अनुगुल। समंदर शांत था। आसमान कांच की तरह साफ। तट से करीब 50 किलोमीटर दूर गहरे पानी में सब कुछ सामान्य लग रहा था, लेकिन यह तूफान से पहले की वह खामोशी थी, जिसे इंसान की आंखें नहीं, बल्कि विज्ञान की नजर ही देख सकती थी।
तभी नाव के केबिन में लगे एक छोटे से यंत्र ने सन्नाटा तोड़ा, ‘बीप-बीप-बीप’। यह महज एक मशीन की आवाज नहीं थी, बल्कि छह जिंदगियों की धड़कन थी। अगर वह बीप 15 मिनट देरी से बजती, तो आज यह कहानी सुनाने वाला कोई जिंदा न होता।
पांच फरवरी यानी नेशनल वेदरपर्सन डे, यह दिन उन विज्ञानियों और उस तकनीक को सलाम करने का है, जो अदृश्य रहकर हमारी ढाल बनते हैं।
मछुआरे की आपबीती
ओडिशा के मछुआरे कान्हू चरण बेहरा की यह आपबीती इस बात का जीवंत दस्तावेज है कि कैसे मौसम का एक सटीक पूर्वानुमान मौत के मुंह से जिंदगी खींच लाता है। घड़ी में दोपहर के 2:30 बज रहे थे।
कान्हू अपनी नाव सागर लक्ष्मी पर पांच साथियों, रंजन, सुकांत, मनोरंजन और दो अन्य के साथ मछली पकड़ने के जाल को समेटने की तैयारी में थे। तभी नाव पर लगे ट्रांसपोंडर की लाल बत्ती जल उठी।
संदेश फ्लैश हुआ, चक्रवात दाना तेजी से बढ़ रहा है। तुरंत तट पर लौटें। कान्हू बताते हैं, आसमान साफ था, मन में एक पल को ख्याल आया कि शायद मशीन खराब है, लेकिन हमें दी गई ट्रेनिंग का वह वाक्य याद आ गया, जब यह यंत्र शोर करे, तो सवाल नहीं करना, बस मुड़ जाना। हमने भारी मन से अपना आधा बिछा जाल वहीं काट दिया और इंजन की पूरी ताकत वापसी में झोंक दी।
नाव को मुड़े अभी दो घंटे ही हुए थे कि समंदर ने अपना असली रंग दिखाना शुरू कर दिया। जो लहरें शांत थीं, वे अब पहाड़ बनकर नाव पर टूट रही थीं। हवा का शोर डराने लगा था।
15 मिनट…जिंदगी और मौत का फासला
कान्हू सिहरते हुए कहते हैं, जब हम किनारे पहुंचे, तो लगा जैसे दूसरा जन्म हुआ हो। अगर हम जाल बचाने के लालच में 15 मिनट भी रुकते, तो समंदर हमें निगल चुका होता।
यह बदलाव सिर्फ तकनीक का नहीं, भरोसे का है। 1999 के महाचक्रवात में संचार के अभाव में 10 हजार लोग मारे गए थे, लेकिन अब फानी हो या दाना, ओडिशा जीरो कैजुअल्टी (शून्य मृत्यु दर) के माडल पर काम कर रहा है। मछुआरे अब विज्ञानियों को केवल बाबू नहीं, बल्कि अपना रक्षक मानते हैं।
उस रात घर पहुंचकर कान्हू ने जब अपने बच्चों को गले लगाया, तो उनकी आंखों से निकले आंसू उस तकनीक की कामयाबी का सबसे बड़ा प्रमाण पत्र थे। वे कहते हैं, हमारे लिए वेदरपर्सन किसी भगवान से कम नहीं, जिन्होंने बिना देखे हमें बचा लिया।
सैटेलाइट से सायरन तक: भरोसे का अदृश्य कवच
ओडिशा और बंगाल की खाड़ी में अब मौसम विभाग का सूचना तंत्र किसी अदृश्य कवच की तरह काम करता है। गहरे समंदर में, जहां मोबाइल नेटवर्क दम तोड़ देते हैं, वहां नभमित्र और सैटेलाइट फोन काम करते हैं।
भारतीय मौसम विभाग जैसे ही किसी खतरे को भांपता है, यह डिजिटल जाल सक्रिय हो जाता है। तटीय इलाकों में, 122 अर्ली वार्निंग डिसेमिनेशन सिस्टम टावर एक साथ सायरन बजाते हैं। इसकी आवाज सुन गांव के आखिरी छोर पर बैठा व्यक्ति भी जान जाता है कि खतरा बड़ा है।
ऐसे काम करता है यह जीवनरक्षक तंत्र
रडार और सैटेलाइट: अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट बादलों की चाल और हवा के दबाव पर 24 घंटे नजर रखते हैं। जैसे ही कोई हलचल दिखती है, वे तुरंत मौसम विभाग के सुपरकंप्यूटर को तस्वीर भेजते हैं।
डेटा विश्लेषण: मौसम विज्ञानी डेटा का विश्लेषण करते हैं और तय करते हैं कि तूफान कहां और कब टकराएगा।
ट्रांसपोंडर: यह नाव पर लगा एक छोटा बाक्स होता है। सैटेलाइट से सिग्नल मिलते ही यह जोर से बीप करता है और स्थानीय भाषा (जैसे उड़िया या बांग्ला) में लिखित चेतावनी देता है।
नभमित्र: यह इसरो द्वारा विकसित उपकरण है, जो मछुआरों को न केवल चेतावनी देता है, बल्कि संकट के समय नाव से एक बटन दबाते ही कंट्रोल रूम को एसओएस (बचाव संदेश) और लोकेशन भी भेज देता है।
सायरन : तटीय इलाकों में लगे ये विशाल टावर एक बटन दबाते ही पूरे राज्य में एक साथ बज उठते हैं, जिससे सो रहा व्यक्ति भी जाग जाए।

























































