नई दिल्ली। क्या आप भी कोलेस्ट्राल को अपना दुश्मन मानते हैं? दरअसल, समस्या कोलेस्ट्राल नहीं, बल्कि जीवनशैली व अन्य कारणों से रक्त में इसका संतुलन बिगड़ना है। रक्त में मौजूद यह मोम जैसा पदार्थ कोशिकाओं, हार्मोन और विटामिन डी के निर्माण के लिए आवश्यक है। यह कोशिका के बाहरी परत को मजबूती देता है और लिवर में पित्त बनाकर भोजन बनाने में मदद करता है।
हां, यह नुकसानदायक तब हो जाता है जब रक्त में गुड कोलेस्ट्राल की मात्रा कम होने लगती है और बैड कोलेस्ट्राल जिसे एलडीएल कहा जाता है, उसकी मात्रा बढ़ जाती है। उल्लेखनीय है कि बैड कोलेस्ट्राल के साथ भी लोग सामान्य जीवन जी रहे होते हैं लेकिन खतरा तब पैदा होता है जब आर्टरीज पर इसका जमाव बढ़ने लगता है और हार्ट अटैक या स्ट्रोक का जोखिम बढ़ता है। ‘इंडियन काउंसिल आफ मेडिकल रिसर्च’ (आईसीएमआर) के एक हालिया अध्ययन की मानें तो देश के 87.3 प्रतिशत वयस्कों में लिपिड प्रोफाइल, जिसमें कोलेस्ट्राल का मापन किया जाता है, उसमें खराबी पाई गई है।
खास बात यह है कि इसमें तकरीबन 35.5 करोड़ लोग ऐसे हैं, जिन्हें न डायबिटीज की समस्या है, न ही उच्च रक्तचाप या मोटापे की समस्या। ऐसे में कोलस्ट्राल के बढ़े हुए स्तर को लेकर हमें चिंता क्यों होनी चाहिए, क्या केवल कोलेस्ट्राल नियंत्रण से हृदय रोग या हार्ट अटैक को रोक पाना संभव है, कोलेस्ट्राल बढ़ा है तो इसकी दवा कब शुरू करनी चाहिए? आइए इन सभी पहलुओं के बारे में विस्तार से समझें।
सामान्य कोलेस्ट्राल में भी हो सकता है जोखिम
अगर आप भी सोचते हैं कि कोलेस्ट्राल सामान्य है तो हार्ट अटैक या स्ट्रोक का जोखिम कम हो जाता है तो यह पूरा सच नहीं है। कई मरीजों की संख्या कम नहीं है, जिनका लिपिड प्रोफाइल सामान्य होने के बावजूद वे हार्टअटैक के शिकार हुए हैं। दरअसल, हार्ट अटैक केवल एलडीएल या टोटल कोलेस्ट्राल बढ़ने से नहीं होता, बल्कि धमनियों में सूजन, आनुवंशिक कारण, लिपोप्रोटीन (ए), एपोलिपोप्रोटीन (बी), हाइ ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, धूमपान, मोटापा और कोरोनरी आर्टरी में कैल्शियम जमा होने जैसे कारणों से भी यह संभव है।
यही कारण है कि हार्ट से जुड़े खतरे का आकलन करते समय केवल एलडीएल या टोटल कोलेस्ट्राल ही नहीं, बल्कि अन्य जोखिम कारकों के बारे में भी जानना उतना ही महत्वपूर्ण है। परिवार में हार्ट से जुड़ी बीमारियों का इतिहास भी इसमें शामिल है। सबसे बेहतर उपाय यही है कि केवल कोलेस्ट्राल के स्तर को नियंत्रित रखने के साथ साथ डायबिटीज, हाइ बीपी और धूमपान की आदतों को लेकर भी सचेत होने की जरूरत है। चिकित्सक से परामर्श लेकर अपनी दिनचर्या और जीवनशैली में आवश्यक बदलाव करना चाहिए।
एलपीए है महत्वपूर्ण मार्कर
हार्ट से जुड़ी बीमारियों को लंबे समय तक कोलेस्ट्राल, उच्च रक्तचाप, मोटापे आदि से जोड़ा जाता रहा है, पर हाल के वर्षों में एक महत्वपूर्ण मार्कर जुड़ा है लिपोप्रोटीन (ए) यानी एलपीए। ब्लड में मौजूद यह घटक अब हार्ट अटैक, स्ट्रोक व शुरुआती तौर पर हार्ट से जुड़ी बीमारियों की पहचान करने या उसकी भविष्यवाणी करने में मददगार है। जब कोई स्वस्थ व्यक्ति हार्ट अटैक का शिकार होता है तो हमें एकदम से आश्चर्य होता है, लेकिन इसके अनेक कारण हैं जिसमें उसका बढ़ा हुआ एलपीए का स्तर भी है जो कि आर्टरीज को नुकसान पहुंचाता है।
इसके कारण वे सख्त और संकुचित होने लगती हैं। बता दें कि जिन व्यक्तियों में एलपी(ए) का स्तर 50 मिलीग्राम/डीएल से अधिक होता है, उन्हें कम उम्र में ही हार्ट से जुड़ी बीमारियां होने की आशंका अधिक होती है। ऐसे में अगर परिवार में हार्ट अटैक व हार्ट से जुडी बीमारियों का इतिहास रहा है, तो आपको कोलेस्ट्राल की जांच के साथ एलपी(ए) की जांच भी करा लेनी चाहिए। इससे आप अचानक हार्ट से जुड़ी समस्याओं के चपेट में आने से भी बच सकते हैं।
बच्चों में बढ़ता खतरा, किस उम्र में कराएं जांच
हमें समझने की जरूरत है कि 10-12 वर्ष की उम्र में मेटाबोलिज्म तेजी से बदलता है। ऐसे में अगर बच्चों की आदतें स्वस्थ हैं, वे खानपान और खेलकूद व्यायाम आदि नियमित रूप से करते हैं तो उनका स्वाभाविक विकास अपेक्षाकृत बेहतर होता है। लेकिन इन दिनों जिस तरह से बच्चों के सामान्य आहार में जंक फूड, पैकेज्ड स्नैक्स, स्वीट ड्रिंक्स और अत्यधिक तेल-मसाले वाला खानपान शामिल हो रहा है, वह नए तरह के जोखिम पैदा कर रहा है। इससे बैड कोलेस्ट्राल उनके आर्टरीज में छोटी उम्र से ही जमा होने लगते हैं।
घंटों मोबाइल/कंप्यूटर पर बैठे रहना, नींद पूरी न लेना, पढ़ाई व करियर का तनाव ऐसे कई कारक हैं जो बच्चों के हार्ट पर दबाव डाल रहे हैं। इससे कम उम्र में ही हार्ट की बीमारियों का जोखिम बढ़ रहा है। प्रयास करें कि 10 वर्ष की उम्र में बच्चे का पहला लिपिड प्रोफाइल जांच अवश्य करा लें। इससे उनमें हाइपोकोलेस्ट्रिमिया का पता चल सकता है। परिवार में अगर कोलेस्ट्राल का इतिहास रहा है, तब यह और भी जरूरी है। इसके बाद 20 की उम्र में दूसरा लिपिड प्रोफाइल चेक कराएं। फिर एक साल में और उसके बाद हर 4-5 साल में चेक कराते रहें।
ये है आपका लिपिड प्रोफाइल
रक्त जांच से लिपिड प्रोफाइल से ही कोलेस्ट्राल के स्तर का पता चलता है। इसमें मुख्य घटक मापे जाते हैं :
- कुल कोलेस्ट्राल : ब्लड में कुल कोलेस्ट्राल की मात्रा।
- एचडीएल (गुड कोलेस्ट्राल): इसकी मात्रा जितनी अच्छी होगी, हार्ट की बीमारी का जोखिम उतना ही कम हो सकता है, इसलिए इसे गुड कोलेस्ट्राल भी कहते हैं। यह आर्टरीज में जमा बैड कोलेस्ट्राल को लेकर वापस लिवर तक पहुंचाता है, फिर लिवर उस बैड कोलेस्ट्राल को शरीर से बाहर निकाल देता है।
- एलडीएल (बैड कोलेस्ट्राल): यह आर्टरीज में जमने वाला कोलेस्ट्राल होता है जो हार्ट स्ट्रोक या अटैक का कारण बनता है। रक्त में इसकी मात्रा अधिक होने पर आर्टरीज संकरी और कठोर बन जाती है। इससे रक्तसंचार बाधित होने लगता है, जिससे हार्ट अटैक या स्ट्रोक का जोखिम बढ़ता है।
- ट्राइग्लिसराइड्स: रक्त में मौजूद एक तरह का फैट, जिसका बढ़ा हुआ स्तर हार्ट से जुड़ी बीमारियों का जोखिम बढ़ा देता है।
ऐसे बढ़ जाएगा बैड कोलेस्ट्राल
- लगातार लंबे समय तक बैठे रहना
- आहार के प्रति असजगता व लापरवाही
- नियमित कसरत से दूरी
- अच्छी नींद में कोताही या नींद से जुड़ी स्वच्छता का ध्यान न रखना
- तनाव प्रबंधन न कर पाना
- धूमपान व अल्कोहल का सेवन
ये हैं हार्ट-फ्रेंडली अच्छी आदतें
- आहार में नियमित रूप से फल, सब्जियां, दालें और साबुत अनाज को शामिल करना
- वसा कम करने के साथ-साथ नमक की मात्रा भी कम रखना
- वजन नियंत्रण को प्राथमिकता समझना
- अगर धूमपान करते हैं तो इसे कम करने या बंद करने के उपायों पर काम करना
- प्रतिदिन कम से कम 30 मिनट शारीरिक गतिविधि

























































