नई दिल्ली। दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे धरना प्रदर्शन के मद्देनजर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया है. NEET यूजी परीक्षा पेपर लीक होने के बाद से वह छात्रों और युवाओं के गुस्से का शिकार हो रहे थे. अब वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार के दूसरे ऐसे केंद्रीय मंत्री बन गए हैं, जिन्हें पिछले 12 सालों के दौरान विवाद और आलोचना बढ़ने पर इस्तीफा देना पड़ा है. पहला नाम एम.जे. अकबर का है. यहां स्पष्ट कर दें कि बीजेपी और एनडीए के सहयोगी दलों के कई मंत्री इस दौरान अपना इस्तीफा दे चुके हैं लेकिन बढ़ते दबाव के बीच पद छोड़ने वालों में यही दो नाम हैं.
सबसे पहली बात इस समय का बड़ा मुद्दा बने कॉकरोच जनता पार्टी को लेकर. नीट पेपर लीक के मुद्दे पर अभिजीत दिपके चेहरा बने और सोनम वांगचुक ने जंतर-मंतर पर अनशन शुरू कर दिया. भूख हड़ताल से लेकर लाठीचार्ज और हिंसा के दौर के बाद भी आंदोलन को बढ़ता हुआ देखते हुए शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा पीएम मोदी को सौंप दिया है. साल 2026 के जुलाई महीने में इसे नई उम्र के युवाओं यानी जेन-जी की सफलता के तौर पर देखा जा रहा है.
2018 में लगा था पहला झटका
इससे पहले 2014 में सत्ता में आई मोदी सरकार को बड़ा झटका 2018 में लगा था. मोबाशर जावेद अकबर यानी एम. जे. अकबर की बात करें तो वह देश के जाने-माने पत्रकार और राजनेता रहे हैं. द टेलीग्राफ, एशियन एज और संडे जैसे संस्थानों में जर्नलिज्म में लंबा सफर तय करने के बाद उनकी राजनीति में एंट्री हुई और केंद्र सरकार में एक महत्वपूर्ण पद पर कार्य किया.
उनके राजनीतिक करियर में ऐसा दाग लगा, जिसके कारण उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा था. अकबर पहले शुरुआत में वह कांग्रेस पार्टी से जुड़े और सांसद बने. बाद में वह बीजेपी में शामिल हो गए. साल 2016 में उन्हें राज्यसभा सांसद बनाया गया और नरेंद्र मोदी सरकार में उन्हें विदेश राज्य मंत्री की जिम्मेदारी सौंपी गई.
अकबर को क्यों देना पड़ा था इस्तीफा?
अक्टूबर 2018 में जब भारत में ‘मी टू’ (Me Too) आंदोलन ने जोर पकड़ा, तब अकबर इस विवाद के केंद्र में आ गए. उन पर कई महिला पत्रकारों ने गंभीर आरोप लगाए. करीब 20 महिला पत्रकार खुलकर सामने आईं और एम जे अकबर पर अपने पेशेवर जीवन के दौरान यौन उत्पीड़न, अभद्र व्यवहार के आरोप लगाए. सोशल मीडिया पर कैम्पेन तेज हो गया.
देश भर में महिला संगठनों, विपक्षी दलों और कई पूर्व नौकरशाहों ने भी अकबर के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और उनके इस्तीफे की मांग तेज कर दी. शुरुआत में एम जे अकबर ने अपने ऊपर लगे सभी आरोपों को बेबुनियाद और झूठा करार दिया था. उन्होंने आलोचकों और आरोप लगाने वालीं महिला पत्रकारों के खिलाफ मानहानि का मुकदमा भी दर्ज कराया था. हालांकि सरकार पर भी लगातार नैतिक बदाव के बीच 17 अक्टूबर 2018 को उन्हें इस्तीफा देना पड़ा.
नाम और भी हैं
हालांकि यहां धर्मेंद्र प्रधान और एम. जे. अकबर की ही चर्चा है. इसके अलावा रविशंकर प्रसाद से लेकर डॉक्टर हर्षवर्धन और हरसिमरत कौर बादल से लेकर रमेश पोखरियाल निशंक जैसे नेता तक भी मंत्री पद से उतर चुके हैं. हालांकि इनमें से किसी को जन आंदोलन की वजह से कुर्सी से नहीं उतरना पड़ा है. बादल ने कृषि कानूनों के विवाद में कैबिनेट से इस्तीफा दिया था. यह आपसी नीतिगत मतभेद का मसला था. वहीं बाकी को प्रशासनिक विफलता की वजह से पद से हटा दिया गया था.

























































