राउरकेला। सौर ऊर्जा के क्षेत्र में राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी) राउरकेला के शोधकर्ताओं ने एक क्रांतिकारी मुकाम हासिल किया है। संस्थान के कंप्यूटर विज्ञान एवं अभियांत्रिकी विभाग ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) पर आधारित एक ऐसी स्वचालित प्रणाली विकसित की है, जो बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के सोलर प्लांट की निगरानी और सफाई करने में पूरी तरह सक्षम है।
इस नवाचार के लिए शोधकर्ताओं की टीम को “फेडरेटेड लर्निंग बेस्ड ऑटोनोमस सिस्टम एंड मेथड फॉर मॉनिटरिंग एंड क्लीनिंग सोलर प्लांट” शीर्षक से भारतीय पेटेंट भी प्राप्त हो गया है। यह स्वदेशी तकनीक न केवल सौर ऊर्जा उत्पादन की क्षमता को अधिकतम स्तर पर ले जाएगी, बल्कि रखरखाव की भारी-भरकम लागत और पानी की बर्बादी पर भी लगाम लगाएगी।
मरुस्थलीय और शुष्क इलाकों में स्थापित बड़े सोलर प्लांट में धूल, पक्षियों की बीट और औद्योगिक प्रदूषण के कारण ऊर्जा उत्पादन में 40 प्रतिशत तक की बड़ी गिरावट आ जाती है। मौजूदा समय में सफाई के पारंपरिक तरीके बेहद श्रमसाध्य हैं और इनमें पानी की भी अत्यधिक खपत होती है।
इसके अलावा, अब तक सफाई का काम पैनल की वास्तविक स्थिति के बजाय पहले से तय समय-सारिणी के आधार पर होता है। इन तमाम कमियों को दूर करते हुए एनआईटी की यह नई एआई-संचालित प्रणाली खराबियों का स्वतः पता लगा लेगी और केवल उन्हीं पैनलों या हिस्सों की सफाई करेगी, जिन्हें वास्तव में इसकी जरूरत है।
यह प्रणाली गोपनीयता-संरक्षित ‘फेडरेटेड लर्निंग’ पर काम करती है। इसका सीधा अर्थ यह है कि तकनीक प्राथमिक डेटा को किसी केंद्रीय सर्वर पर साझा करने के बजाय केवल एन्क्रिप्टेड डेटा भेजती है, जिससे साइबर सुरक्षा, बैंडविड्थ और निजता पूरी तरह से सुरक्षित रहती है।
इस अत्याधुनिक तकनीक का विकास सहायक प्रोफेसर डॉ. अरुण कुमार ने प्रोफेसर बिभूदत्त साहू तथा शोध स्नातक डॉ. लोपामुद्रा होता और डॉ. बिरजा प्रसाद नायक के विशेष सहयोग से किया है। डॉ. अरुण कुमार के अनुसार, यह प्रणाली रियल-टाइम एज इंटेलिजेंस, स्वचालित दोष पहचान, आवश्यकता-आधारित चयनात्मक सफाई और पूर्वानुमान आधारित रखरखाव को एक साथ जोड़ती है।
वहीं, तकनीक की लागत-प्रभावशीलता पर प्रोफेसर बिभूदत्त साहू ने बताया कि बाजार में मौजूद अन्य महंगे और सीमित बुद्धिमत्ता वाले विकल्पों की तुलना में यह प्रणाली बेहद किफायती है।
क्षेत्रीय स्तर पर विस्तार के बाद यह तकनीक मौजूदा प्रणालियों की तुलना में महज 10 प्रतिशत लागत पर कहीं बेहतर सुविधाएं दे सकेगी। वर्तमान में इस तकनीक का सिमुलेशन के माध्यम से सफल परीक्षण किया जा चुका है और यह प्रौद्योगिकी तत्परता स्तर (टीआरएल-3) पर है।
भविष्य में इस तकनीक का व्यापक उपयोग बड़े उपयोगिता-स्तरीय सौर संयंत्रों, फ्लोटिंग सोलर फार्म, छतों पर लगे फोटोवोल्टिक प्रतिष्ठानों, स्मार्ट सिटी और रक्षा प्रतिष्ठानों में किया जा सकेगा। शोध दल अब इसके अगले चरण पर तेजी से काम कर रहा है, जिसके तहत इंटरनेट ऑफ थिंग्स (आईओटी) आधारित सेंसर से जुड़ा हार्डवेयर प्रोटोटाइप तैयार कर पायलट प्रोजेक्ट शुरू किए जाएंगे।
इसके बाद सरकारी और औद्योगिक साझेदारों के साथ मिलकर ड्रोन-आधारित निरीक्षण और बहु-एजेंट सहयोगात्मक सफाई जैसी उन्नत सुविधाएं भी जोड़ी जाएंगी। निश्चित तौर पर एनआईटी राउरकेला का यह नवाचार भारत सरकार के ‘राष्ट्रीय सौर मिशन’ और ‘नेट जीरो’ लक्ष्य को साकार करने में एक मील का पत्थर साबित होने जा रहा है।

























































