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NVS-03: भारत के स्वदेशी GPS को कितनी ताकत मिली, सेना को क्या होगा फायदा?

by Aam Jan
November 2, 2026
in National, News
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नई दिल्ली। अमेरिका के GPS पर निर्भरता कम करने की दिशा में भारत ने एक और कदम बढ़ाया है. इसरो ने अपने नेविगेशन सैटेलाइट NVS-03 को सफलतापूर्वक लॉन्च किया है. इसमें स्वदेशी रुबिडियम एटॉमिक क्लॉक और नया L1 सिग्नल बैंड शामिल है. इससे भारत के NavIC सिस्टम की क्षमता बढ़ेगी. इसका फायदा आम मोबाइल यूजर्स के साथ-साथ सेना के मिसाइल, ड्रोन, जहाज और लड़ाकू विमानों के ऑपरेशन में भी मिल सकता है.

हम मोबाइल पर लोकेशन और रास्ता देखने के लिए जिस GPS का इस्तेमाल करते हैं, वह अमेरिका का सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम है. 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान भारत को अमेरिकी GPS डेटा की जरूरत पड़ी थी, लेकिन अमेरिका ने सैन्य इस्तेमाल के लिए सटीक लोकेशन डेटा देने से इनकार कर दिया. इस अनुभव ने भारत को अपना स्वतंत्र नेविगेशन सिस्टम बनाने की जरूरत का एहसास कराया.

भारत को NavIC की जरूरत क्यों पड़ी?

इसी दिशा में इसरो ने NavIC यानी नेविगेशन विद इंडियन कॉन्स्टेलेशन विकसित किया. यह भारत का अपना क्षेत्रीय सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम है. इससे भारत और उसकी सीमा से करीब 1,500 किलोमीटर तक के क्षेत्र में लोकेशन, नेविगेशन और टाइमिंग की जानकारी मिल सकती है. NavIC में आम नागरिकों के लिए स्टैंडर्ड पोजिशनिंग सर्विस और ऑथराइज्ड स्ट्रेटजिक इस्तेमाल के लिए एन्क्रिप्टेड रिस्ट्रिक्टेड सर्विस उपलब्ध है.

NVS-03 में क्या है खास?

NVS-03 इसरो की दूसरी पीढ़ी के नेविगेशन सैटेलाइट्स की सीरीज का हिस्सा है. इसे GSLV रॉकेट से लॉन्च किया गया, इस सैटेलाइट की दो खास बातें हैं. इसमें स्वदेशी रुबिडियम एटॉमिक क्लॉक और नया L1 बैंड शामिल किया गया है. पुराने NavIC सैटेलाइट्स में L5 और S बैंड का इस्तेमाल होता था. L1 बैंड जुड़ने से सिस्टम की दूसरे नेविगेशन सिस्टम के साथ अनुकूलता बढ़ेगी और स्मार्टफोन जैसे उपकरणों में NavIC का इस्तेमाल आसान हो सकता है.

स्वदेशी एटॉमिक क्लॉक से क्या बदलेगा?

सैटेलाइट नेविगेशन में टाइमिंग बेहद अहम होती है. सैटेलाइट से आने वाले सिग्नल को रिसीवर तक पहुंचने में कितना समय लगा, इसी के आधार पर लोकेशन तय होती है. समय आंकने में मामूली चूक भी लोकेशन की सटीकता पर असर डाल सकती है.

एस्ट्रोफाइल एजुकेशन सर्विसेज के डायरेक्टर स्नेह केसरी कहते है, “NVS-03 में लगी स्वदेशी रुबिडियम एटॉमिक क्लॉक भारत की तकनीकी आत्मनिर्भरता के लिहाज से अहम है. इससे टाइमिंग टेक्नोलॉजी पर भारत का अपना कंट्रोल बढ़ेगा और विदेशी सप्लाई पर निर्भरता कम होगी. पहले इस्तेमाल की जा रही विदेशी एटॉमिक क्लॉक्स में खराबी आने की समस्या सामने आई थी. इस बार इसरो के स्पेस एप्लीकेशन सेंटर ने स्वदेशी क्लॉक विकसित की है. इसके साथ बैकअप के लिए आयातित क्लॉक भी रखी गई है.”

सबसे बड़ा फायदा स्ट्रेटजिक फ्रीडम

स्नेह केसरी कहते हैं कि सेना के लिए इसका सबसे बड़ा फायदा स्ट्रेटजिक फ्रीडम है. किसी विदेशी सरकार या कंपनी पर निर्भर होने से संकट या युद्ध में सेवाएं सीमित होने का जोखिम रहता है. स्वदेशी टाइमिंग व्यवस्था से सेना अपने नेविगेशन और ऑपरेशन को ज्यादा भरोसे के साथ संचालित कर सकेगी. कारगिल युद्ध पर बनी सीरीज आपरेशन सफेद सागर से इस उदाहरण को बहुत अच्छे से समझा जा सकता है.

L1 बैंड से सेना को कैसे मिलेगी मदद?

L1 बैंड NavIC में जोड़ा गया नया सिग्नल है, यह GPS के प्रमुख सिविलियन सिग्नल की फ्रीक्वेंसी के करीब है. स्नेह केसरी बताते हैं कि L1 के साथ L5 जैसे दूसरे बैंड उपलब्ध होने से मल्टी-फ्रीक्वेंसी रिसीवर को एक से ज्यादा सिग्नल मिलेंगे. इससे आयनोस्फियर की वजह से सिग्नल में आने वाली गड़बड़ी को सुधारने में मदद मिल सकती है.

सेना के लिए ये महत्वपूर्ण है. सेना के रिसीवर अगर कई बैंड पर काम कर सकें, तो किसी एक सिग्नल में बाधा आने पर दूसरे सिग्नल का विकल्प मिल सकता है. इससे घने शहरी इलाकों, पहाड़ों, जंगलों और सीमा के आसपास नेविगेशन एविलेबल होने में मदद मिलेगी. हालांकि, जैमिंग की स्थिति में कोई भी सैटेलाइट सिस्टम पूरी तरह बाधा-मुक्त होने की गारंटी नहीं देता.

लोकेशन होगी ज्यादा भरोसेमंद

स्नेह केसरी कहते हैं सेना को सामान्य मोबाइल यूजर से कहीं ज्यादा सटीक लोकेशन और सुरक्षित सिग्नल की जरूरत होती है. मिसाइल गाइडेंस, ड्रोन ऑपरेशन, आर्टिलरी की मूवमेंट, सैनिकों की लोकेशन और नौसेना के जहाजों के संचालन में सटीक टाइमिंग और पोजिशनिंग अहम भूमिका निभाते हैं.

अगर सेना अपनी मूवमेंट के लिए विदेशी नेविगेशन सर्विस पर निर्भर रहती है, तो डेटा के विदेशी सर्वर तक पहुंचने का जोखिम भी हो सकता है.इससे सेना की स्ट्रेटजिक एक्टिविटी और अचानक कार्रवाई करने की क्षमता यानी एलिमेंट ऑफ सरप्राइज पर असर पड़ सकता है. स्वदेशी सिस्टम इस निर्भरता को कम करने में मदद करेगा.

क्या गूगल मैप की जरूरत खत्म हो जाएगी?

आम मोबाइल यूजर्स के लिए L1 बैंड का फायदा ये है कि NavIC को स्मार्टफोन चिपसेट में शामिल करना आसान हो सकता है. इससे फोन GPS के साथ NavIC के सिग्नल भी इस्तेमाल कर सकेंगे. लेकिन, इसका मतलब यह नहीं कि Google Maps बंद हो जाएगा या उसकी जरूरत खत्म हो जाएगी. Google Maps एक मैपिंग ऐप है, जबकि GPS और NavIC लोकेशन बताने वाले सैटेलाइट सिस्टम हैं, दोनों साथ काम कर सकते हैं.

NavIC की एक्यूरेसी और एविलेबिलिटी सैटेलाइट की गिनती, रिसीवर कैपैसिटी और इस्तेमाल की कंडीशन पर निर्भर करती है. इसलिए NVS-03 के आने से हर स्थिति में पांच मीटर से कम सटीकता या फ्लाइओवर के नीचे सिग्नल कभी न टूटने की गारंटी नहीं दी जा सकती. भारत का लक्ष्य सिर्फ अपना GPS बनाना नहीं, बल्कि नागरिकों से लेकर सेना तक को एक भरोसेमंद स्वदेशी नेविगेशन विकल्प देना है. NVS-03 इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है.

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Aam Jan

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