नई दिल्ली। मैंने अपने काम के दौरान बार-बार यह देखा है कि जिन बच्चों और किशोरियों के लापता होने या मानव तस्करी का शिकार बनने के मामले सामने आते हैं, उनमें एक समानता स्पष्ट होती है। वे सामाजिक रूप से कमजोर और असुरक्षित, यानी वल्नरेबल होती हैं।
मेरा अनुभव बताता है कि लड़कियां जैसे ही स्कूल व्यवस्था से बाहर होती हैं, उसी क्षण से उनके शोषण और तस्करी का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है। जब तक बच्चे नियमित रूप से स्कूल जाते हैं, वे व्यवस्था की निगरानी में रहते हैं। लेकिन जैसे ही वे स्कूल छोड़ते हैं, वे गिनती से बाहर चले जाते हैं और एक ऐसे ग्रे-एरिया में प्रवेश कर जाते हैं, जहां अपराधी नेटवर्क उन्हें आसानी से अपना शिकार बना लेते हैं।
भारत में मानव तस्करी फिल्मों जैसी नहीं…
भारत में मानव तस्करी अक्सर फिल्मों में दिखाए जाने वाले हिंसक अपहरण जैसी नहीं होती। यहां तस्कर हथियार लेकर नहीं, बल्कि भरोसा जीतकर वार करते हैं। कई बार वे परिवार या पीड़िता के परिचित होते हैं, जो बेहतर भविष्य, नौकरी या शिक्षा का सपना दिखाकर लड़कियों को बहला-फुसलाकर घर से बाहर ले जाते हैं और बाद में उन्हें शोषण के दलदल में धकेल देते हैं। यह अपराध विश्वासघात की जमीन पर फलता-फूलता है।
दिल्ली और एनसीआर इस नेटवर्क में एक साथ स्रोत भी हैं और गंतव्य भी। यहां सबसे अधिक असुरक्षित वे किशोरियां हैं, जो प्रवासी परिवारों के साथ रोजगार की तलाश में आती हैं। दूसरी ओर, झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा जैसे राज्यों से लड़कियों को सुनहरे भविष्य का लालच देकर दिल्ली लाया जाता है और घरेलू काम दिलाने के नाम पर बेच दिया जाता है।
‘प्लेसमेंट एजेंसियों की संदिग्ध भूमिका’
इस पूरी श्रृंखला में कई प्लेसमेंट एजेंसियों की संदिग्ध भूमिका सामने आती रही है। मैं लंबे समय से कहता आया हूं कि प्लेसमेंट एजेंसियों का सख्त नियमन और नियमित निगरानी किए बिना मानव तस्करी पर प्रभावी रोक संभव नहीं है।
तस्करों का सबसे बड़ा हथियार फर्जी दस्तावेज हैं। विशेष रूप से नकली आधार कार्ड बनवाकर नाबालिग लड़कियों को बालिग दिखाया जाता है। मैं सभी पुलिस और प्रवर्तन एजेंसियों को स्पष्ट रूप से कहना चाहता हूं कि आधार कार्ड आयु का प्रमाण नहीं है। जुवेनाइल जस्टिस अधिनियम के अनुसार आयु सत्यापन के लिए जन्म प्रमाण पत्र या शैक्षणिक प्रमाण पत्र ही मान्य होते हैं।
यदि आयु को लेकर एक प्रतिशत भी संदेह हो, तो बच्चे को तुरंत चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के समक्ष प्रस्तुत करना प्रशासन का दायित्व है। बस अड्डों, रेलवे स्टेशनों और सड़क मार्गों पर तैनात कर्मियों को इस कानूनी स्थिति की नियमित ट्रेनिंग दी जानी चाहिए, ताकि आधार कार्ड दिखाओ और छोड़ दो जैसी खतरनाक प्रवृत्ति खत्म हो।
मेरे लिए सबसे पीड़ादायक अनुभव यह रहा है कि कई बार रेस्क्यू के दौरान कानून की बुनियादी समझ के अभाव में स्थानीय स्तर पर बाधाएं खड़ी हो जाती हैं। प्रशिक्षण, संवेदनशीलता और अभिविन्यास की कमी के कारण जमीनी कर्मचारी सही समय पर सही निर्णय नहीं ले पाते।
दुर्भाग्य से, हमने प्रशिक्षण का काम वर्षों से एनजीओ पर छोड़ दिया है। यह जिम्मेदारी सरकारी तंत्र की होनी चाहिए। जब तक कानून की समझ व्यवस्था के भीतर विकसित नहीं होगी, तब तक अच्छे कानून भी कागजों में कैद रहेंगे।
‘समस्या कानूनों की कमी नहीं, अमल में ढिलाई’
भारत में बच्चों की सुरक्षा के लिए पाक्सो अधिनियम, जुवेनाइल जस्टिस अधिनियम, बाल श्रम निषेध कानून और बाल विवाह प्रतिषेध कानून जैसे मजबूत ढांचे मौजूद हैं। यदि इनका समेकित और ईमानदार क्रियान्वयन हो, तो एक भी बच्चा तस्करी का शिकार न हो। समस्या कानूनों की कमी नहीं, बल्कि उनके अमल में ढिलाई है।
अठारह वर्ष से अधिक उम्र की युवतियों के लिए वन-स्टाप सेंटर जैसे तंत्र भी मौजूद हैं, लेकिन उनका उपयोग प्रभावी ढंग से नहीं हो रहा। तस्करी का शिकार व्यक्ति अक्सर यह मानता है कि उसे बेहतर भविष्य मिल रहा है, इसलिए वह स्वयं शिकायत नहीं करता। ऐसे मामलों में प्रशासन को प्रो-एक्टिव होकर संदेह के आधार पर भी हस्तक्षेप करना होगा।
मैं एक अनुभव साझा करना चाहूंगा। हाल ही में मुंबई एयरपोर्ट पर एक जागरूक नागरिक ने संदेह जताया कि एक बच्ची को विदेशी दंपती ले जा रहे हैं। त्वरित समन्वय से दस्तावेजों की जांच हुई और पता चला कि बच्ची वैध रूप से गोद ली गई थी। यह घटना बताती है कि सजगता कभी नुकसान नहीं करती। यदि संदेह गलत भी निकले, तो भी जांच होना बेहतर है।
मेरा मानना है कि मानव तस्करी पर प्रभावी रोक केवल प्रशासनिक प्रयासों से संभव नहीं है। समाज को भी अपनी दृष्टि बदलनी होगी। स्टेशन, प्लेटफार्म, सड़क, मोहल्ले और रिश्तेदारों के बीच दिखने वाले हर बच्चे को केवल राहगीर की तरह नहीं, बल्कि संभावित पीड़ित की नजर से देखना होगा।
कानून सरकार बनाती है, व्यवस्था सरकार चलाती है, लेकिन जब तक नागरिक सतर्क नहीं होंगे और व्यवहार में बदलाव नहीं आएगा, तब तक बच्चों की सुरक्षा का सपना अधूरा ही रहेगा।

























































