नई दिल्ली। पहाड़ खामोश हैं…लेकिन उनके भीतर बड़ा बदलाव हो रहा है। पहले भूकंप भूस्खलन जैसी आपदाओं के सिलसिले का संकेत होता था। लेकिन, अब बिना जमीनी हलचल के ही पहाड़ दरक रहे हैं। दून विवि और आईआईटी कानपुर के वैज्ञानिकों के ताजा अध्ययन से पता चला है कि 2010 के बाद आपदा का पैटर्न तेजी से बदला है।
2010 से पहले दो प्रमुख घाटियों में आए बड़े भूकंप प्राकृतिक आपदा के प्रमुख कारक थे। इसमें अलकनंदा–मंदाकिनी घाटी के चमोली जिले में 1999 का भूकंप (6.8 रिक्टर) और भागीरथी–यमुना घाटी के उत्तरकाशी में 1991 का भूकंप (6.6 रिक्टर) शामिल है। इन भूकंपों के बाद लंबे समय तक भूगर्भीय अस्थिरता बनी रही। लेकिन, अब बिना भूकंप ही भूस्खलन बढ़ रहे हैं।
दून विश्वविद्यालय के प्रोफेसर ने क्या बताया
दून विवि के भूगर्भ विज्ञान विभाग के प्रोफेसर डॉ. विपिन कुमार के अनुसार बारिश के बदलते पैटर्न, बढ़ता निर्माण और पर्यटन का दबाव हिमालय को भीतर ही भीतर कमजोर कर रहा है, जिससे केदारनाथ जैसी त्रासदी का खतरा और गंभीर होता जा रहा है।
नदी घाटियों में बढ़ रहे भूस्खलन प्रभावित क्षेत्र
शोध में यह भी पता चला कि चारधाम से जुड़ी प्रमुख नदी घाटियों में भूस्खलन से प्रभावित क्षेत्र हर साल औसतन 1.82 वर्ग किमी की दर से बढ़ रहा है। इसका मतलब है कि पहाड़ कमजोर हो रहे हैं।
वैज्ञानिकों के सुझाव
शोध दल ने स्पष्ट किया कि संवेदनशील नदी घाटियों की ओर पलायन रोका जाए। किसी भी विकास परियोजना को मंजूरी देने से पहले दीर्घकालिक आपदा जोखिम आकलन अनिवार्य हो।
आंकड़े बढ़ा रहे क्षेत्रवासियों की चिंता
- अलकनंदा-मंदाकिनी घाटी में 1995 से 2010 के बीच 3,742 भूस्खलन हुए। 2010 के बाद यह संख्या 5,759 हो गई।
- भागीरथी-यमुना घाटी में 2010 से पहले के 15 वर्षों में 1,461 भूस्खलन हुए थे, जबकि इसके बाद के 15 वर्षों में यह आंकड़ा बढ़कर 2,890 तक पहुंच गया। यहां भूस्खलन की घटनाओं में दोगुने से भी अधिक की वृद्धि हो गई।

























































