नई दिल्ली। ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत ने अपने डिफेंस सिस्टम को अपग्रेड करने की रफ्तार तेज कर दी है. चीन और पाकिस्तान जैसे पड़ोसियों की वजह से ऐसा करना जरूरी भी हो गया है. ऑपरेश सिंदूर के दौरान चीन और पाकिस्तान की मिलीभगत पहले ही सामने आ चुकी है. मौजूदा सामरिक हालात को देखते हुए भारत ने खुद को दो मोर्चों पर युद्ध लड़ने के लिए तैयार करने की प्लानिंग करनी शुरू कर दी है. आर्मी से लेकर एयरफोर्स और नेवी तक को ताकतवर बनाने के लिए हजारों-लाखों करोड़ रुपये का निवेश किया जा रहा है. स्वदेशी के साथ ही फौरी जरूरतों को पूरा करने के लिए इंपोर्ट को भी बराबर की तरजीह दी जा रही है. खासकर एयरफोर्स को अल्ट्रा मॉडर्न टेक्नोलॉजी से लैस इक्विपमेंट के साथ इंटीग्रेट करने की योजना पर लगातार काम किया जा रहा है.
पांचवीं पीढ़ी का फाइटर जेट डेवलप करने के लिए AMCA प्रोजेक्ट लॉन्च किया गया है. वहीं, मौजूदा जरूरतों को पूरा करने के लिए अमेरिकी F-35 और रूसी Su-57 फिफ्थ जेनरेशन फाइटर जेट खरीदने की योजना पर विचार किया जा रहा है. ये दोनों विकल्प फिलहाल टेबल पर हैं. F-35 और Su-57 में से एक या फिर दोनों को इंडियन एयरफोर्स की फ्लीट में शामिल किया जा सकता है. इसके अलावा भारत ने 3.25 लाख करोड़ की लागत से 114 राफेल फाइटर जेट की खरीद को हरी झंडी दिखा दी है.
इनमें से कुछ विमान पूरी तरह से तैयार स्थिति में भारत को मिलेंगे, जबकि अधिकांश जेट का प्रोडक्शन भारत में ही फ्रांस की साझेदारी में किए जाने की संभावना है. इन सबके बीच, इंडियन एयरफोर्स को शक्तिशाली बनाने का बड़ा प्लान सामने आया है. बताया जा रहा है कि भारत 100 अरब डॉलर यानी 9 लाख करोड़ रुपये से भी ज्यादा की लागत से वायुसेना का आधुनिकीकरण करेगा, ताकि जरूरत पड़ने पर चीन और पाकिस्तान को एक साथ मुंहतोड़ जवाब दिया जा सके.
भारत की वायु शक्ति एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है. हिमालय की ऊंचाइयों से लेकर थार रेगिस्तान के आसमान तक गूंजती लड़ाकू विमानों की गर्जना अब सिर्फ अभ्यास का संकेत नहीं, बल्कि बदलती रणनीतिक सोच का प्रतीक है. भारतीय वायुसेना (IAF) ने 2040 तक अपनी स्वीकृत क्षमता 42 स्क्वाड्रन तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है. कभी 31 स्क्वाड्रन तक सिमट चुकी ताकत को दोबारा मजबूत बनाने के लिए करीब 100 अरब डॉलर का व्यापक मॉडर्नाइजेशन प्लान पर काम चल रहा है. इसका सबसे बड़ा आकर्षण मल्टी-रोल फाइटर एयरक्राफ्ट (MRFA) प्रोग्राम के तहत 114 राफेल विमानों की संभावित खरीद है.
Indian Air Force के लिए यह अब तक की सबसे बड़ी लड़ाकू विमान खरीद मानी जा रही है, जिसकी लागत लगभग 35-40 अरब डॉलर (करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये) आंकी गई है. रक्षा अधिग्रहण परिषद की शुरुआती मंजूरी के बाद इस सौदे में बड़ी संख्या में विमानों का निर्माण देश में ही करने की योजना है. यह सौदा ‘आत्मनिर्भर भारत’ को गति देने वाला साबित हो सकता है. पहले से सेवा में मौजूद 36 राफेल और नेवी के लिए प्रस्तावित राफेल-M के साथ भारत राफेल फाइटर जेट ऑपरेशन के मामले में प्रमुख देशों में शामिल हो जाएगा.
5th के साथ 6th जेन टेक्नोलॉजी पर नजर
भारत छठी पीढ़ी की तकनीक पर भी नजरें गड़ाए हुए है. फ्रांस, जर्मनी और स्पेन के संयुक्त कार्यक्रम फ्यूचर कॉम्बैट एयर सिस्टम (FCAS) में संभावित भागीदारी पर गंभीर चर्चा चल रही है. Future Combat Air System में पूर्ण भागीदारी की स्थिति में भारत को लगभग 25 अरब यूरो (करीब 29-30 अरब डॉलर) का निवेश करना पड़ सकता है. यह महंगा कदम जरूर है, लेकिन इसके बदले स्टील्थ टेक्नोलॉजी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बेस्ड स्वॉर्मिंग और नेटवर्क-सेंट्रिक वॉरफेयर जैसी उन्नत क्षमताओं तक पहुंच मिल सकती है.
विशेषज्ञ मानते हैं कि इससे भारत के स्वदेशी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) कार्यक्रम को तकनीकी बढ़त मिल सकती है. रूस के साथ पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान Sukhoi Su-57E की संभावित खरीद पर भी बातचीत आगे बढ़ रही है. लगभग 8 अरब डॉलर के इस सौदे में 36-40 विमानों का अधिग्रहण शामिल हो सकता है. माना जा रहा है कि यह कदम AMCA के पूरी तरह से ऑपरेशन में आने से पहले स्टील्थ क्षमता की कमी को अस्थायी रूप से पूरा कर सकता है. हालांकि, पश्चिमी प्रतिबंधों और उत्पादन संबंधी चुनौतियों के कारण इस विकल्प पर सतर्कता बरती जा रही है. लाइसेंस उत्पादन की पेशकश के साथ यह सौदा त्वरित समाधान तो दे सकता है, लेकिन दीर्घकालिक रणनीति स्वदेशी कार्यक्रमों पर ही केंद्रित है.

























































