नई दिल्ली। भारत का चीन और पाकिस्तान से रिश्ता लगातार तनावपूर्ण रहा है। लेकिन पाकिस्तान के सऊदी और तुर्की के साथ डिफेंस पैक्ट ने स्थिति को और जटिल कर दिया है। जानकारों का कहना है कि भारत के लिए इसका मुख्य महत्व इस बात में नहीं है कि इसे कब लागू किया जाएगा बल्कि इस बात में है कि यह पाकिस्तान की रणनीतिक स्थिति और तीनों परमाणु शक्तियों के बीच संतुलन को कैसे बदल सकता है। भारत, चीन और पाकिस्तान तीनों परमाणु शक्ति वाले देश है इसलिए स्थिति काफी खतरनाक बन जाती है।
नई दिल्ली के रणनीतिक विश्लेषक ब्रह्मा चेलानी के मुताबिक ‘यह समझौता एक त्रिपक्षीय ढांचा बनाता है जिसमें सऊदी की पूंजी, तुर्की की डिफेंस टेक्नोलॉजी और पाकिस्तान की रणनीतिक भौगोलिक स्थिति को एक साथ लाया गया है।’ उन्होंने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में लिखा ‘भले ही ऐसे प्रावधानों का कभी इस्तेमाल न हो फिर भी इस समझौते का होना भारत की रणनीतिक गणना को मुश्किल बना सकता है क्योंकि इससे संकट की योजना बनाने और प्रतिरोध की रणनीति में और अनिश्चितता पैदा हो सकती है।’
ऑपरेशन सिंदूर के बाद इस्लामी दुनिया में पाकिस्तान की छवि मजबूत?
ब्रह्मा चेलानी का तर्क है कि सिर्फ साढ़े तीन दिन बाद लड़ाई खत्म करने के नई दिल्ली के फैसले से ‘पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय छवि को फिर से बेहतर बनाने में मदद मिली खासकर इस्लामी दुनिया में।’ उन्होंने कहा कि इस धारणा ने इस्लामाबाद के रणनीतिक महत्व को बढ़ाया और पिछले साल सऊदी अरब के साथ आपसी रक्षा समझौते का रास्ता साफ किया जिसे हाल ही में तुर्की को शामिल करके और बढ़ाया गया है। इस नए समझौते से चीन के सबसे करीबी रणनीतिक साझेदार पाकिस्तान को और अधिक कूटनीतिक ताकत मिलेगी और संभवतः उसे नाटो सदस्य तुर्की से कई तरह के सैन्य उपकरण भी मिल सकेंगे।
वहीं न्यूयॉर्क स्थित थिंक टैंक एशिया सोसाइटी पॉलिसी इंस्टीट्यूट की फरवा आमिर के अनुसार यह समझौता ‘पाकिस्तान का हौसला और बढ़ाता है’। उन्होंने कहा ‘पाकिस्तान व्यापक क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे में और अधिक गहराई से शामिल हो रहा है… बीजिंग के हित में है कि पाकिस्तान अधिक सुरक्षित और स्थिर स्थिति में हो।’
जबकि भारत के पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने कहा कि भारत को अब ‘उस क्षेत्र में पाकिस्तान की बढ़ी हुई राजनीतिक और सुरक्षा भूमिका से निपटना होगा जहां हमारे बड़े हित हैं।’ उन्होंने कहा ‘पाकिस्तान भारत के खिलाफ अपनी आक्रामक कूटनीति को आगे बढ़ाने के लिए अधिक उत्साहित महसूस करेगा और आतंकवाद के मोर्चे पर जोखिम उठा सकता है।’
भारत के लिए चीन-पाकिस्तान और ज्यादा बड़ा खतरा बने
कनाडा की थॉम्पसन रिवर्स यूनिवर्सिटी की सायरा बानो ने लोवी इंस्टीट्यूट थिंक टैंक के लिए एक विश्लेषण में लिखा ‘पाकिस्तान को दो ऐसे देशों के साथ एक औपचारिक सुरक्षा ढांचा मिला है जिनके पास भारी वित्तीय संसाधन, तकनीक और कूटनीतिक प्रभाव है।’ उन्होंने लिखा ‘यह चीन के साथ पाकिस्तान के गहरे रणनीतिक और रक्षा संबंधों के साथ-साथ चलता है जिससे वह स्थिति बदल गई है जिसे भारत कभी मुख्य रूप से द्विपक्षीय प्रतिद्वंद्विता के रूप में देखता था और अब यह गठबंधनों के एक व्यापक नेटवर्क में बदल गया है।’
वहीं दक्षिण एशियाई सुरक्षा की विशेषज्ञ रिसर्चर साइमा अफजल ने अमेरिकी प्लेटफॉर्म ‘काउंटर पंच’ के लिए एक विश्लेषण में लिखा कि पाकिस्तान की मौजूदगी का मतलब है कि खाड़ी पर केंद्रित एक रक्षा नेटवर्क ‘अब भारत-पाकिस्तान प्रतिद्वंद्विता, चीन की क्षेत्रीय भूमिका और परमाणु प्रतिरोध (न्यूक्लियर डेटरेंस) से बने माहौल तक पहुंच गया है’।

























































