नई दिल्ली : हिंदू धर्म और ज्योतिष शास्त्र में पितरों का स्थान देवताओं के समान माना गया है. कहते हैं कि यदि घर के पूर्वज खुश हों, तो जीवन में सुख-समृद्धि की वर्षा होती है. लेकिन, यदि कुंडली में ‘पितृ दोष’ हो, तो इंसान का जीवन बाधाओं का घर बन जाता है. अक्सर हमारे बनते काम बिगड़ने लगते हैं या परिवार में कलह का माहौल रहता है. ज्योतिषीय गणना के अनुसार, संवत के आखिरी पक्ष यानी चैत्र कृष्ण पक्ष की अमावस्या पितरों को प्रसन्न करने के लिए सबसे उत्तम मानी गई है. अगर आप भी पितृ दोष के लक्षणों से परेशान हैं, तो धर्मनगरी हरिद्वार में कुछ विशेष स्थानों पर पिंडदान और तर्पण करके आप अपने पूर्वजों का आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं.
कैसे पहचानें कि आप पितृ दोष से पीड़ित हैं?
हरिद्वार के प्रसिद्ध ज्योतिषी पंडित श्रीधर शास्त्रीके अनुसार, पितृ दोष के लक्षण बहुत स्पष्ट होते हैं. यदि परिवार में बार-बार मांगलिक कार्यों में बाधा आ रही है, शादी-ब्याह में देरी हो रही है, या वंश वृद्धि (संतान सुख) में रुकावट है, तो यह पितृ दोष का संकेत हो सकता है. इसके अलावा करियर में अचानक गिरावट, परिवार में बेवजह के झगड़े, सपनों में बार-बार पितरों का दिखना या सांप के सपने आना भी इस दोष की श्रेणी में आता है. जब पूर्वजों की आत्मा को शांति नहीं मिलती, तो उनका असंतोष परिवार के विकास को रोक देता है.
संवत 2082 की चैत्र अमावस्या: शुभ मुहूर्त
पंडित श्रीधर शास्त्री बताते हैं कि इस साल संवत 2082 के चैत्र कृष्ण पक्ष की अमावस्या का समय बेहद महत्वपूर्ण है. इसकी शुरुआत 17 मार्च से हो चुकी है, जो 19 मार्च की सुबह 6:52 बजे तक रहेगी. इस कालखंड में किया गया दान, तर्पण और पितृ गायत्री का पाठ अक्षय फल देने वाला होता है.
हरिद्वार के इन 3 स्थानों पर मिलेगा पितरों को मोक्ष
धार्मिक ग्रंथों और ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, हरिद्वार में तीन ऐसी जगहें हैं जहां पितृ पूजा करने से नाराज पूर्वज भी मान जाते हैं:
1. कुशावर्त घाट (हर की पौड़ी): यह घाट बेहद प्राचीन और चमत्कारी माना जाता है. मान्यता है कि प्राचीन काल में यहाँ पवित्र कुशा के विशाल वृक्ष थे, जिनके बीच अमृत कलश को सुरक्षित रखा गया था. यहाँ पितृ कर्म करने से पूर्वजों को सीधे मोक्ष की प्राप्ति होती है.
2. नील धारा तट (चंडी घाट): कुशावर्त घाट से करीब 500 मीटर की दूरी पर नील पर्वत के पास नील धारा घाट स्थित है. पुराणों में इस स्थान की महिमा का विस्तार से वर्णन है. यहां बहती गंगा की धारा में पूर्वजों को जलांजलि देने से पितृ दोष का प्रभाव समाप्त हो जाता है.
3. प्राचीन नारायणी शिला मंदिर: हरिद्वार के मध्य में स्थित नारायणी शिला मंदिर को पितृ शांति का केंद्र माना जाता है. पंडित शास्त्री बताते हैं कि जो पितृ प्रेत योनि में भटक रहे होते हैं, उनके लिए यहां पिंडदान और पितृ गायत्री का पाठ करने से उन्हें मुक्ति मिलती है. यहां पूजा करने के बाद पितृ अपने लोक को प्रस्थान करते हैं और अपने वंशजों को सुख-शांति का आशीर्वाद देते हैं.
क्या करें उपाय?
अमावस्या की तिथि पर हरिद्वार पहुंचकर पितरों के निमित्त पिंडदान, तर्पण, जलांजलि और तिलांजलि दें. यदि आप हरिद्वार नहीं जा पा रहे हैं, तो अपने घर पर भी पितरों के नाम से सात्विक भोजन निकालें और किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद को दान दें. मान्यता है कि संवत के अंत में किया गया यह अनुष्ठान पूरे साल की बाधाओं को दूर कर देता है.























































