नई दिल्ली: चन्द्रमा पूर्णिमा का हो अथवा सूर्य से चन्द्रमा 180° दूर यानि सूर्य-चन्द्रमा आमने-सामने हों, तब चन्द्रमा पूर्ण और बहुत शक्तिशाली होता है। लेकिन जब चन्द्र पूर्णमासी के दिन पूर्ण चन्द्र के बिन्दु को आकाश में पार कर लेता है और सूर्य-चन्द्रमा के बीच का अंतर 180° से कम होने लगता है तो चन्द्रमा की शक्ति दिन- प्रतिदिन घटने लगती है, साधारण भाषा में लोग इस अवस्था को घटता हुआ चांद कहते हैं। चांद तब तक घटता रहता है, जब तक वह सूर्य के साथ मिलकर पूर्ण अस्त बिन्दु तक नहीं पहुंच जाता। गणितीय भाषा में जब सूर्य और चन्द्र के भोगांश का अन्तर शून्य डिग्री हो जाता है तो उसे अमावस्या का दिन कहते हैं। इस पखवाड़े को कृष्ण पक्ष कहा जाता है।
सूर्य से चन्द्रमा के दूसरे पक्ष के गोचर की स्थिति एकदम विपरीत होती है। अमावस्या के बाद 0° से अंतर बढ़ने लगता है, चन्द्रमा दिन-प्रतिदिन बल प्राप्त करता जाता है और सूर्य से 180° के अन्तर पर पहुंच कर पूर्ण चन्द्रमा कहलाता है, इस पखवाड़े को शुक्ल पक्ष कहते हैं। सूर्य के भोगांश को जिस क्षण वह पार कर लेता है आगे बढता है, उसे नया चांद, पड़वा या प्रतिपदा तिथि कहते हैं।
खगोलशास्त्री एवं ज्योतिर्विदों के अनुसार शुक्ल पक्ष की अष्टमी से कृष्ण पक्ष की सप्तमी तक चन्द्रमा पूर्ण होता है तथा कृष्ण पक्ष की अष्टमी से शुक्ल पक्ष की सप्तमी तक चन्द्रमा क्षीण होता है। फलादेश की दृष्टि से चन्द्रमा जब पूर्ण हो तभी उसका फल शुभ होता है अन्यथा अशुभ रहता है।
कुछ ज्योतिर्विद शुभ-अशुभ चन्द्रमा के बीच चन्द्रमा के बलाबल की एक मध्य स्थिति भी बताते हैं, शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा दशमी तक चन्द्रमा मध्य बली होता है। दशमी के बाद दस दिनों तक चन्द्रमा अति बलवान होता है। इसके बाद के अन्तिम दस दिन का चन्द्रमा बलहीन हो जाता है और पूरी तरह अशुभ फल देता है। चन्द्रमा के भावफल देखते समय हमेशा यह ध्यान रखना चाहिए कि चन्द्रमा बलहीन हो तो उसका फल अशुभ होता है, मध्यबली हो तो उसका फल सम होता है यानि ऐसी अवस्था में चन्द्रमा न शुभ फल देता है, न अशुभ, परन्तु बलवान होने पर शुभ फल देता है।






























































