अंजन साबत की विशेष रिपोर्ट
रायगढ़ा/कालाहांडी: ओडिशा के रायगढ़ा और कालाहांडी जिलों की सीमा पर स्थित सिजीमाली पर्वत श्रृंखला आज एक सुलगते हुए संघर्ष का मैदान बन चुकी है। अपनी अद्भुत प्राकृतिक सुंदरता और हरी-भरी वादियों के कारण ‘ओडिशा का न्यूज़ीलैंड’ कहे जाने वाले इस क्षेत्र को अब कॉर्पोरेट मुनाफे की नजर लग गई है।
आरोप है कि सरकार और प्रशासन की मिलीभगत से धोखाधड़ी करके, पीढ़ियों से यहां रह रहे आदिवासियों की जमीनें छीनकर बॉक्साइट खनन के लिए वेदांता समूह (Vedanta Group) को दी जा रही हैं। इस सौदे ने न सिर्फ आदिवासियों के अस्तित्व पर संकट खड़ा कर दिया है, बल्कि दो राज्यों की कृषि व्यवस्था के लिए भी एक बड़ा पारिस्थितिक (Ecological) खतरा पैदा कर दिया है।

फर्जी ग्राम सभाएं और वन अधिकारों का हनन
स्थानीय आदिवासियों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का सबसे गंभीर आरोप यह है कि वेदांता इस परियोजना के लिए नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ा रही है और प्रशासन मूकदर्शक बना हुआ है। लगभग 1,549 हेक्टेयर में फैले और अनुमानित 311 मिलियन टन उच्च गुणवत्ता वाले बॉक्साइट रिज़र्व वाले इस प्रोजेक्ट के लिए जिस तरह से अनुमतियां ली गई हैं, वे गहरे सवालों के घेरे में हैं। इस 1,549 हेक्टेयर में से लगभग आधा हिस्सा संरक्षित वन भूमि का है। वेदांता की योजना यहां से अगले 50 वर्षों तक सालाना 9 मिलियन टन बॉक्साइट निकालने की है।
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प्रशासन ने दिसंबर 2023 में आठ ग्राम सभाओं से खनन के लिए सहमति मिलने का दावा किया था, लेकिन आरटीआई (RTI) से यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि ये सभी आठ बैठकें एक ही दिन और एक ही समय पर आयोजित दिखाई गईं, जो व्यावहारिक और भौगोलिक रूप से पूरी तरह असंभव है। ग्रामीणों का आरोप है कि सहमति पत्रों में नाबालिग बच्चों, मृत लोगों और बाहरी व्यक्तियों के नाम शामिल किए गए हैं। सच्चाई सामने आने के बाद गांवों ने दोबारा बैठक कर खनन के खिलाफ प्रस्ताव भी पारित किया है। फॉरेस्ट एडवाइजरी कमेटी ने 708 हेक्टेयर वन भूमि के लिए ‘स्टेज-I’ (सैद्धांतिक) मंजूरी की सिफारिश जरूर की है, लेकिन अब तक ‘स्टेज-II’ की अंतिम और अनिवार्य मंजूरी नहीं मिली है।

पुलिसिया बर्बरता और 7 अप्रैल का खूनी संघर्ष
सत्ता और कॉर्पोरेट के इस गठजोड़ का सबसे खौफनाक रूप अप्रैल 2026 में सिजीमाली के प्रभावित गांवों में देखने को मिला। पर्यावरण कानूनों के मुताबिक, अंतिम मंजूरी के बिना खनन गतिविधियां शुरू नहीं की जा सकतीं, फिर भी जमीन पर काम शुरू करने का दबाव बनाया जा रहा है। 7 अप्रैल 2026 को स्टेट हाईवे 44 से सिजीमाली पहाड़ी की चोटी तक 3.5 किलोमीटर लंबी सड़क के निर्माण और पेड़ों की कटाई का विरोध कर रहे आदिवासियों पर पुलिस ने बर्बर कार्रवाई की। इस हिंसक झड़प में 70 से अधिक आदिवासी और 40 से अधिक पुलिसकर्मी घायल हुए। संविधान की पांचवीं अनुसूची के तहत आदिवासी बहुल क्षेत्रों को मिले अधिकारों को दरकिनार कर प्रशासन वेदांता के ‘एजेंट’ के रूप में काम कर रहा है।

आग में घी: नया रेल कॉरिडोर और राजनीतिक उबाल
इस तनाव के बीच, केंद्र सरकार के रेल मंत्रालय ने हाल ही में टिकिरी स्टेशन को कुटरुमाली और सिजीमाली बॉक्साइट खदानों से जोड़ने वाले एक नए 20 किलोमीटर लंबे ब्रॉड-गेज रेल कॉरिडोर की अधिसूचना जारी कर दी है। आदिवासियों ने इसका कड़ा विरोध करते हुए कहा है कि यह बुनियादी ढांचा केवल कॉर्पोरेट हितों को साधने के लिए है।

सिजीमाली का यह मुद्दा अब राष्ट्रीय राजनीति का केंद्र भी बन गया है:
राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) का एक्शन: बीजेडी (BJD) के राज्यसभा सांसद डॉ. सस्मित पात्रा द्वारा पुलिस अत्याचार और संवैधानिक अधिकारों के हनन की याचिका दायर करने के बाद, NCST ने औपचारिक रूप से मामला दर्ज कर लिया है और जल्द ही सिजीमाली में एक हाई-लेवल फैक्ट-फाइंडिंग टीम भेजने की तैयारी कर रहा है।
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विपक्ष का कड़ा विरोध: कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने पंचायत (PESA) अधिनियम 1996 और वन अधिकार (FRA) अधिनियम 2006 के गंभीर उल्लंघन का आरोप लगाते हुए इस पूरे मामले और पुलिसिया कार्रवाई की स्वतंत्र जांच की मांग की है।
विनाश की कगार पर पर्यावरण और नदियां
सिजीमाली में खनन का सबसे भयानक असर यहां के संवेदनशील पर्यावरण और जल स्रोतों पर पड़ेगा। सिजीमाली पहाड़ सिर्फ मिट्टी और पत्थर का ढांचा नहीं, बल्कि एक विशाल प्राकृतिक ‘वॉटर टैंक’ है। बॉक्साइट खनिज की छिद्रपूर्ण (Porous) प्रकृति के कारण ये पहाड़ बारिश के पानी को स्पंज की तरह सोख लेते हैं और फिर उसे धीरे-धीरे छोड़ते हैं। इसी प्राकृतिक स्पंज प्रणाली से 200 से अधिक बारहमासी जलधाराएं निकलती हैं, जो आगे चलकर नागावली और वंशधारा जैसी विशाल नदियों का निर्माण करती हैं। यदि यहां खनन हुआ, तो पहाड़ों का यह ‘स्पंज’ नष्ट हो जाएगा और ये नदियां हमेशा के लिए सूख जाएंगी।
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यह पूरा मुद्दा सिर्फ पर्यावरण या अर्थव्यवस्था का नहीं, बल्कि स्थानीय कोंध, परजा आदिवासियों और डोम दलित समुदाय की आस्था का भी है। यह पहाड़ उनके आराध्य देव ‘तिज राजा’ का पवित्र निवास है। साल 2013 में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक आदेश के बाद ग्राम सभाओं की सहमति न मिलने पर वेदांता का नियामगिरि प्रोजेक्ट रोक दिया गया था। आज सिजीमाली के आदिवासी भी उसी तरह की न्यायपूर्ण जीत की उम्मीद कर रहे हैं और पूछ रहे हैं कि क्या विकास की इमारत जल, जंगल और आदिवासियों के अस्तित्व को मिटाकर ही खड़ी की जाएगी?


























































