भुवनेश्वर। राज्य में स्कूली शिक्षा को लेकर चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। दसवीं और बारहवीं (प्लस-टू) की बोर्ड परीक्षाओं में शामिल होने के लिए फॉर्म भरने के बावजूद करीब 15 हजार छात्र-छात्राएं परीक्षा से नदारद रहे। इस स्थिति ने एक बार फिर राज्य में बढ़ते ड्रॉपआउट पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
माध्यमिक शिक्षा बोर्ड और उच्च माध्यमिक शिक्षा परिषद के आंकड़ों के मुताबिक, दोनों परीक्षाओं में कुल 14,961 परीक्षार्थी अनुपस्थित रहे। हालांकि इनके परीक्षा में शामिल न होने के स्पष्ट कारण सामने नहीं आए हैं, लेकिन शिक्षा विशेषज्ञ इसे ड्रॉपआउट की बढ़ती प्रवृत्ति से जोड़कर देख रहे हैं।
दसवीं में 10 हजार के करीब छात्र नहीं पहुंचे
दसवीं परीक्षा के लिए 5,46,876 छात्रों ने पंजीकरण कराया था। इनमें से 5,36,946 ने परीक्षा दी, जबकि 9,930 (1.81%) छात्र अनुपस्थित रहे। पिछले एक दशक से राज्य में मैट्रिक के बाद पढ़ाई छोड़ने की प्रवृत्ति लगातार बढ़ रही है। यू-डाइस (2021-22) के अनुसार, ओडिशा में माध्यमिक स्तर पर ड्रॉपआउट दर 27.3% तक पहुंच चुकी है।
प्लस-टू में भी दिखा यही रुझान
प्लस-टू परीक्षा में भी हालात अलग नहीं रहे। कुल 4,01,623 छात्रों में से 5,031 छात्र परीक्षा में शामिल नहीं हुए। सबसे ज्यादा अनुपस्थिति कला संकाय में दर्ज की गई, जहां 3,157 छात्र परीक्षा देने नहीं पहुंचे। इसके अलावा विज्ञान में 924, वाणिज्य में 549 और व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में 401 छात्र अनुपस्थित रहे।
नौकरी की दौड़ में छूट रही पढ़ाई
विशेषज्ञों के मुताबिक, आर्थिक और पारिवारिक दबाव के चलते छात्र कम उम्र में ही नौकरी की ओर रुख कर रहे हैं। कई छात्र पढ़ाई के दौरान ही रोजगार मिलने पर शिक्षा बीच में छोड़ देते हैं। दूरदराज क्षेत्रों में यह समस्या और गंभीर बताई जा रही है, जहां छात्र फॉर्म भरने के बाद भी परीक्षा केंद्र तक नहीं पहुंच पाते।
कारणों की जांच जरूरी: विशेषज्ञ
शिक्षाविदों का मानना है कि फॉर्म भरने के बाद भी परीक्षा न देने के पीछे के कारणों की गहन जांच जरूरी है। साथ ही ऐसे छात्रों की पहचान कर उन्हें दोबारा शिक्षा से जोड़ने के लिए विशेष योजना बनानी चाहिए।
सरकार पर उठे सवाल
उत्कल अभिभावक संघ का कहना है कि हर साल हजारों छात्र मैट्रिक परीक्षा से वंचित रह जाते हैं, लेकिन इस समस्या के समाधान के लिए ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे।
हर जिले में औसतन 300-400 छात्रों का परीक्षा से बाहर रहना शिक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर संकेत है।राज्य में बढ़ती ड्रॉपआउट दर शिक्षा व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो इसका असर भविष्य में उच्च शिक्षा और रोजगार दोनों पर पड़ सकता है।

























































