नई दिल्ली। तकनीक की दुनिया तेजी से बदल रही है और आने वाले वर्षों में क्वांटम कंप्यूटर साइबर सुरक्षा की पूरी तस्वीर बदल सकते हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि जितनी तेजी से क्वांटम कंप्यूटिंग विकसित हो रही है, उतनी ही तेजी से मौजूदा साइबर सुरक्षा प्रणालियों के सामने नई चुनौतियां भी खड़ी हो रही हैं.
इन्हीं संभावित खतरों को देखते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय का कंप्यूटर साइंस विभाग भविष्य के साइबर हमलों से बचाव के लिए नई सुरक्षा तकनीक विकसित करने में जुटा है. विभाग पोस्ट-क्वांटम क्रिप्टोग्राफी (PQC) और क्वांटम कंप्यूटिंग से जुड़े समाधान तैयार कर रहा है, जिससे भविष्य में भी इंटरनेट, बैंकिंग, सरकारी सेवाओं और डिजिटल संचार को सुरक्षित रखा जा सके.
दिल्ली विश्वविद्यालय के कंप्यूटर साइंस विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर और सेफ क्यूबिट स्टार्टअप के को-फाउंडर एंड सीईओ डॉ. ओमपाल ने बताया कि विभाग केवल क्वांटम कंप्यूटिंग पर अध्ययन ही नहीं कर रहा, बल्कि इस विषय से जुड़े विशेष पाठ्यक्रम भी संचालित किए जा रहे हैं.
साथ ही शोधकर्ता ऐसे सुरक्षा समाधान विकसित कर रहे हैं जो सीमित कंप्यूटिंग क्षमता और कम मेमोरी वाले उपकरणों में भी प्रभावी ढंग से काम कर सकें. उन्होंने कहा कि आज दुनिया में इस्तेमाल होने वाली अधिकांश साइबर सुरक्षा प्रणालियां पारंपरिक यानी क्लासिकल क्रिप्टोग्राफी पर आधारित हैं. यह तकनीकें सुरक्षित मानी जाती हैं, लेकिन भविष्य में क्वांटम कंप्यूटर इनके लिए बड़ा खतरा बन सकते हैं. ऐसे में अभी से ऐसी तकनीक विकसित करना जरूरी है जो क्वांटम कंप्यूटर के हमलों का भी सामना कर सके.
पोस्ट-क्वांटम क्रिप्टोग्राफी पर विशेष जोर: डॉ. ओमपाल ने बताया कि विभाग का शोध मुख्य रूप से पोस्ट-क्वांटम क्रिप्टोग्राफी पर केंद्रित है. यह साइबर सुरक्षा का ऐसा क्षेत्र है जिसमें ऐसे एल्गोरिद्म विकसित किए जाते हैं जो क्वांटम कंप्यूटर द्वारा भी आसानी से नहीं तोड़े जा सकें. उन्होंने बताया कि उद्देश्य यह है कि भविष्य में जब क्वांटम कंप्यूटर आम हो जाएं, तब भी लोगों का व्यक्तिगत डेटा, बैंकिंग लेन-देन, सरकारी दस्तावेज, स्वास्थ्य संबंधी रिकॉर्ड और इंटरनेट के माध्यम से होने वाला संचार पूरी तरह सुरक्षित बना रहे.
कम क्षमता वाले उपकरणों की सुरक्षा भी होगी मजबूत: शोध का एक जरूरी हिस्सा उन उपकरणों के लिए सुरक्षा समाधान तैयार करना है जिनकी प्रोसेसिंग क्षमता और मेमोरी सीमित होती है. इनमें इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) डिवाइस, स्मार्ट सेंसर, छोटे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और अन्य एम्बेडेड सिस्टम हैं. डॉ. ओमपाल ने बताया कि यदि इन उपकरणों के लिए हल्के लेकिन मजबूत सुरक्षा समाधान विकसित किए जाते हैं तो भविष्य में करोड़ों स्मार्ट डिवाइस भी क्वांटम युग में सुरक्षित रह सकेंगे.
सेफ क्यूबिट स्टार्टअप के साथ मिलकर हो रहा काम: यह शोध कार्य दिल्ली विश्वविद्यालय का कंप्यूटर साइंस विभाग और सेफ क्यूबिट स्टार्टअप मिलकर कर रहे हैं. विभाग को इस परियोजना के लिए आईआईटी मद्रास के नेशनल क्वांटम मिशन हब से एक वर्ष का प्रोजेक्ट मिला है. डॉ. ओमपाल ने कहा कि टीम को उम्मीद है कि निर्धारित समय से पहले ही परियोजना पूरी कर ली जाएगी. शोध का उद्देश्य केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं है, बल्कि ऐसे व्यावहारिक समाधान विकसित करना है जिन्हें भविष्य में विभिन्न क्षेत्रों में लागू किया जा सके.
क्वांटम कंप्यूटर आने से पहले ही शुरू हो सकता है खतरा: सेफ क्यूबिट में इंटर्न कृष गुप्ता ने बताया कि आज जिन सुरक्षा प्रणालियों का उपयोग किया जा रहा है, वह भविष्य में क्वांटम कंप्यूटर के सामने कमजोर पड़ सकती हैं. इसलिए अभी से उन तकनीकों पर काम किया जा रहा है जो क्वांटम युग में भी डेटा को सुरक्षित रख सकें. उन्होंने बताया कि टीम अलग-अलग क्षेत्रों के लिए ऐसे सुरक्षा समाधान विकसित करने की दिशा में काम कर रही है जिन्हें आसानी से लागू किया जा सके और जो भविष्य की जरूरतों के अनुरूप हों.
‘हार्वेस्ट नाउ, अटैक लेटर’ सबसे बड़ी चुनौती: सेफ क्यूबिट की इंटर्न गायत्री ने बताया कि विशेषज्ञों के अनुसार वर्ष 2028-29 के आसपास अधिक सक्षम क्वांटम कंप्यूटर सामने आ सकते हैं, हालांकि इसकी सटीक समय-सीमा अभी तय नहीं है. लेकिन इससे भी बड़ी चिंता “हार्वेस्ट नाउ, अटैक लेटर” नामक रणनीति है.
उन्होंने बताया कि इस रणनीति के तहत साइबर अपराधी अभी से एन्क्रिप्टेड डेटा को इकट्ठा कर सकते हैं. फिलहाल वह उस डेटा को पढ़ नहीं सकते, लेकिन भविष्य में जब पर्याप्त शक्तिशाली क्वांटम कंप्यूटर उपलब्ध होंगे, तब उसी डेटा को डिक्रिप्ट कर संवेदनशील जानकारी हासिल की जा सकती है. इसलिए भविष्य के खतरे से बचने के लिए अभी से नई क्रिप्टोग्राफी अपनाना जरूरी है.
पोस्ट-क्वांटम क्रिप्टोग्राफी आने वाले समय में साइबर सुरक्षा की सबसे जरूरी तकनीकों में शामिल होगी. यदि भारत अभी से इस दिशा में मजबूत तैयारी करता है तो बैंकिंग, रक्षा, स्वास्थ्य, ई-गवर्नेंस, डिजिटल भुगतान, क्लाउड सेवाओं और जरूरी सरकारी नेटवर्क को भविष्य के साइबर हमलों से सुरक्षित रखा जा सकेगा.

























































