नई दिल्ली। गंभीर और लंबे समय तक चलने वाली बीमारियों में दवाओं पर होने वाला खर्च आम परिवार के बजट पर बड़ा असर डाल सकता है. अक्सर सरकार से जीवनरक्षक दवाओं की कीमतों को कंट्रोल करने की मांग की जाती रही है. अब इसी को लेकर लोकसभा में सांसद हनुमान बेनीवाल और राजकुमार रावत ने सरकार से पूछा है कि सरकार गंभीर बीमारियों में इस्तेमाल होने वाली कीमतों को नियंत्रित करने के लिए क्या कर रही है. इसके अलावा क्या बाजार में बिक रही हर दवा गुणवत्ता के तय मानकों पर खरी उतर रही है?
मिनिस्ट्री ऑफ केमिकल और फर्टिलाइजर्स ने इस सवाल का जवाब देते हुए बताया किदवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए ड्रग्स प्राइस कंट्रोल ऑर्डर यानी DPCO, 2013 के तहत नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) काम करती है. वहीं दवाओं की गुणवत्ता और नकली या मिलावटी दवाओं की निगरानी के लिए ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 और उसके तहत बने नियम लागू हैं.
सरकार जरूरी दवाओं की कीमत तय करने के लिए नेशनल लिस्ट ऑफ एसेंशियल मेडिसिन्स (NLEM) को आधार बनाती है. इस सूची में शामिल दवाओं की अधिकतम कीमत यानी सीलिंग प्राइस, सरकार की संस्था NPPA तय करती है. इन दवाओं को शेड्यूल्ड दवाएं कहा जाता है, इसका अर्थ है ऐसी दवा से है जिसकी बिक्री, खरीद, वितरण या इस्तेमाल पर सरकार के विशेष नियम लागू होते हैं.
साल 2026 में अब तक कितनी दवाओं की कीमत तय की गई है?
- 23 जुलाई 2026 तक सरकार ने 935 जरूरी दवाओं की अधिकतम कीमत तय कर रखी थी
- इन दवाओं की कीमत दोबारा तय करने पर औसतन 17 फीसदी की कमी आई
- इसके अलावा 3,845 नई दवाओं की कीमत भी सरकार ने तय की है. कंपनियां इन दवाओं को तय कीमत से ज्यादा में नहीं बेच सकती हैं
- अगर कोई कंपनी तय सीमा से ज्यादा कीमत वसूलती पाई जाती है तो DPCO, 2013 के तहत कार्रवाई की जा सकती है.
Medicine दवाओं की कीमतें कैसे बढ़ाई जाती हैं?
शेड्यूल्ड दवाओं की कीमत सरकार हर साल होलसेल प्राइस इंडेक्स (WPI) के आधार पर तय करती है. पिछले तीन साल में WPI के आधार पर कीमत बढ़ाने की सीमा 2024 में 0.00551%, 2025 में 1.74028% और 2026 में 0.64956% रही है. इसका मतलब है कि दवाओं की कीमत पर पूरी तरह रोक नहीं है. सरकार हर साल तय करती है कि कंपनियां Scheduled दवाओं की कीमत कितनी बढ़ा सकती हैं। कंपनियां इस तय सीमा से ज्यादा कीमत नहीं बढ़ा सकतीं.
नॉन-शेड्यूल्ड दवाओं की कीमतों को कंट्रोल करने के लिए सरकार के क्या है नियम हैं?
सभी दवाएं Schedule-I में शामिल नहीं होतीं. जो दवाएं इस सूची में नहीं आतीं, उन्हें नॉन-शेड्यूल फॉर्मूलेशन कहा जाता है. इन दवाओं की कीमत बढ़ाने की भी एक सीमा तय है. सरकार के नियम के मुताबिक कोई कंपनी पिछले 12 महीनों की MRP के मुकाबले इन दवाओं की कीमत में एक साल में 10 फीसदी से ज्यादा बढ़ोतरी नहीं कर सकती. हालांकि, बाजार के आंकड़ों के मुताबिक पिछले तीन वर्षों में इन दवाओं की कीमत औसतन हर साल 6.94 फीसदी बढ़ी है. यानी दवाओं की कीमत में वास्तविक बढ़ोतरी सरकार द्वारा तय 10 फीसदी की अधिकतम सीमा से कम रही है.
इसका मतलब यह नहीं है कि हर दवा की कीमत सिर्फ 6.94 फीसदी बढ़ी है. यह बाजार में मौजूद नॉन-शेड्यूल्ड दवाओं की वेटेड एवरेज एनुअल प्राइस में बढ़ोतरी है. अलग-अलग दवाओं की कीमतों में बदलाव अलग हो सकता है. नॉन-शेड्यूल्ड दवाएं ऐसी दवाएं हैं जो सरकार की विशेष रूप से नियंत्रित शेड्यूल वाली दवाओं की सूची में शामिल नहीं होती हैं.
सस्ती दवाओं की मुहैया कराने के लिए सरकार क्या कर रही है?
- सरकार सिर्फ कीमतों पर नियंत्रण के जरिए ही दवाओं को सस्ता रखने की कोशिश नहीं कर रही है.
- प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना यानी PMBJP के तहत जन औषधि केंद्रों पर गुणवत्ता वाली दवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं.
- सरकार के अनुसार इन दवाओं की कीमतें आमतौर पर branded medicines की तुलना में 50 से 80 फीसदी तक कम होती हैं.
- इसके अलावा AMRIT योजना के तहत कैंसर, हृदय रोग और अन्य बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाएं पर 50 फीसदी तक की छूट पर मिलती है.
- वहीं नेशनल हेल्थ मिशन की फ्री ड्रग्स सर्विस इनीशिएटिव के तहत सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में जरूरी दवाएं मुफ्त उपलब्ध कराने का प्रावधान है.
पिछले तीन साल में दवाओं के सैंपल की जांच और उसके रिजल्ट की क्या स्थिति रही
जनता के लिए दवाओं की कीमत ही नहीं, गुणवत्ता भी बड़ी चिंता है. सस्ती दवा उपलब्ध होना तभी उपयोगी है जब वह गुणवत्ता के तय मानकों पर खरी उतरे. सरकार द्वारा लोकसभा में दिए आंकड़ों के मुताबिक पिछले तीन वित्तीय वर्षों में देशभर में बड़ी संख्या में दवाओं के सैंपल की जांच हुई.
2023-24 में कुल 1,06,150 दवा सैंपल जांचे गए. इनमें 2,988 सैंपल नॉट ऑफ स्टैंडर्ड क्वालिटी यानी NSQ पाए गए. NSQ का मतलब है कि सैंपल तय गुणवत्ता मानक पर खरा नहीं उतरा. वहीं, 282 सैंपल नकली या मिलावटी पाए गए. इसी साल ऐसी दवाओं के निर्माण, बिक्री और वितरण से जुड़े 604 प्रोसेक्यूशन यानी कानूननी केसेज दर्ज किए गए.
2024-25 में जांचे गए सैंपलों की संख्या बढ़कर 1,16,323 हो गई. इनमें 3,104 सैंपल NSQ और 245 सैंपल नकली या मिलावटी पाए गए. इस साल केसेज की संख्या बढ़कर 961 हो गई.
2025-26 में 1,41,322 सैंपल जांचे गए. इनमें 3,012 सैंपल NSQ और 283 सैंपल नकली या मिलावटी पाए गए. इस साल 779 प्रॉसेक्यूसन दर्ज किए गए हैं, हालांकि यह आंकड़ा शुरुआती है.
दवाओं में गड़बड़ी पाए जाने पर कार्रवाई कौन करता है?
दवाओं के निर्माण, बिक्री और वितरण को ड्रग्स और कॉस्मेटिक एक्ट, 1940 और ड्रग्स और कॉस्मेटिक रुल्स, 1945 के तहत नियंत्रित किया जाता है. दवा निर्माण, बिक्री और वितरण के लाइसेंस संबंधित राज्यों के स्टेट लाइसेंसिंग अथॉरिटी यानी SLA जारी करते हैं.राज्य के ड्रग कंट्रोल अधिकारी लाइसेंस प्राप्त परिसरों का समय-समय पर निरीक्षण करते हैं. अगर किसी कंपनी या फर्म में नियमों का उल्लंघन मिलता है तो लाइसेंस निलंबित या रद्द किया जा सकता है. इसके अलावा अदालत में केस भी चलाया जा सकता है.
जनता की सबसे बड़ी चिंता क्या है?
सरकार के आंकड़े बताते हैं कि दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए एक व्यवस्था मौजूद है. लेकिन दवाओं की उपलब्धता के साथ-साथ उनकी क्वालिटी भी जरूरी है. पिछले तीन वर्षों में 3 लाख से ज्यादा सैंपलों की जांच हुई. इसमें हजारों सैंपल मानकों के अनुरूप और नकली और मिलावटी पाए गए. इसलिए आम मरीज के लिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि दवा कितनी सस्ती है, बल्कि यह भी है कि दवा तय गुणवत्ता मानकों पर खरी उतरती है या नहीं. वर्ना उनकी सेहत सुधरने की जगह बिगड़ेगी ही.

























































