पुरी। ओडिशा के पुरी में स्थित भगवान जगन्नाथ का मंदिर देश के सबसे प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों में से एक है। यहां हर दिन हजारों श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा के दर्शन करने पहुंचते हैं। मंदिर की कई परंपराएं ऐसी हैं, जो सदियों से चली आ रही हैं। इन्हीं में से एक है मंदिर के शिखर पर रोज ध्वजा फहराने की परंपरा।
जगन्नाथ पुरी मंदिर की ध्वजा केवल एक झंडा नहीं, बल्कि आस्था, पवित्रता और सदियों पुरानी परंपरा का प्रतीक है। मंदिर के शिखर पर रोज ध्वजा बदली जाती है। खास बात यह है कि इस परंपरा को आज भी एक विशेष परिवार के सदस्य निभा रहे हैं।
इस विषय पर हमारी बातचीत जगन्नाथ मंदिर के पूर्व टेंपल कमेटी सदस्य और पंडित माधव चंद्र महापात्रा से हुई है और उन्होंने हमें इस रस्म क महत्व और इससे जुड़ी खास बातें बताईं। आखिर मंदिर में ध्वजा लगाने का क्या महत्व है और कौन लोग इस परंपरा को निभाते हैं? आइए जानते हैं।
मंदिर के शिखर पर ध्वजा लगाने का क्या है महत्व?
हिंदू धर्म में मंदिर के शिखर पर ध्वजा लगाने की परंपरा का विशेष महत्व माना जाता है। यह ध्वजा मंदिर की पवित्रता, धार्मिक पहचान और भगवान के प्रति आस्था का प्रतीक होती है।
पंडित माधव चंद्र महापात्रा के अनुसार, “मंदिर के शिखर पर ध्वजा होना बेहद जरूरी माना जाता है। जिस तरह ब्राह्मणों के लिए शिखा का धार्मिक महत्व होता है, उसी तरह मंदिर के शिखर पर ध्वजा मंदिर को पूर्णता प्रदान करती है।”
पुराने समय में मंदिरों पर लगी ध्वजा को देखकर लोग कई तरह के संकेत भी समझते थे। ध्वजा किस दिशा में लहरा रही है, इसे लेकर अलग-अलग मान्यताएं प्रचलित थीं। हालांकि, जगन्नाथ मंदिर में ध्वजा का सबसे बड़ा महत्व धार्मिक आस्था और परंपरा से जुड़ा है।
कौन फहराता है जगन्नाथ मंदिर की ध्वजा?
जगन्नाथ मंदिर में ध्वजा फहराने की जिम्मेदारी एक विशेष सेवक परिवार के पास है। इस सेवा को चुनरा सेवा कहा जाता है और इसे चोला परिवार के सदस्य निभाते हैं। इस परिवार के सदस्यों को चुनरा सेवक कहा जाता है। ये लोग पीढ़ियों से भगवान जगन्नाथ की इस विशेष सेवा करते आ रहे हैं।
चुनरा सेवकों की जिम्मेदारी केवल ध्वजा फहराना ही नहीं है, बल्कि श्रद्धालुओं की ओर से चढ़ाई गई ध्वजाओं को भी मंदिर के शिखर तक पहुंचाना है। यह सेवा बेहद कठिन मानी जाती है, क्योंकि इसके लिए सेवक को मंदिर के ऊंचे शिखर तक चढ़ना पड़ता है।
कितनी लंबी होती है मंदिर की ध्वजा?
पंडित माधव चंद्र महापात्रा के अनुसार, “जगन्नाथ मंदिर के शिखर पर लगाई जाने वाली ध्वजा लगभग 14 हाथ लंबी होती है। इस ध्वजा के रंग भी खास होते हैं। इसे लाल, पीले या सफेद रंग में लगाया जाता है। मंदिर के शिखर पर स्थित नील चक्र के ऊपर इसे फहराया जाता है।”
ध्वजा बदलने के दौरान चुनरा सेवक शिखर पर आगे की ओर मुंह करके चढ़ते हैं। यह काम काफी जोखिम भरा होता है, लेकिन सेवक पूरी श्रद्धा और परंपरा के साथ अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं।
क्या एक दिन ध्वजा न बदलने पर 18 साल बंद रहेगा मंदिर?
सोशल मीडिया पर जगन्नाथ मंदिर की ध्वजा को लेकर कई तरह के दावे किए जाते हैं। इनमें एक दावा यह भी है कि अगर किसी दिन मंदिर के शिखर पर ध्वजा नहीं बदली गई तो मंदिर के कपाट 18 वर्षों तक बंद हो जाएंगे।
हालांकि, पंडित माधव चंद्र महापात्रा इस दावे को गलत बताते हैं। उनके अनुसार, “ऐसा कोई नियम नहीं है कि एक दिन ध्वजा नहीं बदलने पर मंदिर 18 वर्षों के लिए बंद हो जाएगा। हां, इस बात का ध्यान जरूरी रखा जाता है कि इस परंपरा को रोज निभाया जाए और वर्षों से इस रस्म में काई विघ्न आया भी नहीं है। ”
मंदिर के कपाट साल में एक विशेष अवधि के दौरान बंद होते हैं। यह समय भगवान जगन्नाथ की अनासर परंपरा से जुड़ा है। मान्यता के अनुसार, स्नान पूर्णिमा के बाद भगवान बीमार पड़ते हैं और लगभग 15 दिनों तक विश्राम करते हैं। इस दौरान भक्तों को उनके सामान्य दर्शन नहीं होते।
प्राकृतिक आपदा में भी नहीं रुकती ध्वजा बदलने की परंपरा
जगन्नाथ मंदिर की ध्वजा बदलने की परंपरा की सबसे खास बात यह है कि इसे रोज निभाने का प्रयास किया जाता है। पंडित माधव चंद्र महापात्रा के मुताबिक, “चुनरा सेवक प्राकृतिक आपदाओं और कठिन परिस्थितियों के बावजूद अपनी सेवा निभाने के लिए आगे आते हैं। उनके लिए यह केवल एक काम नहीं, बल्कि भगवान जगन्नाथ के प्रति समर्पण और पीढ़ियों से चली आ रही जिम्मेदारी है।”
यही वजह है कि जगन्नाथ मंदिर की ध्वजा को केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि सदियों पुरानी आस्था और सेवाभाव की पहचान भी माना जाता है।
अत: पुरी के जगन्नाथ मंदिर में रोज ध्वजा फहराने की परंपरा हमें बताती है कि कुछ धार्मिक परंपराएं केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं होतीं, बल्कि उनके पीछे पीढ़ियों की आस्था, समर्पण और विश्वास भी जुड़ा होता है।






















































