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राष्ट्रीय संकट के समय राजपथ से संघ ने दिया एकजुटता का संदेश

by Aam Jan
January 25, 2026
in National, News
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डॉ. लोकेन्द्र सिंह


नई दिल्ली। आज भी हम 1962 के भारत-चीन युद्ध को भूल नहीं पाते हैं। चीन ने भारत के विश्वास का कत्ल किया था। ‘हिन्दी-चीनी, भाई-भाई’ के हमारे नारे को धुंए में उड़ाकर चीन की कम्युनिस्ट सत्ता ने भारत पर अप्रत्याशित युद्ध थोप दिया था। हमारी सेना ने यथासंभव प्रतिकार किया। चीन को नाकों चने चबाने को मजबूर कर दिया। भारतीय सेना के शौर्य को देखकर चीन को अपने कदम रोकने पड़े। हालांकि, इस युद्ध में हमने बहुत कुछ खो दिया था। राष्ट्रीय संकट की इस घड़ी में जब भारत की कम्युनिस्ट पार्टी चीन के साथ खड़ी थी, तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने राष्ट्रीय एकता का महत्वपूर्ण संदेश दिया।

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संघ के स्वयंसेवकों ने नागरिक अनुशासन, प्रशासनिक व्यवस्थाओं में सहयोग, घायल जवानों के प्राणों की रक्षा के लिए रक्त की आपूर्ति, युद्ध क्षेत्र में सैन्य रसद पहुँचाने में सहयोग एवं हवाई पट्टियों की सुरक्षा सहित कई महत्वपूर्ण कार्यों में आगे बढ़कर सहयोग किया। संकट के समय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की देशभक्ति को देखकर संघ के विरोधी रहे तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का हृदय भी परिवर्तित हो गया। यही कारण रहा कि सरकार ने 26 जनवरी, 1963 की गणतंत्र दिवस की परेड में शामिल होने के लिए अन्य

नागरिक संगठनों के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके समविचारी संगठन भारतीय मजदूर संघ को राजपथ पर आमंत्रित किया। संघ के स्वयंसेवकों ने गणवेश पहनकर जब राजपथ पर राष्ट्रीय परेड में हिस्सा लिया, तब स्वयंसेवक न केवल सबके बीच आकर्षण का केंद्र बने अपितु उन्होंने राष्ट्रीय एकजुटता के लिए अपने कर्तव्यों के निर्वहन का संदेश भी दिया।

राजपथ (अब कर्तव्य पथ) 26 जनवरी, 1963 की राष्ट्रीय परेड कई कारणों से महत्वपूर्ण है। 1962 के चीनी आक्रमण के बाद देश का मनोबल डगमगाया हुआ था। ऐसे समय में राष्ट्रीय एकता का प्रदर्शन आवश्यक था। प्रश्न यह था कि जब भारतीय सेना सहित अन्य सुरक्षा बल भी सीमारेखा पर हैं, तब राष्ट्रीय परेड किस प्रकार सम्पन्न की जाए। सुरक्षा कारणों से सेना को वापस भी नहीं बुलाया जा सकता था और राष्ट्रीय परेड की परंपरा को भी नहीं तोड़ सकते थे। तब विचार आया कि उन नागरिक संगठनों को परेड में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया जाए, जिन्होंने इस संकट की घड़ी में देश को संभालने में अपना योगदान दिया है।

लोकसभा में 31 मार्च 1998 को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने यह तथ्य सबके सामने रखा कि ऐसी परिस्थिति में किसी ने प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को सुझाव दिया गया कि इस बार परेड में ‘जनता का मार्च’ होना चाहिए। दिल्ली नगर निगम के महापौर द्वारा स्थापित ‘सर्वदलीय नागरिक परिषद’ ने विभिन्न सामाजिक संस्थाओं को परेड में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया, जिसे संघ के स्थानीय अधिकारियों ने स्वीकार कर लिया। सरकार के आमंत्रण पर, केवल दो दिन की तैयारी में संघ के लगभग 3000 गणवेशधारी स्वयंसेवक राजपथ पर कदम से कदम मिलाकर संचलन कर रहे थे, जिसमें लगभग 100 स्वयंसेवकों का घोष दल भी शामिल था।

स्वयंसेवकों की यह टुकड़ी जिस प्रकार अनुशासनबद्ध होकर राजपथ पर संचलन कर रही थी, भारतीय सेना की अनुशासित टुकड़ी की भाँति ही नजर आ रही थी। अगले दिन समाचार पत्रों में स्वयंसेवकों की तस्वीरें भी प्रकाशित हुईं और संवाददाताओं ने यह भी संकेत दिया कि जनता के बीच सबसे अधिक आकर्षण का केंद्र स्वयंसेवकों का अनुशासित दल ही था। दैनिक समाचारपत्र ‘हिन्दुस्तान’ ने परेड की जो तस्वीरें प्रकाशित की, उसमें स्वयंसेवकों के संचलन की तस्वीर भी शामिल थी। हिन्दुस्तान में प्रकाशित समाचार में लिखा गया कि “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्यों का प्रदर्शन बहुत आकर्षक रहा”। इसी प्रकार, द टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित एक समाचार में उल्लेख किया गया है कि संघ के अनुषांगिक संगठन ‘भारतीय मजदूर संघ’ ने भी परेड में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी।

कुछ वर्षों तक कम्युनिस्ट एवं कांग्रेस समर्थित लेखकों/पत्रकारों ने 1963 के गणतंत्र दिवस की परेड में संघ के शामिल होने को सिरे से खारिज किया। लेकिन, जब उस समय के समाचारपत्रों में प्रकाशित चित्र, समाचार और सिलेक्टिव वर्क्स ऑफ जवाहरलाल नेहरू में प्रकाशित सामग्री सामने आई, तब नये प्रकार के कुतर्क गढ़े जा रहे हैं। इस सबके बीच निर्विवाद सच यही है कि संकट के समय में संघ ने अपने कर्तव्यों का पालन किया और राष्ट्रीय परेड में हिस्सा लेकर राष्ट्रीय एकता का संदेश दिया। संघ विरोधी खेमे में यह खलबली उस समय भी थी, जब यह जानकारी सामने आई कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ राष्ट्रीय परेड में शामिल हो रहा है।

दैनिक समाचारपत्र ‘हिन्दुस्तान’ ने 25 जनवरी, 1963 को “रा. स्व. संघ भी परेड में भाग लेगा” शीर्षक से समाचार प्रकाशित किया। कई लोगों ने संघ के स्वयंसेवकों को रोकने के लिए भरसक प्रयास किए लेकिन उनको सफलता नहीं मिली। प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने ऐसे लोगों को फटकार कर भगा दिया और साफ कहा कि वे संघ को परेड में शामिल होने से नहीं रोक सकते हैं। 27 जनवरी को कांग्रेस की एक बैठक में इस विषय में काफी चर्चा हुई। इसका विवरण सिलेक्टिव वर्क ऑफ जवाहरलाल नेहरू में प्रकाशित है।

बैठक में पंडित नेहरू ने बताया था कि “कुछ कांग्रेसियों ने उनसे शिकायत की थी कि संघ वाले गाजियाबाद और मेरठ से वर्दीधारी लोग (स्वयंसेवक) जमा कर रहे हैं”। कांग्रेस के नेताओं ने पंडित के सामने यह दु:ख भी जाहिर किया कि हमारे पास इतनी वर्दी नहीं है। कांग्रेस सेवा दल के कार्यकर्ता भी परेड में दिखायी नहीं दिए। तब प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने उन लोगों को स्पष्ट कहा कि “मैं तो नहीं रोक सकता आरएसएस को आने से, (किसी को भी आने से रोकना) बहुत गलत बात है”। इसका अर्थ है कि सब प्रकार से जानकारी होने और कांग्रेसियों का विरोध होने के बाद भी नेहरू जी ने संघ को राष्ट्रीय परेड में शामिल होने दिया।

याद रखें कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने 1962 के युद्ध के समय ही नहीं बल्कि उसके बाद हुए युद्धों में भी भारत सरकार के साथ खड़े रहकर अपने राष्ट्रीय कर्तव्य का निर्वहन किया है। 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में भी संघ ने दिल्ली की यातायात व्यवस्था, रणनीतिक ठिकानों की पहरेदारी, सैनिकों के लिए भोजन एवं रसद की आपूर्ति, नागरिक सुरक्षा एवं अनुशासन का पालन कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। तत्कालीन गृहमंत्री गुलजारीलाल नंदा ने स्वयंसेवकों के कार्य की सार्वजनिक रूप से प्रशंसा की और आकाशवाणी पर उनके योगदान का जिक्र किया। याद हो कि युद्ध प्रारंभ होते ही राष्ट्रीय सुरक्षा के संबंध में तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर ‘श्रीगुरुजी’ के साथ ऐतिहासिक चर्चा भी की थी।

1971 के युद्ध के दौरान सैनिकों के लिए 24 घंटे भोजन एवं दवा की आपूर्ति, अपनी जान बचाकर भारत आए हिन्दू एवं मुस्लिम शरणार्थियों के लिए राहत शिविर, युद्ध में घायलों के लिए रक्तदान महायज्ञ और हवाई पट्टियों की मरम्मत जैसे कार्य स्वयंसेवकों ने किए। उनकी देशभक्ति एवं निस्वार्थ सेवाभाव को देखकर सेना प्रमुख जनरल (बाद में फील्ड मार्शल) सैम मानेकशॉ ने कहा था कि “इन युवाओं की निस्वार्थ सेवा, फुर्ती और अनुशासन देखकर मुझे गर्व होता है। अगर सेना के बाद देश में कोई सबसे अनुशासित संगठन है, तो वह यही है”। कहना होगा कि प्राकृतिक, मानवीय आपदा से लेकर किसी भी प्रकार के राष्ट्रीय संकट के समय में संघ सिद्ध करता है कि वह सच्चे अर्थों में राष्ट्रीय विचार का संगठन है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर भारत सरकार ने जिस स्मृति डाक टिकट को जारी किया है, उसमें भी 1963 की गणतंत्र दिवस में शामिल स्वयंसेवकों के समूह का चित्र शामिल किया गया है। इसके साथ ही एक दूसरे चित्र में सेवा एवं राहत कार्य करते स्वयंसेवक दिखायी दे रहे हैं। संघ शताब्दी वर्ष के प्रसंग पर सरकार ने एक बार फिर ‘राष्ट्र सेवा के 100 वर्ष’ की संघ यात्रा का स्मरण देशवासियों को कराया।


लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं।

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