रायगढ़ा : ओडिशा के रायगढ़ा और कालाहांडी के जंगलों में इन दिनों हवा से मिट्टी की महक नहीं, बल्कि मौत की गंध आ रही है। यहां के सीधे-सादे आदिवासियों और ग्रामीणों के लिए विकास के नाम पर लगाया गया वेदांता का एल्यूमिना रिफाइनरी प्लांट अब एक जानलेवा नासूर बन चुका है। ग्रामीणों और आदिवासियों का सीधा आरोप है कि वेदांता नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ा रहा है और प्रशासन खामोश तमाशबीन बना हुआ है।
मुनाफा कमाने की अंधी दौड़ में वेदांता कंपनी की मनमानी ने हजारों की आदिवासी और ग्रामीण आबादी के सामने जीवन का संकट खड़ा कर दिया है। जिन खेतों में कभी लहलहाती फसलें होती थीं और जहां से आदिवासियों का जीवन चलता था, वहां अब कंपनी से निकलने वाले जहरीले औद्योगिक कचरे यानी ‘रेड मड’ (लाल कीचड़) ने अपना घातक जाल बिछा दिया है।
यह लाल कीचड़ सिर्फ एक सामान्य कचरा नहीं है, बल्कि यह वह धीमा जहर है जो हवा, पानी और मिट्टी के जरिए लोगों की रगों में उतर रहा है। स्थिति इतनी भयानक है कि वेदांता का यह रेड मड मानवीय आबादी के साथ प्राकृतिक जंगलों के लिए भी बड़ा अभिशाप बन गया है। इस लाल कचरे में मौजूद खतरनाक अल्कलाइन (क्षारीय) रसायन जब हवा के साथ उड़कर गांवों में पहुंचते हैं, तो लोगों का सांस लेना मुहाल हो जाता है और बीमारियां घर करने लगती हैं। बारिश के दिनों में तो यह संकट साक्षात मौत बनकर सामने आता है।
सितंबर 2024 की घटना इसका जीता-जागता प्रमाण है, जब वेदांता के रेड मड लेक का तटबंध टूटने से बड़ी मात्रा में यह जहरीला पानी आसपास के खेतों और जीवनदायिनी वंशधारा नदी में जा मिला था। इससे न सिर्फ जलीय जीवों की मौत हुई, बल्कि मवेशियों और इंसानों के स्वास्थ्य पर भी गहरा और जानलेवा प्रहार हुआ। कंपनी कागजों में भले ही पर्यावरण के नियमों का पालन करने का ढिंढोरा पीटती हो, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों का मुंह चिढ़ा रही है।
जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए सदियों से प्रकृति की गोद में रहने वाले आदिवासी आज अपनी ही जमीन पर घुट-घुट कर मरने को मजबूर हैं। ग्राम सभाओं की सहमति और वनाधिकार कानूनों को ताक पर रखकर किए जा रहे इस मनमाने विस्तार से लोगों का गुस्सा अब उबल पड़ा है। मामला भले ही राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) की चौखट तक पहुंच गया हो और कानूनी प्रक्रिया चल रही हो, लेकिन रोज-रोज घुटकर मरने से आजिज आ चुके लोगों के सब्र का बांध अब टूट चुका है। अपनी पीढ़ियों, अपनी आजीविका, अपनी सांसों और अपने जंगलों को इस लाल जहर से बचाने के लिए आंदोलनरत ग्रामीण अब इसको लेकर आर-पार की लड़ाई लड़ने का ऐलान कर चुके हैं। उनका दो टूक कहना है कि विकास की वेदी पर उनके बच्चों की जान और पुरखों की जमीन की बलि किसी भी कीमत पर नहीं चढ़ने दी जाएगी।


























































