नई दिल्ली। कुछ सालों से हिंदू धर्म के व्रत और त्योहारों में यह देखने को मिल रहा है कि कोई व्रत या त्योहार दो दिन का हो जाता है. अब दो दिन के व्रत और त्योहार के होने से उसका मजा किरकिरा होता है और लोगों में असमंजस की स्थिति बन जाती है. अब होली के त्योहार को ही ले लीजिए. कहीं पर होली 3 मार्च की है तो कहीं पर होली 4 मार्च की. पता चला कि आधा देश 3 मार्च को और आधा देश 4 मार्च को होली मना रहा है. आखिर ऐसा क्यों होता है? कुछ सालों पहले तो ऐसा नहीं होता था. एक दिन तय हो जाता था और उसी दिन पूरे देश में होली मनाई जाती है.
व्रत और त्योहार की तारीख पर असमंजस क्यों?
दरअसल हर व्रत और त्योहार के लिए कुछ निश्चित तिथि, नक्षत्र, समय आदि निर्धारित होते हैं. कभी कभी विशेष तिथि में कोई नक्षत्र नहीं होता या फिर वह समय उपलब्ध नहीं होता है, जिसकी आवश्यकता होती है. ऐसे ही कभी-कभी भद्रा और चंद्र ग्रहण या सूर्य ग्रहण की वजह से भी व्रत और त्योहारों की तारीख पर असमंजस की स्थिति बन जाती है.
केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय जम्मू के ज्योतिषाचार्य के अनुसार, हिंदू धर्म के व्रत और त्योहार सूर्योदय एवं सूर्यास्त के समय को ध्यान में रखकर तय किए जाते हैं. अब आप देखेंगे कि अरुणाचल प्रदेश में सूर्योदय सबसे पहले होता है, तो वहां पर सूर्यास्त भी पहले होगा. ऐसे ही गुजरात या मुंबई के क्षेत्र में सूर्योदय देर से होता है तो वहां पर सूर्यास्त भी देर से होगा.
ऐसी स्थिति में अब आप सोचें कि दिल्ली में बैठे हैं और दिल्ली के सूर्योदय और सूर्यास्त के आधार पर किसी व्रत की तारीख को तय करते हैं, लेकिन वाराणसी, पटना या मुंबई में आप चाहते हैं कि उसी दिन वह व्रत या त्योहार हो तो ऐसा संभव नहीं है क्योंकि इन जगहों पर सूर्योदय और सूर्यास्त के समय में अंतर है. अपना देश जम्मू से कन्याकुमारी और गुजरात से अरुणाचल तक फैला है. इन पूरे क्षेत्र में सूर्योदय और सूर्यास्त के समय में ढाई घंटे तक का अंतर मिल सकता है. यही वजह है कि देश में एक ही व्रत और त्योहार के लिए दो दिन तय हो जाते हैं.
ज्योतिषाचार्य कहते हैं कि सोशल मीडिया या इंटरनेट की क्रांति की वजह से भी यह स्थिति बनी है. दरअसल जब इंटरनेट क्रांति नहीं हुई थी तो स्थानीय पंडित जी अपने पंचांग के आधार पर व्रत और त्योहार की तारीख बताते थे. लेकिन अब क्या है कि मुंबई में बैठा हुआ ज्योतिषाचार्य बनारस का पंचांग लेकर व्रत या त्योहार की तारीख बता रहा है, उस पंचांग में बनारस और आसपास के क्षेत्रों के सूर्योदय और सूर्यास्त की गणना है. व्रत या त्योहार की तिथि का समय वाराणसी और उस क्षेत्र के लिए है, न कि मुंबई के लिए. अब आप इतने बड़े देश में एक व्रत या त्योहार के लिए एक ही तारीख चाहेंगे तो वह कठिन है. तारीख में एकरूपता का होना मुश्किल है.
कैसे करें व्रत-त्योहार की सही तारीख का पता?
इस सवाल पर ज्योतिषाचार्य कहते हैं कि आपको जिस भी व्रत या त्योहार की सही तारीख जाननी है तो इसका सबसे आसान तारीका है स्थानीय पंचांग.
सबसे पहले आप जिस जगह पर रहते हैं, उस जगह का स्थानीय पंचांग लें. उसमें आप देखें कि आपको जो व्रत रखना है या त्योहार मनाना है, तो उसकी तिथि कब से कब तक है? यानि तिथि का सूर्योदय और सूर्यास्त का समय क्या है?
जब आपको सूर्योदय और सूर्यास्त का समय ज्ञात हो जाए तो उदयातिथि यानि जिस दिन सूर्योदय हो, उस दिन व्रत रखें. उस दिन की तारीख व्रत की सही तारीख होगी.
उदाहरण के लिए होलिका दहन फाल्गुन पूर्णिमा को सूर्यास्त के बाद करते हैं, लेकिन उसमें भद्रा का साया न हो और चैत्र कृष्ण प्रतिपदा को रंगों की होली मनाते हैं. आपको होलिका दहन की तारीख जाननी है तो सबसे पहले स्थानीय पंचांग में देखें कि फाल्गुन पूर्णिमा तिथि कब से कब तक है और उसमें भद्रा तो नहीं है.
भद्रा रहित फाल्गुन पूर्णिमा तिथि पर सूर्यास्त के बाद होलिका दहन करें. फिर देखें कि चैत्र कृष्ण प्रतिपदा तिथि में सूर्योदय किस तारीख को हो रहा है. उस दिन होली मनाएं.

























































