नई दिल्ली: इस्लामाबाद के सत्ता के गलियारों में इन दिनों अजीब सी बेचैनी है. एक तरफ वाशिंगटन से दोस्ती की नई पींगें बढ़ाई जा रही हैं तो दूसरी तरफ तेहरान में सत्ता परिवर्तन की आहट ने जनरल असीम मुनीर की नींद उड़ा दी है. दुनिया को लग सकता है कि अमेरिका का दोस्त होने के नाते पाकिस्तान को ईरान में अमेरिकी दखल से खुश होना चाहिए लेकिन हकीकत इसके उलट है. रावलपिंडी के ‘वार रूम’ में इस वक्त सबसे बड़ा डर इजरायली खुफिया एजेंसी मोसाद की धमक को लेकर है. मुनीर को डर है कि अगर ईरान में वाशिंगटन की ‘कठपुतली’ सरकार आई तो पाकिस्तान का पश्चिमी बॉर्डर मोसाद का नया हेडक्वार्टर बन जाएगा.
ईरान में सत्ता परिवर्तन: मुनीर के लिए ‘डेथ वारंट’?
पाकिस्तान इस वक्त बारूद के ढेर पर बैठा है. पूरब में भारत की आक्रामक कूटनीति और उत्तर-पश्चिम में तालिबान (अफगानिस्तान) के हमलों ने मुनीर की नाक में दम कर रखा है. ऐसे में ईरान की सीमा ही एक ऐसी जगह थी जहां से पाकिस्तान को थोड़ी राहत थी. लेकिन अगर ईरान में शासन बदलता है और वहां अमेरिका समर्थित सरकार आती है तो पाकिस्तान के लिए ‘टू-फ्रंट वॉर’ अब ‘थ्री-फ्रंट वॉर’ में बदल जाएगा.
मोसाद का डर और इजरायल का अगला निशाना
इजरायल के लिए ईरान उसका सबसे बड़ा दुश्मन है, लेकिन रणनीतिक रूप से पाकिस्तान उसके रडार पर हमेशा रहता है. वजह साफ है कि पाकिस्तान दुनिया का एकमात्र मुस्लिम देश है जिसके पास परमाणु हथियार हैं. ईरान के कमजोर होते ही इजरायल का अगला बड़ा लक्ष्य पाकिस्तान की परमाणु ताकत को पंगु बनाना होगा. यदि ईरान में अमेरिका की कठपुतली सरकार बैठती है, तो मोसाद को पाकिस्तान के बलूचिस्तान बॉर्डर पर सीधी पहुंच मिल जाएगी. मोसाद पहले से ही ईरान के भीतर अपनी सक्रियता साबित कर चुका है. अब कल्पना कीजिए कि अगर ईरान की जमीन का इस्तेमाल इजरायल पाकिस्तान के खिलाफ करने लगे, तो रावलपिंडी के पास मुंह छुपाने का कोई रास्ता नहीं बचेगा.
भारत का दोस्त ‘ईरान’ और मुनीर की परेशानी
ईरान लंबे समय से भारत का एक भरोसेमंद रणनीतिक साझेदार रहा है. चाबहार पोर्ट से लेकर ऊर्जा समझौतों तक भारत और ईरान की दोस्ती ने पाकिस्तान को हमेशा किनारे (Side-line) रखा है. मुनीर को डर है कि ईरान में किसी भी अस्थिरता का फायदा उठाकर भारत और मोसाद मिलकर एक नया ‘गठबंधन’ बना सकते हैं. पाकिस्तान पहले से ही बलूचिस्तान में अलगाववाद की आग में झुलस रहा है. ईरान बॉर्डर पर मोसाद की सक्रियता का सीधा मतलब होगा बलूच विद्रोहियों को आधुनिक हथियार और खुफिया जानकारी मिलना. यह पाकिस्तान के लिए आत्मघाती साबित होगा.
अशांति का नया केंद्र बनेगा पाकिस्तान?
पाकिस्तान की आंतरिक स्थिति बद से बदतर हो चुकी है. महंगाई, राजनीतिक अस्थिरता और टीटीपी (TTP) के आतंकी हमलों ने सेना की साख गिरा दी है. असीम मुनीर जानते हैं कि अमेरिका के साथ ‘यारी’ केवल आर्थिक मदद तक सीमित है लेकिन रणनीतिक रूप से अमेरिका हमेशा इजरायल के हितों को ऊपर रखेगा. अगर ईरान में मोसाद एक्टिव हो गया तो पाकिस्तान का जीना दूभर हो जाएगा क्योंकि उसे फिर तीन तरफ से दुश्मनों का सामना करना पड़ेगा.

























































