नई दिल्ली। भारत 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन (18th BRICS Leaders Summit) की मेजबानी करने को तैयार है. तैयारियों के बीच, आतंकवाद और सीमा पार सुरक्षा खतरे भारत के एजेंडे का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनकर उभर रहे हैं. इस समूह को एक ऐसे मंच के रूप में देखा जा रहा है जहां उन सुरक्षा चुनौतियों के खिलाफ सहयोग बढ़ाया जा सके जो राष्ट्रीय सीमाओं के दायरे से बाहर हैं.
भारत के लिए चुनौती यह है कि वह BRICS के मौजूदा आतंकवाद-विरोधी तंत्र को सीमा पार आतंकवाद, आतंकवादी वित्तपोषण, मादक पदार्थों की तस्करी, संगठित अपराध और प्रौद्योगिकी-सक्षम खतरों के खिलाफ अधिक व्यावहारिक सहयोग में बदले.
यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि BRICS सुरक्षा ढांचा पारंपरिक सुरक्षा चिंताओं से कहीं आगे बढ़ गया है. बीते जून में नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की बैठक के दौरान, सुरक्षा प्रमुखों ने आतंकवाद, साइबर सुरक्षा, उभरती हुई तकनीकों, ऊर्जा और आपूर्ति-शृंखला सुरक्षा तथा जलवायु-जनित अस्थिरता पर चर्चा की थी.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने BRICS के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों और वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारियों से मुलाकात के दौरान कहा था कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में आज की सुरक्षा चुनौतियों से निपटने में इस समूह की महत्वपूर्ण भूमिका है. उन्होंने आतंकवाद, साइबर सुरक्षा और उभरती हुई प्रौद्योगिकियों पर अधिक सहयोग का आह्वान किया.
उन्होंने कहा कि भारत की BRICS अध्यक्षता का मुख्य उद्देश्य सदस्य देशों के बीच “व्यावहारिक सहयोग” को आगे बढ़ाना, ग्लोबल साउथ की प्राथमिकताओं का समर्थन करना और एक सुरक्षित व समावेशी दुनिया के निर्माण में योगदान देना है.
बैठक में BRICS के आतंकवाद-रोधी और सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकियों के उपयोग में सुरक्षा संबंधी संयुक्त कार्य समूहों के कार्यों की भी समीक्षा की गई थी. इसमें शामिल देशों ने आतंकवाद और साइबर जोखिमों से निपटने के लिए कानून लागू करने वाली एजेंसियों के बीच मजबूत सूचना साझा करने, क्षमता निर्माण और आपसी तालमेल का समर्थन किया.
भारत के लिए प्राथमिकताओं में से एक आतंकवाद का समर्थन करने वाले पारिस्थितिकी तंत्र के खिलाफ मजबूत अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई होना हो सकती है. मई में आयोजित 11वीं ब्रिक्स आतंकवाद-रोधी कार्य समूह (BRICS Counter-Terrorism Working Group) की बैठक में, भारत ने सीमा पार आतंकवाद, आतंकवाद के वित्तपोषण, कट्टरपंथ और आतंकवादी समूहों द्वारा उभरती हुई प्रौद्योगिकियों के दुरुपयोग के खिलाफ अधिक सहयोग का आह्वान किया था. बैठक में ब्रिक्स आतंकवाद-रोधी तंत्र को अधिक लचीला और परिणाम-उन्मुख बनाने की जरूरत पर भी चर्चा की गई थी.
विशेषज्ञों का मानना है कि सहयोग के दायरे का विस्तार संभावित रूप से आतंकवादी वित्तपोषण नेटवर्क, संदिग्ध वित्तीय लेनदेन, क्रिप्टोकरेंसी-आधारित फंडिंग और मनी लॉन्ड्रिंग चैनलों की निगरानी करने तक हो सकता है. यह इसलिए और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि आपराधिक और आतंकवादी नेटवर्क तेजी से विभिन्न देशों में काम कर रहे हैं, और धन के लेन-देन व गुर्गों की भर्ती के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म तथा वैकल्पिक वित्तीय प्रणालियों का उपयोग कर रहे हैं.
मादक पदार्थों की तस्करी एक और ऐसा प्रमुख क्षेत्र है जहां भारत BRICS के सदस्य देशों के बीच अधिक सहयोग की उम्मीद कर सकता है. अक्सर ड्रग नेटवर्क का जुड़ाव संगठित अपराध, अवैध वित्तीय प्रवाह और कुछ मामलों में आतंकवादी वित्तपोषण से होता है. तस्करी के मार्गों, नशीले पदार्थ बनाने में इस्तेमाल होने वाले रसायन, वित्तीय लेन-देन और अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट्स पर खुफिया जानकारी का व्यापक आदान-प्रदान, एजेंसियों की क्षमताओं को मजबूत कर सकता है, जिससे वे केवल खेप को जब्त करने के बजाय पूरे नेटवर्क को खत्म कर सकें.
इसी प्रकार, साइबर सुरक्षा एक और उभरता हुआ मोर्चा है. आतंकवादी और आपराधिक समूह तेजी से एन्क्रिप्टेड संचार, सोशल मीडिया, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्रिप्टोकरेंसी और डार्कनेट का गलत उपयोग कर रहे हैं.
जून में हुई BRICS NSA की बैठक में विशेष रूप से आतंकवादी नेटवर्क द्वारा उपयोग की जाने वाली उभरती प्रौद्योगिकियों और साइबर सुरक्षा पर चर्चा की गई थी, जिसमें प्रतिभागियों ने कानून लागू करने वाली एजेंसियों के बीच अधिक सहयोग का समर्थन किया था.
हालांकि, सुरक्षा विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि राजनीतिक सहमति को व्यावहारिक सहयोग में बदलना ही असली परीक्षा होगी.
जाने-माने सुरक्षा विशेषज्ञ और उत्तर प्रदेश पुलिस के पूर्व महानिदेशक प्रकाश सिंह के अनुसार, BRICS का जनसांख्यिकीय, आर्थिक और भौगोलिक महत्व इसे सिर्फ एक आर्थिक और राजनयिक मंच तक सीमित रहने के बजाय एक गंभीर सुरक्षा मंच के रूप में विकसित होने की क्षमता प्रदान करता है.
उन्होंने कहा, “ब्रिक्स शिखर सम्मेलन इस समूह को व्यापक घोषणाओं से आगे बढ़ाकर मापने योग्य सुरक्षा परिणामों की ओर ले जाने का एक अवसर प्रदान कर सकता है – जिसमें बेहतर सूचनाओं का आदान-प्रदान, कानून प्रवर्तन के बीच मजबूत समन्वय और अंतरराष्ट्रीय अपराध को बढ़ावा देने वाले वित्तीय तथा तकनीकी बुनियादी ढांचे के खिलाफ अधिक सहयोग शामिल है.
हालांकि, सिंह ने कहा कि भारत के लिए चुनौती BRICS सदस्यों के बीच महत्वपूर्ण मतभेदों के बावजूद सहयोग का निर्माण करने की होगी, विशेष रूप से भू-राजनीति और राष्ट्रीय सुरक्षा प्राथमिकताओं पर, इस तथ्य को देखते हुए कि चीन, रूस, ईरान, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और अन्य सदस्य जरूरी नहीं है कि आतंकवाद और साइबर सुरक्षा को लेकर समान खतरे की धारणाओं या दृष्टिकोणों को साझा नहीं करते हों.
एक अन्य सुरक्षा विशेषज्ञ ब्रिगेडियर (रिटायर्ड) बीके खन्ना के अनुसार, सामान्य अंतरराष्ट्रीय खतरे BRICS देशों के लिए एक व्यावहारिक शुरुआती बिंदु प्रदान कर सकते हैं.
उन्होंने कहा, “खुफिया एजेंसियां हर भू-राजनीतिक मुद्दे पर सहमत नहीं हो सकती हैं, लेकिन आतंकवादी वित्तपोषण, संगठित अपराध, मादक पदार्थों की तस्करी और साइबर-सक्षम आपराधिक नेटवर्क को खत्म करने में उनका एक जैसा हित है.”
























































