नई दिल्ली। हिंदू धर्म में अमावस्या को केवल तिथि परिवर्तन का दिन नहीं, बल्कि पितरों के स्मरण, तर्पण, दान और आत्मशुद्धि का विशेष अवसर माना गया है. खासतौर पर भाद्रपद अमावस्या को कुशग्रहिणी अमावस्या कहा जाता है. इस दिन वर्षभर के धार्मिक और पितृ कर्मों में इस्तेमाल होने वाली कुश घास को ग्रहण करने की परंपरा है.
आखिर क्यों इस दिन ही कुशा तोड़ने की परंपरा है. कुश किन कार्यों में इस्तेमाल की जाती है, इसका धार्मिक महत्व क्या है. कुशग्रहणी अमावस्या 11 सितंबर 2026 को है.
अमावस्या पर क्या-क्या किया जाता है?
अमावस्या पर तीर्थ, नदी या घर में गंगाजल मिले जल से स्नान करने की परंपरा है. इसे शरीर और मन की शुद्धि से जोड़ा जाता है. स्नान के बाद सूर्य को अर्घ्य देना भी शुभ माना जाता है.
अमावस्या तिथि पितरों के लिए महत्वपूर्ण मानी गई है. इस दिन जल, तिल आदि से तर्पण और पूर्वजों का स्मरण किया जाता है. भाद्रपद अमावस्या के बाद आने वाला पितृ पक्ष भी इसी पितृ परंपरा से जुड़ा है, इसलिए यह तिथि पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिहाज से विशेष मानी जाती है.
अमावस्या पर अपनी सामर्थ्य के अनुसार अन्न, वस्त्र, तिल, गुड़ आदि का दान करने की परंपरा है.
शाम को घर की साफ-सफाई करके दीपक जलाएं और लक्ष्मी जी का स्मरण करें. मान्यता है कि स्वच्छता, प्रकाश और सात्त्विक वातावरण से घर में सकारात्मकता आती है.
भाद्रपद अमावस्या पर ही क्यों तोड़ी जाती है कुश?
मासे नभस्यमावास्या तस्यां दर्भश्च यो मतः।अयातयामास्ते दर्भा विनियोज्याः पुनः पुनः॥
अर्थात नभस्य मास (भाद्रपद) की अमावस्या को जो दर्भ ग्रहण किए जाते हैं, वे बार-बार धार्मिक कर्मों में प्रयोग करने योग्य रहते हैं और उनमें ‘यातयाम’ दोष नहीं माना जाता. यही इस तिथि पर कुश ग्रहण करने के विशेष विधान का सबसे महत्वपूर्ण आधार है.
भाद्रपद अमावस्या को कुशग्रहिणी अमावस्या कहे जाने का कारण ही इस दिन कुश ग्रहण की जाती है.
धर्मशास्त्रीय परंपरा में कुश को यज्ञ, श्राद्ध, तर्पण, संकल्प और देवपूजन जैसे कर्मों में पवित्र माना गया है इसलिए इसे सामान्य घास की तरह नहीं, बल्कि धार्मिक कर्म की आवश्यक सामग्री के रूप में देखा जाता है.
कुश ग्रहण करते समय उसे मंत्रपूर्वक और उचित विधि से तोड़ने की परंपरा बताई गई है. धार्मिक मान्यता में कुश को पवित्रता और कर्म की शुद्धता से जोड़ा गया है.
कुश को जड़ से उखाड़ने के बजाय उसके उपयोग योग्य हिस्से को ग्रहण करने की बात कई आचार-पद्धतियों में मिलती है.
कैसे हुई कुश की उत्पत्ति
भगवान विष्णु के रोम से कुश और काश घास की उत्पत्ति हुई. इसी कारण कुश को अत्यंत पवित्र माना गया और इसे विष्णु से संबंधित धार्मिक कर्मों में विशेष स्थान मिला.

























































