नई दिल्ली। वास्तुशास्त्र के प्रभाव को स्वीकार करे या न करे, लेकिन प्रत्येक भूखण्ड, भवन की संरचना एक विशिष्ट दिशा-विन्यास के अनुसार होती है। वास्तु के अनुसार विभिन्न दिशाओं, स्थानों का संबंध विशिष्ट ग्रहों तथा देवी-देवताओं से माना गया है। ऐसे में यदि किसी स्थान विशेष में वास्तु दोष उत्पन्न हो जाए, तो उससे संबंधित ग्रहों या देवताओं के उपाय करने से सकारात्मक परिणाम प्राप्त हो सकते हैं और जीवन की अनेक बाधाओं में राहत मिल सकती है।
प्रत्येक घर या भूखंड में अनेकानेक देवताओं के साथ-साथ नवग्रहों का स्थान भी सुनिश्चित रहता है। पूर्व दिशा भगवान सूर्य की, उत्तर-पूर्व दिशा देवगुरु बृहस्पति और मोक्षकारक केतु की, उत्तर दिशा बुध ग्रह की, दक्षिण-पश्चिम दिशा छाया ग्रह राहु की, दक्षिण दिशा मंगल ग्रह की, पश्चिम दिशा शनि ग्रह की, उत्तर- पश्चिम दिशा चन्द्रमा की तथा दक्षिण-पूर्व दैत्यगुरु शुक्राचार्य की दिशा है। इसी प्रकार पूर्व में इन्द्रदेव, ईशान में स्वयं भगवान शिव, उत्तर में श्री गणेश, कुबेर व भगवान विष्णु, वायव्य में वायुदेव, पश्चिम में वरुणदेव, नैऋत्य में पितृदेव, दक्षिण में यमराज, आग्नेय में अग्निदेव तथा ब्रह्मस्थान में ब्रह्मा जी विराजमान हैं।
घर का कोना और देवताओं का स्थान
घर के प्रत्येक स्थान पर इन ग्रहों और देवताओं की प्रवृत्ति के अनुसार कार्य करने से सुख समृद्धि और विपरीत करने से दुख का भागीदार बनना पड़ता है। जब नवग्रह और देवता घर की दिशाओं में उपस्थित हैं तब यह स्पष्ट हो जाता है कि इन दिशाओं का प्रत्येक घर में होना भी आवश्यक है, यह तब ही हो सकता है जब घर या भूखंड चौरस या आयताकार आकार में रहे। वास्तु सिद्धान्त के अनुसार भूखण्ड का चौरस या आयताकार होना सर्वाधिक शुभ है क्योंकि ऐसे में प्रत्येक विदिशा का कोण 90 डिग्री होता है।
भूमि का आकार और राहु दोष
चौरस या आयताकार न होने पर कोई न कोई दिशा कटी हुई या गायब रहती है। जब दिशा ही कट गयी तो संबंधित ग्रह और देवता की कृपा में भी न्यूनता आ जाती है। उदाहरण, मान लीजिए कि आपने एक भूखण्ड खरीदा, उस भूखण्ड का दक्षिण-पश्चिम कोना यानि नैऋत्य कोण कटा हुआ है। ऐसे में मकान मालिक की जन्मकुण्डली में अधिकतर पितृदोष तथा पीड़ित राहु मिलता है।
वास्तु का करियर पर प्रभाव
नैऋत्य पृथ्वी तत्व और स्थिरता का भी द्योतक है। इस कोने के गायब होने से मकान मालिक को मानसिक उलझनें, नौकरी-पेशे में अस्थिरता एवं बाधा, लंबे अरसे तक चलने वाली बीमारियां, कष्टों का सामना करना पड़ता है। राहु की महादशा अथवा अन्तर्दशा आने पर ये परेशानियां और बढ़ जाती हैं। अक्सर यह देखा गया है कि राहु की दशा आने पर मकान मालिक राहु संबंधित नैऋत्य कोण में अकारण और आकस्मिक फेरबदल कर उसे और विकृत कर डालते हैं।


























































