नई दिल्ली। विपक्ष के विरोध के बीच केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने राज्यसभा में ‘सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्सेस (जनरल एडमिनिस्ट्रेशन) बिल, 2026’ पेश किया. बिल का उद्देश्य BSF, CRPF, ITBP, CISF जैसे केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में IG और उससे ऊपर के रैंक पर नियुक्ति, प्रतिनियुक्ति, पदोन्नति और सेवा नियमों को स्पष्ट करना है.
विपक्ष और सेवानिवृत्त अधिकारी इसका विरोध कर रहे हैं. विधेयक में कहा गया है कि CAPF में महानिरीक्षक (IG) रैंक के कुल पदों में से 50%, अतिरिक्त महानिदेशक रैंक के कम से कम 67% पद और विशेष महानिदेशक और महानिदेशक रैंक के सभी पद प्रतिनियुक्ति (डेप्यूटेशन) पर भारतीय पुलिस सेवा (IPS) अधिकारियों द्वारा भरे जाएंगे.
सेवानिवृत्त अधिकारियों का कहना है कि यह विधेयक अन्यायपूर्ण है क्योंकि यह 23 मई, 2025 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरुद्ध है, जिसमें CAPF अधिकारियों को संगठित समूह ए सेवा (ओजीएएस) का दर्जा दिया गया था. सरकार को अगले दो वर्षों में CAPF में IPS प्रतिनियुक्ति को आईजी रैंक तक धीरे-धीरे कम करने का निर्देश दिया गया था. लेकिन सीधेतौर पर इस बिल को समझें तो सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्स में IPS अधिकारियों की संख्या बढ़ जाएगी. इसी संख्या का बढ़ना विवाद की जड़ है.
क्या है CAPF बिल, क्यों उठा विवाद?
सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्सेस गृह मंत्रालय के तहत आती है. इसमें 7 अलग-अलग फोर्स शामिल हैं. जैसे- असम राइफल्स, राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (NSG), सीमा सुरक्षा बल (BSF), केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF), केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) और भारत तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) और सशस्त्र सीमा बल (SSB). अब इन सात में से बस एक असम राइफल्स ही है जिसकी कंपनी और यूनिट्स को लीड करने की कमान इंडियन आर्मी के पास है. बाकी सारी जाती हैं आईपीएस अधिकारियों के पास और यही विवाद की जड़ है.
कहा जा रहा है कि सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्सेस में IPS अधिकारियों का डेपुटेशन सुनिश्चित किया जाए. डेपुटेशन का मतलब है कि एक आईपीएस अधिकारी जब सेलेक्ट होता है तो उसे कैडर मिलता है. उसी कैडर में उसे अपनी रिटायरमेंट तक नौकरी करनी होती है. लेकिन कैडर ड्यूटी के दौरान अफसरों को एक अलग तरह की ड्यूटी भी दी जाती है जो उनके रेगुलर काम से बिल्कुल अलग होती है. जैसे उन्हें बीएसएफ या सीआरपीएफ के कंटिंजेंट को लीड करने भी भेज दिया जाता है.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सीएपीएफ की लीडरशिप में आईपीएस अधिकारियों का वर्चस्व बढ़ रहा है और इस कारण सीएपीएफ अधिकारियों की करियर ग्रोथ रुक सी गई है. इससे उनका मनोबल भी गिरता है. केंद्र सरकार इस फैसले से नाखुश थी जबकि सीएपीएफ अधिकारी इस फैसले से खुश थे.
सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दे दिया. इसके बाद सरकार के पास संसद में कानून लाने के अलावा और कोई रास्ता नहीं था. सरकार ने किया भी वही. अपनी पुरानी बात को दोहराते हुए और डेपुटेशन का कोटा बढ़ाते हुए केंद्र सरकार ने बिल पेश किया. संसद के दोनों सदनों में सरकार के पास पर्याप्त बहुमत है, इसलिए बिल पास होने में दिक्कत नहीं आएगी. यही कोटा विवाद की जड़ है.
पक्ष और विपक्ष में क्या-क्या तर्क गिनाए गए?
बिल को लेकर दावा किया गया है कि इसके जरिए IG और उससे ऊपर के पदों पर IPS अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति के नियम तय होंगे. IPS और CAPF कैडर अधिकारियों के बीच पोस्ट शेयरिंग का नियम तय होगा. IPS और CAPF कैडर के लिए कितने पद होंगे, यह तय होगा. सेवा, प्रमोशन औरपोस्टंंग से लेकर कार्यकाल तक को कानून के तहत लाने की कोशिश है. फिलहाल ये नियम एग्जीक्यूटिव ऑर्डर या गाइडलाइन से चल रहे हैं, इन्हें कानूनी रूप दिया जाएगा.
इस बिल के जरिए CAPF और IPS अधिकारियों के बीच सालों से चले आ रहे वर्चस्व के विवाद को खत्म करने की कोशिश है. IPS प्रतिनियुक्ति को लेकरकोर्ट पहुंचने वाले मामलों को रोकना है.
IPS एसोसिएशन का कहना है कि आईपीएस के पास ही प्रशासनिक नेतृत्व होना चाहिए क्योंकि उनके पास अधिक व्यापक अनुभव होता है. वहीं, CAPF का तर्क है कि वो सेवा सर्विस बल को देते हैं, लेकिन बाहर से आए आईपीएस टॉप पोस्ट पर बैठ जाते हैं, नतीजा, प्रमोशन में ठहराव आ जाता है.
सरकार के बिल पर CAPF से जुड़े रहे रिटायर्ड अधिकारियों ने विरोध शुरू कर दिया. यह विरोध दिल्ली के जंतरमंतर पहुंचा. विरोध कर रहे रिटायर्ड अधिकारियों का कहना है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दे दिया तो उसको पलटने की जरूरत क्या है? साथ ही यह भी कहा कि सेंट्रल फोर्सेस के अधिकारियों से भी बात होनी चाहिए थी.
अधिकारियों का कहना है कि इससे सिक्योरिटी फोर्सेस के अधिकारियों की करियर ग्रोथ रुकेगी. उनका मोरल डाउन होगा. इसी बात को भी सुप्रीम कोर्ट ने माना भी था. सीएपीएफ के अधिकारियों के बदले आईपीएस को कमान देने से फोर्स के जवान ठगा हुआ महसूस करेंगे.

























































