूरी तरह बदल दिया है। अब फ्लॉप फिल्म का मतलब बर्बादी नहीं, बस एक अलग प्लेटफॉर्म पर दूसरी पारी।

























































