नई दिल्ली। आपको याद होगा, प्रधानमंत्री बनते ही नरेंद्र मोदी ने विदेश नीति में बड़ा बदलाव करते हुए कहा था कि अब हम ‘लुक ईस्ट पॉलिसी’ की जगह ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ अपनाने जा रहे हैं. तब खूब आलोचना हुई थी. कहा गया कि इसकी क्या जरूरत थी. लेकिन 12 साल बाद यह कमाऊ पूत हो गया है. भारत अब उन्हीं देशों को अपने बनाए हथियार बेच रहा है, जिसे पीएम मोदी ने एक्ट ईस्ट का हिस्सा बताया था.
एक झलक पीएम मोदी की इंडोनेशिया यात्रा के दौरान भी दिखी, जब भारत और इंडोनेशिया के बीच डिफेंस डील पर मुहर लगी. जकार्ता के साथ ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल और अस्त्र एयर-टू-एयर मिसाइल से जुड़े समझौते इस बात का संकेत हैं कि आने वाले वर्षों में भारत की डिफेंस इंडस्ट्री के लिए पूरब का बाजार सबसे बड़ी कमाई का जरिया बनने वाला है. यानी अब पूरब से पैसों की बारिश होने वाली है.
पिछले कुछ वर्षों के आंकड़े भी यही कहानी बताते हैं. 2020 से 2025 के बीच भारत के कुल डिफेंस एक्सपोर्ट का 70.1 फीसदी हिस्सा सिर्फ तीन देशों म्यांमार, फिलीपींस और वियतनाम को गया. यह हिस्सा 2014-19 में महज 16.5 फीसदी और 2008-13 में केवल 14.7 फीसदी था. यानी भारत का डिफेंस एक्सपोर्ट तेजी से पश्चिम से हटकर पूरब की ओर शिफ्ट हो रहा है. यही वजह है कि अब भारत की विदेश नीति और डिफेंस डिप्लोमेसी में इंडो-पैसिफिक रीजन को सबसे ज्यादा अहमियत दी जा रही है.
किसने खरीदा सबसे ज्यादा हथियार?
अगर देशों की बात करें तो म्यांमार भारत का सबसे बड़ा डिफेंस इंपोर्टर बना हुआ है. 2020-25 के दौरान भारत के कुल डिफेंस एक्सपोर्ट में उसकी हिस्सेदारी 36 फीसदी रही. वहीं फिलीपींस ने ब्रह्मोस मिसाइल सौदे के बाद जबरदस्त छलांग लगाई और 27 फीसदी हिस्सेदारी के साथ दूसरा सबसे बड़ा खरीदार बन गया. वियतनाम ने भी 7 फीसदी हिस्सेदारी दर्ज की. इन तीनों देशों की बढ़ती खरीदारी बताती है कि भारत के स्वदेशी हथियार अब सिर्फ घरेलू जरूरत तक सीमित नहीं हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी अपनी जगह बना चुके हैं.
कौन से हथियार बेच रहा भारत?
भारत क्या बेच रहा है, इसमें भी बड़ा बदलाव आया है. पहले भारत जहाज और विमान ज्यादा बेचता था. अब तस्वीर बदल रही है. जहाज अभी भी सबसे बड़ा एक्सपोर्ट प्रोडक्ट हैं और कुल एक्सपोर्ट में उनकी हिस्सेदारी 45 फीसदी है, लेकिन पहले जैसी बादशाहत नहीं रही. अब आर्टिलरी यानी तोपों की हिस्सेदारी 18 फीसदी और मिसाइलों की 16 फीसदी तक पहुंच चुकी है. इसके अलावा एयर डिफेंस सिस्टम भी तेजी से भारत की नई पहचान बन रहे हैं और कुल निर्यात में उनका योगदान 7.4 फीसदी हो चुका है.
पहले क्या बेचता था भारत?
वहीं एक समय ऐसा था जब भारत के डिफेंस एक्सपोर्ट में विमानों का दबदबा था. 2008 से 2013 के बीच विमान कुल डिफेंस एक्सपोर्ट का 71 फीसदी हिस्सा थे. लेकिन अब यह आंकड़ा घटकर केवल 3.9 फीसदी रह गया है. इसकी जगह मिसाइल, तोप और एयर डिफेंस सिस्टम जैसे आधुनिक हथियारों ने ले ली है. इसका मतलब साफ है कि दुनिया अब भारत से सिर्फ प्लेटफॉर्म नहीं, बल्कि हाई-टेक हथियार और आधुनिक युद्ध प्रणाली खरीदने में ज्यादा दिलचस्पी दिखा रही है.
साउथ-पूर्व एशिया इसका सेंटर प्वाइंट बन रहा है. भारत की 85.5 फीसदी मिसाइलें, 77.9 फीसदी आर्टिलरी और 90.2 फीसदी जहाज इसी इलाके के देशों को निर्यात किए गए हैं. यानी ब्रह्मोस हो, भविष्य में आकाशतीर जैसे एयर डिफेंस सिस्टम हों या दूसरे स्वदेशी हथियार, इनके सबसे बड़े खरीदार पूरब के देश बनते जा रहे हैं. चीन की बढ़ती सैन्य गतिविधियों के बीच ये देश अपनी सुरक्षा मजबूत करना चाहते हैं और भारत उनके लिए भरोसेमंद साझेदार बनकर उभरा है.
जियोपोलिटिकल मैसेज भी…
प्रधानमंत्री मोदी की इंडोनेशिया यात्रा इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि यह सिर्फ एक राजनयिक दौरा नहीं है. इसके जरिए भारत ने साफ संदेश दिया है कि वह इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सुरक्षा सहयोग बढ़ाने के साथ-साथ डिफेंस प्रोडक्शन और हथियार निर्यात को भी नई ऊंचाई पर ले जाना चाहता है. इंडोनेशिया के साथ ब्रह्मोस और अस्त्र मिसाइलों को लेकर हुई प्रगति इस रणनीति की बड़ी कड़ी मानी जा रही है. आने वाले समय में ऐसे कई और रक्षा समझौते देखने को मिल सकते हैं.


























































