नई दिल्ली। धनतेरस पर मां लक्ष्मी, भगवान धन्वंतरि और कुबेर देव की पूजा के साथ यमराज के नाम से दीपदान करने की भी परंपरा है। इसे यम दीपदान कहा जाता है। मान्यता है कि धनतेरस की शाम दक्षिण दिशा में दीपक जलाने से यमराज प्रसन्न होते हैं और परिवार को अकाल मृत्यु के भय से रक्षा का आशीर्वाद देते हैं। कुछ घरों में इस अवसर पर चार बत्तियों वाला चौमुखी दीपक जलाया जाता है। हालांकि, दीपदान के बाद कुछ ऐसी परंपराएं भी निभाई जाती हैं, जिनका ध्यान रखना जरूरी माना जाता है। आइए जानते हैं यम दीपक से जुड़ी तीन मान्यताएं और जरूरी सावधानियां।
यम दीपदान का क्या है महत्व?
धनतेरस के दिन यमराज के निमित्त दीपक जलाने की परंपरा स्कंद पुराण में वर्णित यम दीपदान से जुड़ी है। मान्यता है कि इस दिन शाम को घर के बाहर दक्षिण दिशा की ओर दीपक रखने से परिवार पर यमराज की कृपा बनी रहती है। इसे परिवार के सदस्यों की लंबी आयु और अच्छे स्वास्थ्य की कामना का प्रतीक माना जाता है। यम दीपदान का उद्देश्य केवल मृत्यु के भय से मुक्ति की प्रार्थना करना नहीं, बल्कि जीवन के प्रति कृतज्ञता जताना भी है। इस दिन श्रद्धालु यमराज से परिवार की सुख-शांति और सुरक्षा की कामना करते हैं।
क्यों जलाया जाता है चौमुखी दीपक?
यम दीपदान के लिए चार मुख वाला दीपक जलाने की परंपरा है। इसे चौमुखी दीपक कहा जाता है। इसमें चार बत्तियां लगाई जाती हैं और सरसों या तिल का तेल भरा जाता है। मिट्टी का बड़ा दीपक या आटे से बना दीपक भी इस्तेमाल किया जाता है। चारों बत्तियों को चार दिशाओं में प्रकाश फैलाने का प्रतीक माना जाता है। दीपक जलाते समय यमराज का स्मरण करके परिवार की लंबी आयु और आरोग्य की प्रार्थना की जाती है। अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में दीपक की बनावट और सामग्री को लेकर परंपराएं कुछ अलग हो सकती हैं।
दीपक रखने के बाद पीछे मुड़कर ना देखें
यम दीपदान से जुड़ी एक प्रचलित मान्यता है कि दीपक को घर के बाहर दक्षिण दिशा की ओर रखकर अंदर लौटते समय पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहिए। कई परिवार आज भी इस परंपरा का पालन करते हैं। मान्यता के अनुसार, दीपदान के बाद सीधे घर के भीतर आकर यमराज का स्मरण करना चाहिए। हालांकि, इसे सभी जगह लागू कोई अनिवार्य शास्त्रीय नियम नहीं माना जाता। यह एक पारंपरिक रीति है, जिसका पालन परिवार अपनी मान्यता के अनुसार करते हैं। दीपक रखते समय यह भी ध्यान रखें कि वह ऐसी जगह हो जहां किसी के पैर ना लगें।
दीपक बुझने पर उसे घर में वापस न लाएं
कुछ परिवारों में यम दीपक को पूरी रात घर के बाहर जलता रहने दिया जाता है। ऐसी मान्यता है कि सुबह दीपक शांत होने के बाद उसे दोबारा घर के भीतर नहीं लाना चाहिए। मिट्टी के दीपक को दोबारा इस्तेमाल करने के बजाय उचित तरीके से अलग रखने या विसर्जित करने की परंपरा भी कुछ जगहों पर है। हालांकि, दीपक के निपटान का तरीका हर क्षेत्र में एक जैसा नहीं है। उसे सड़क, नाली या जलस्रोत में फेंकने के बजाय स्थानीय परंपरा के अनुसार सम्मानपूर्वक हटाएं। दीपक पूरी तरह ठंडा होने के बाद ही उसे छुएं।
यम दीपक जलाने के बाद हाथ-पैर धोने की परंपरा
यम दीपदान के बाद घर के भीतर आकर हाथ-पैर धोना और इष्टदेव का स्मरण करना भी कुछ परिवारों में प्रचलित है। इसे पूजा के बाद स्वच्छता और शुद्धता बनाए रखने से जोड़ा जाता है। साथ ही दीपक को जलती हुई अवस्था में कभी अकेला ना छोड़ें। उसे पर्दे, जूते, कागज या अन्य ज्वलनशील वस्तुओं से दूर किसी स्थिर स्थान पर रखें।
अगर घर के बाहर दीपक रखना सुरक्षित ना हो, तो अपनी सुविधा के अनुसार सुरक्षित स्थान चुनें। धार्मिक परंपराओं के साथ अग्नि सुरक्षा का ध्यान रखना भी जरूरी है।























































