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पु‍त‍िन के भारत दौरे से यूरोपीय देश क्‍यों अपसेट?

by Aam Jan
December 3, 2025
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नई दिल्ली। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा से अमेर‍िका तो टेंशन में है ही, यूरोपीय देश भी अपसेट हैं. ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी जैसे ताकतवर देशों ने अजीब तरह से एक मोर्चा खोल द‍िया है. भारत से दोस्‍ती को ताक पर रखकर अनर्गल बयानबाजी कर रहे हैं. भारत ने इसे अपनी संप्रभुता और कूटनीतिक शिष्टाचार पर हमला मानते हुए सख्त एतराज जताया है. लेकिन सबसे तगड़ा जवाब विदेश मंत्री एस जयशंकर ने द‍िया. जयशंकर ने पश्चिमी देशों को एक अलग मोर्चे पर घेरते हुए साफ कर दिया है कि अगर वे अपनी नीतियों से बाज नहीं आए, तो नुकसान उनका ही होगा.

यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद पुतिन की यह विदेश यात्राओं में से एक दुर्लभ यात्रा है. पश्चिमी देश खासकर अमेरिका और यूरोप पिछले तीन सालों से पुतिन को वैश्विक मंच पर अलग-थलग करने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन जब दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र भारत पुतिन का ‘रेड कार्पेट’ वेलकम करने को तैयार हो, तो पश्चिम की यह मुहिम कमजोर पड़ती दिखती है. यही कारण है कि पुतिन के प्लेन के लैंड करने से पहले ही यूरोप के तीन बड़े देशों ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी ने दिल्ली में एक नई बहस छेड़ दी.

पुतिन की यात्रा से ठीक पहले, भारत के एक प्रमुख अंग्रेजी अखबार में एक ज्‍वाइंट आर्टिकल छपा. इसे लिखने वाले कोई साधारण लेखक नहीं, बल्कि भारत में तैनात तीन देशों के राजदूत थे. ब्रिटिश उच्चायुक्त लिंडी कैमरून, फ्रांसीसी राजदूत थिएरी मथौ, जर्मन राजदूत फिलिप एकरमैन ने एक ज्‍वाइंट आर्टिकल लिखा. इन तीनों राजनयिकों ने सीधे तौर पर व्लादिमीर पुतिन को यूक्रेन युद्ध का ‘विलेन’ करार दिया. उन्होंने लिखा, रूस शांति के प्रति गंभीर नहीं है. पुतिन एकमात्र ऐसे नेता हैं जो जब चाहें युद्ध रोक सकते हैं, लेकिन वे ऐसा नहीं कर रहे.

10 प्‍वाइंट में समझ‍िए आख‍िर यूरोपीय देश इतने अपसेट क्‍यों हैं?
‘आइसोलेशन प्लान’ फेल होना: पश्चिमी देशों ने पिछले 3 साल से पूरी ताकत लगा दी कि पुतिन को दुनिया में ‘अछूत’ बना दिया जाए. लेकिन जब दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र भारत पुतिन का ‘रेड कार्पेट’ वेलकम करता है, तो पश्चिम का यह पूरा प्लान धरा का धरा रह जाता है.

भारत की ‘रणनीतिक स्वायत्तता’: यूरोप चाहता था कि भारत उनके खेमे में खड़ा हो. लेकिन भारत ने साफ कर दिया कि वह अपने फैसले खुद लेगा. भारत का रूस के साथ खड़ा होना पश्चिम के उस अहंकार पर चोट है, जिसमें वे मानते हैं कि जो हमारे साथ नहीं, वो हमारे खिलाफ है.

रूस से रिकॉर्ड तेल खरीद: यूरोपीय देशों ने रूस की अर्थव्यवस्था तोड़ने के लिए तेल पर प्रतिबंध लगाए. लेकिन भारत ने रूस से रिकॉर्ड सस्ता तेल खरीदकर रूस की अर्थव्यवस्था को डूबने से बचा लिया. यूरोप की चिढ़ इस बात से है कि उनके प्रतिबंध भारत की वजह से बेअसर हो रहे हैं.

‘युद्ध अपराधी’ की छवि न स्वीकारना: पश्चिमी मीडिया और नेता पुतिन को ‘वार क्रिमिनल’ कहते हैं. वे चाहते थे कि भारत भी यही भाषा बोले. लेकिन भारत ने पुतिन को एक सम्मानित ‘स्टेट गेस्ट’ का दर्जा देकर यूरोप के इस नरेटिव को खारिज कर दिया.

पीएम मोदी के बयान का डर: यूरोप बार-बार पीएम मोदी के उस बयान यह युद्ध का युग नहीं है का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए करता रहा है. लेकिन इस दौरे से यह साफ हो गया कि मोदी का वो बयान ‘शांति की अपील’ थी, ‘रूस से दुश्मनी’ का ऐलान नहीं. इससे उनका प्रोपेगेंडा कमजोर पड़ा.

ग्लोबल साउथ पर असर: भारत विकासशील देशों की आवाज है. अगर भारत पुतिन के साथ बिजनेस जारी रखता है, तो अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के अन्य देश भी पश्चिम के दबाव में आने से मना कर देंगे. यह पश्चिम के वैश्विक दबदबे के लिए खतरा है.

रक्षा सौदों का जारी रहना: नाटो (NATO) देश चाहते हैं कि भारत रूसी हथियारों (जैसे S-400) पर निर्भरता खत्म करे और उनसे हथियार खरीदे. पुतिन के दौरे का मतलब है कि भारत और रूस के रक्षा संबंध और मजबूत होंगे, जो पश्चिमी हथियार कंपनियों के लिए बुरी खबर है.

भारत का ‘आइना दिखाना’: विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कई मंचों पर यूरोप को सुनाया है कि यूरोप की समस्याएं दुनिया की समस्याएं हैं, लेकिन दुनिया की समस्याएं यूरोप की नहीं. भारत का यह बेबाक अंदाज और अब पुतिन का स्वागत, यूरोप की ‘सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स’ (श्रेष्ठता की भावना) को चुभता है.

रूस-चीन गठबंधन का डर: पश्चिम को डर है कि अगर भारत ने रूस का साथ छोड़ दिया, तो रूस पूरी तरह चीन की गोद में बैठ जाएगा. लेकिन भारत रूस के साथ दोस्ती निभाकर बैलेंस बना रहा है. यूरोप को चिढ़ इस बात की है कि वे इस जटिल समीकरण को अपनी मर्जी से नहीं चला पा रहे.

राजनयिक ‘लक्ष्मण रेखा’ पार करना: उनकी चिढ़ का ताजा कारण यह भी है कि भारत ने उनके राजदूतों के लेख को अस्वीकार्य बताकर उन्हें उनकी हद याद दिला दी. उन्होंने उम्मीद नहीं की थी कि भारत उनके लेख पर इतनी सख्त प्रतिक्रिया देगा और उन्हें कूटनीतिक शिष्टाचार का पाठ पढ़ाएगा.

जयशंकर की ललकार-हमें छेड़ोगे तो झेलोगे
जहां एक तरफ राजदूतों के जरिए ‘लेटर वॉर’ चल रहा था, वहीं दूसरी तरफ भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने एक अलग मंच से पश्चिमी देशों को सख्त संदेश दिया. यह संदेश माइग्रेशन और टैलेंट को लेकर था. जयशंकर की टोन बता रही थी कि भारत अब सुनने के मूड में नहीं है, बल्कि सुनाने की ताकत रखता है. ‘इंडिया ग्लोबल फोरम’ में जयशंकर ने पश्चिमी देशों में बढ़ रही प्रवासी विरोधी मानस‍िकता पर हमला बोला.

उन्‍होंने कहा, अपनी गलतियों का ठीकरा हम पर न फोड़ें. पश्चिम में जो आर्थिक दिक्कतें हैं, वे प्रवासियों की वजह से नहीं हैं. अगर अमेरिका या यूरोप में नौकरियां जाने की चिंता है, तो यह इसलिए है क्योंकि पिछले 20 सालों में आपने जानबूझकर अपने बिजनेस बाहर भेजे. यह आपकी रणनीति थी. अब इसे ठीक करने के लिए प्रवासियों को दोष देना बंद करें. विदेश मंत्री ने चेतावनी दी कि हम अब ‘नॉलेज इकोनॉमी’ के दौर में हैं. अगर आप टैलेंट के प्रवाह में बाधाएं खड़ी करेंगे, तो अंततः ‘टोटल लॉस’ आपका ही होगा. आपको भारत की स्किल्ड वर्कफोर्स की जरूरत है, न कि हमें आपकी दया की.

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