नई दिल्ली। वास्तु शास्त्र में ग्रह-नक्षत्रों की गणना के समावेश के द्वारा हम आवासीय परिसर में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति की अलग-अलग स्थिति का आकलन कर सकते हैं, चाहे वे सब एक ही स्थान विशेष में रह रहे हों। वास्तु के नियमों के अनुसार एक भवन परिसर में ग्रहों के प्रभाव के चलते उसके नौ भाग हो जाते हैं और प्रत्येक भाग में रहने वाला अलग-अलग ग्रहों से प्रभावित होता है, अतः उसके स्वास्थ्य और विचारधारा में भी उस ग्रह या ग्रहों के प्रभाव को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
आवसीय परिसर अथवा व्यवसायिक परिसर के समग्र अध्ययन के लिए ज्योतिष का उपयोग किया जाता है। भारतीय ज्योतिष में नवग्रह हैं, सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि और छाया ग्रह राहु और केतु। भूखण्ड परिसर में नवग्रह स्थापना मुख्यतः दो तरह से की जाती है, एक नैसर्गिक और दूसरी तात्कालिक। नैसर्गिक के मापदण्ड पूर्व निर्धारित हैं, जो ज्योतिष-वास्तु के ग्रंथों में वर्णित हैं। प्रत्येक भूखण्ड में स्वतः ही नैसर्गिक ग्रहों का आधिपत्य रहता है।
ज्योतिष में प्रत्येक ग्रह की अपनी दिशा होती है, प्रत्येक ग्रह के अलग-अलग दिशा में स्थित होने से उसकी प्रभावशीलता दिशा विशेष को प्रभावित करती है. क्योंकि ग्रह उस दिशा का नैसर्गिक स्वामी है। तात्कालिक रूप से ग्रहों के स्थान भवन के निर्माण के अनुसार बदलते रहते हैं। अनुभव में तात्कालिक ग्रहों के अधिक क्रियाशील होने के प्रमाण दृष्टिगोचर हुए हैं। ग्रहों की प्रकृति और तात्कालिक उपस्थिति के लिए उन्हें समझना अधिक श्रेयस्कर रहेगा।
लम्बे समय से ज्योतिष-वास्तु के क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों को अपने अनुभव एवं बौद्धिक क्षमता अनुसार सरलतापूर्वक इन विषयों में महारत हासिल हो जाती है। एक सामान्य व्यक्ति द्वारा ज्योतिष और वास्तु के सिद्धांतों को समझने से भवन में भली-भाँति प्रकार ग्रहों और राशियों की दिशा को समझा जा सकता है। चौतरफा विकास के लिए वास्तु के विद्यार्थी को ज्योतिष का प्रारम्भिक ज्ञान में अवश्य निपुण होना चाहिए।

























































