नई दिल्ली। देश की राजधानी में एक महीने से अधिक समय से चल रहे छात्र आंदोलन के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। प्रधान के इस्तीफे पर जहां कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) खुशी से झूम रही है तो विपक्षी दलों ने इसे लोकतंत्र की जीत और सरकार के लिए ‘पहली हार’ करार दिया है। देश को कुछ नए आंदोलनकारी चेहरे मिल गए हैं तो सोशल मीडिया और ‘जेन जी’ ने अपनी ताकत के साथ क्रांति के नए तौर-तरीके भी पेश किए।
धर्मेंद्र प्रधान ने क्या बताई इस्तीफे की वजह
धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा देते हुए एक खुला खत भी देश के युवाओं के नाम लिखा। इसमें उन्होंने जंतर-मंतर पर चल रहे आंदोलन का जिक्र किया और कहा कि पिछले 10 दिनों के घटनाक्रम को देखकर उनका मन दुखी था और यह उनके लिए व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का विषय नहीं।
भारत की युवा शक्ति को देश की असली ताकत बताते हुए प्रधान ने कहा, ‘जंतर-मंतर पर देश में जो स्थिति बनी है, इस स्थिति का राष्ट्र विरोधी ताकतें लाभ ना उठाएं, देश की एकता बनी रहे, भारत के एक भी विद्यार्थी का भविष्य कानूनी पेचीदगियों में ना उलझे, हमारे बच्चे अपना समय पढ़ाई में लगाएं, करियर बनाने पर फोकस करें,इसी बात पर विचार करते हुए मैंने अपना त्यागपत्र माननीय प्रधानमंत्री जी को भेज दिया है।’
क्यों सरकार ने वह किया जो पहले कभी नहीं हुआ
कहा जा रहा है कि मोदी सरकार के 12 सालों में पहली बार ऐसा हुआ है जब जनता के आक्रोश की वजह से किसी मंत्री को इस तरह कुर्सी छोड़ना पड़ा है। हालांकि, इससे पहले सोशल मीडिया पर चले ‘मीटू आंदोलन’ के समय अक्टूबर 2018 में एमजे अकबर ने विदेश राज्य मंत्री के पद से इस्तीफा दिया था। लेकिन उनके इस्तीफे के लिए सरकार पर इस तरह का दबाव नहीं बनाया गया था।
कॉकरोच जनता पार्टी की ओर से 20 जून को शुरू किए गए आंदोलन शुरुआत में भले ही भीड़ जुटाने में कामयाब नहीं हुआ था, लेकिन 18 जून को सोनम वांगचुक को जंतर-मंतर से क्या उठाया गया, आंदोलन ही उठ खड़ा हुआ। 7 दिनों में जिस तरह आंदोलन के प्रति युवाओं में समर्थन उमड़ा उसने पूरी तस्वीर बदल दी। सरकार ऐसे दोराहे पर खड़ी थी जहां एक तरफ उसकी प्रतिष्ठा दांव पर थी, तो दूसरी तरफ देश के वो युवा, जिन्हें बहुत नाराज करने का जोखिम लेना किसी भी सरकार के लिए आसान नहीं था।
क्या सरकार की इसमें हार है?
ऐसे में एक बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या यह मोदी सरकार की हार है? कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, समाजवादी पार्टी, शिवेसना (उद्धव ठाकरे) जैसे दलों ने इसे मोदी सरकार की हार करार दिया है तो भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता इसे सरकार की संवेदनशीलता के तौर पर पेश कर रहे हैं। हालांकि, सवाल यह भी उठता है कि सरकार को युवाओं की आवाज सुनने में इतना वक्त क्यों लगा?
प्रधान के इस्तीफे से सरकार को हासिल क्या होगा?
माना जा रहा है कि सरकार ने काफी सोच और विचार-विमर्श के बाद प्रधान का इस्तीफा लिया है। असल में यह मोदी सरकार के लिए तात्कालिक झटका जरूर है, लेकिन राजनीति में अक्सर फैसले दूरगामी नतीजों को ध्यान में रखकर लिया जाता है। समझा जा रहा है कि मोदी सरकार ने ऐसे ही नफा-नुकसान को तौलकर यह फैसला लिया है।
सरकार के सूत्रों का कहना है कि अगले साल उत्तर प्रदेश समेत पांच राज्यों में चुनाव है। ऐसे में युवाओं की नाराजगी को बढ़ाना उचित नहीं था। बताया जा रहा है कि सरकार ने युवाओं को यह संदेश देने की कोशिश की है कि सरकार उनकी आवाज को सुनती है और उनके भविष्य को लेकर कठोर फैसले करने से नहीं कतराएगी।
हार को जीत में बदलना चाहेगी सरकार
माना जा रहा है कि सरकार ने धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लेकर संसद को सुचारू रूप से चलाने का रास्ता भी साफ कर दिया है। कांग्रेस पार्टी ‘पहले इस्तीफा फिर चर्चा’ की मांग पर अड़ गई थी। सरकार इसी सत्र में पेपर लीक के खिलाफ कानून में सख्त प्रावधान करने जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पेपर लीक के मामलों की सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने की घोषणा की है। इसके अलावा शुक्रवार को कैबिनेट ने एक विधेयक के मसौदे को मंजूरी दे दी जिसमें प्रश्नपत्र लीक के लिए 10 साल जेल और 10 करोड़ रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान है। सरकार की कोशिश अपनी छवि बदलकर युवाओं को उसी तरह भाजपा से जोड़ना होगी, जिनके दम पर वह पिछले डेढ़ दशक में एक के बाद एक चुनावों में जीत हासिल करती रही है।
विपक्ष को क्या हासिल हुआ
मौजूदा घटनाक्रम का विपक्षा कितना फायदा उठा पाएगी, यह आने वाले दिनों में साफ होगा। वर्षों से विपक्ष का विरोध सोशल मीडिया तक सीमित हो गया था, लेकिन युवाओं के आंदोलन के बाद ही सही लेकिन जिस तरह कई विपक्षी दलों ने सड़कों पर उतरकर संघर्ष किया, उसने उनके काडर में एक नया जोश जरूर जगाया होगा।
देश को मिले नए आंदोलनकारी
मई की शुरुआत तक जिस अभिजीत दीपके का नाम देश के लोगों ने सुना नहीं था और जो अमेरिका में पढ़ाई के बाद नौकरी की तलाश में जुटे थे, वह युवाओं के नए नायक के तौर पर उभरे हैं। वहीं, 26 दिनों तक अनशन करके सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने गांधीवादी आंदोलनकारी के रूप में अपनी राष्ट्रीय पहचान हासिल की है। अब देखना दिलचस्प होगा कि ये आंदोलनकारी भविष्य में किन और मुद्दों को उठाते हैं।

























































