मुंबई। ओटीटी प्लेटफार्म पर निर्भर होते जा रहे दर्शकों को सिनेमाघरों तक लाने और बॉक्स ऑफिस पर शानदार कमाई करने वाली ‘धुरंधर’ फ्रेंचाइज ने हिंदी सिनेमा के फिल्मकारों को हिम्मत तो दी है। कहीं न कहीं यही वजह है कि आज (12 जून) सिनेमाघरों में एक या दो नहीं बल्कि छह फिल्में आमने-सामने हैं। ‘भारत भाग्य विधाता’, ‘मैं वापस आऊंगा’, ‘गवर्नर’, ‘द नर्मदा स्टोरी’, ‘हॉन्टेड 3डी: एकोज ऑफ द पास्ट’ और ‘हीर सारा’ इस कतार में हैं।
देखना दिलचस्प होगा कि क्या ये फिल्में ‘धुरंधर’ की तरह बॉक्स ऑफिस पर सफलता के नए आयाम स्थापित कर पाएंगी?
पब्लिक फिल्म को बड़ा बनाती है: जयंतीलाल गडा
26 नवंबर साल 2008 के दिन मुंबई पर हुए आतंकी हमले के दौरान आतंकियों ने कामा अस्पताल को भी निशाना बनाया था। वहां कि नर्सों ने अपनी जान की परवाह किए बिना गर्भवती महिलाओं की रक्षा की थी और उन्हें प्रसव कराया था। कंगना रनौत अभिनीत फिल्म भारत भाग्य विधाता इसी पर आधारित है।
फिल्म के निर्माता जयंतीलाल गडा कहते हैं कि रिलीज वाले दिन कोई फिल्म छोटी या बड़ी नहीं होती है। पब्लिक उसे बड़ा और छोटा बनाती है। देश से जुड़ी कई कहानियां रही हैं, जो छोटी फिल्में थी, लेकिन दर्शकों ने उसे बड़ा बनाया। वास्तविक घटनाओं पर बनी फिल्मों के लोगों तक पहुंचने के मौके ज्यादा होते हैं। यह फिल्म कमर्शियल फिल्म से अलग है। इसे कमर्शियल एंगल देते तो फिल्म अच्छी नहीं बनती।
भारतीय सिनेमा में हर तरह के सिनेमा के लिए जगह है: चिनमय मंडलेकर
मनोज बाजपेयी अभिनीत फिल्म गर्वनर पूर्व आरबीआई गवर्नर एस. वेंकिटरमणन से प्रेरित है, जिन्होंने 1991 के आर्थिक संकट के दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। फिल्म के निर्देशक चिनमय मंडलेकर कहते हैं कि आज देश की पीढ़ी को देखना चाहिए कि जिस पेड़ का फल वो चख रहे हैं, उसके बीज कब बोए गए थे। दूसरा इत्तेफाक यह है कि 1990 में इराक और अमेरिका के बीच युद्ध हुआ था। पूरी दुनिया में कठिनाई से गुजरी थी, आज ईरान और अमेरिका के बीच युद्द की वजह से फिर उसी स्थिति में हैं।
35 साल पहले जब आर्थिक व्यवस्था बहुत पुख्ता नहीं थी, फिर भी हमारे पॉलिसी मेकर्स ने बड़ी दृढ़ता से उस परिस्थिति का सामना किया था। आज हम बड़ी इकोनॉमी बन चुके हैं, हम इस कठिन परिस्थिति से बाहर निकल जाएंगे। जहां तक बात है कि धुंरधंर की छाया में दूसरी फिल्मों के लिए जगह की तो मेरा हमेशा से मानना रहा है कि भारतीय सिनेमा में हर तरह के सिनेमा के लिए जगह है। धुरंधर से पहले एनिमल, पुष्पा और कांतारा भी दर्शकों को थिएटर लाई। लोग सिनेमाघर आना चाहते हैं, लेकिन उन्हें ऐसा कंटेंट चाहिए जिसका लुत्फ सिनेमाघर में उठा सकें।
इसमें प्यार-मुहब्बत की बातें होंगी : इम्तियाज अली
देश विभाजन की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म मैं वापस आऊंगा (Main Vaapas Aaunga) दो अलग-अलग कालखंडों की कहानी है। निर्माता निर्देशक इम्तियाज अली कहते हैं कि मैं तो दर्शकों को सिनेमाघरों तक लाने के लिए धुरंधर के मेकर (आदित्य धर) की सराहना करना चाहूंगा। उम्मीद करता हूं कि यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा। जहां तक मेरी फिल्म की बात है, तो यह फिल्म दो कालखंड में बनी है। मैं इसे आज की आधुनिक प्रेम कहानी ही कहूंगा, जो विभाजन के दौर में भी जाती है।
इस फिल्म को बनाने का कारण यह है कि ये आखिरी पीढ़ी है, जिसमें विभाजन के दौर से गुजरे लोग हैं। जब वह सीमाएं लांघकर आए थे, तो उस दर्द को भले ही भूल गए हैं, लेकिन उनके दिलों में सीमा पार रह रहे अपनों के लिए प्यार है, वहां के घर और आंगन में लगे पेड़ याद हैं। विभाजन पर गंभीर फिल्में बनती रही हैं, लेकिन इसमें प्यार-मुहब्बत की बातें होंगी।
साल दो साल में ऐसी फिल्में आती हैं, जो बॉक्स ऑफिस पर रिकार्ड बनाती हैं: जैगम इमाम
फिल्म द नर्मदा स्टोरी आईपीएस अधिकारी सिमाला प्रसाद (Simala Prasad) की लिखित एक किताब और उनके अनुभवों से प्रेरित है। जिसमें खुद सिमाला प्रसाद ने महिला सब-इंस्पेक्टर का रोल किया है। इस फिल्म के निर्देशक जैगम इमाम कहते हैं कि कई महिलाप्रधान फिल्में अपने लक्ष्य से भटक जाती हैं, इसमें हमने समाज के अलग-अलग तबके की महिलाओं को प्रमुखता से दिखाया है।
जहां तक बात है कि धुरंधर के बाद दूसरी फिल्मों को दर्शक मिलने की तो धुरंधर की सफलता सिनेमा के लिए बुस्टर का काम कर चुका है। एक बहुत महत्वपूर्ण बात है कि साल-दो साल में ऐसी फिल्में आती हैं, जो बॉक्स ऑफिस पर रिकार्ड बनाती हैं। छावा, एनिमल, धुरंधर जैसी फिल्में मार्केट को प्रोत्साहित करती हैं, लेकिन ऐसा नहीं होता है कि यह ओवरशैडो कर लेंगी, क्योंकि अच्छा सिनेमा तो बनेगा ही। बड़ा सिनेमा समुद्र की तरह है, जहां बडी और छोटी मछली सब साथ रहते हैं।
























































