नई दिल्ली। वास्तुशास्त्र में घर के मध्य भाग यानी ‘ब्रह्म स्थान’ को लेकर आम जनमानस में कई तरह की भ्रांतियां और डर व्याप्त हैं। अक्सर लोग सोचते हैं कि यदि ब्रह्म स्थान में सीढ़ियां, बीम, कॉलम या कोई दीवार आ गई, तो यह भारी वास्तु दोष का कारण बनेगा। लेकिन क्या आप जानते हैं कि प्राचीन ग्रंथों के लिखे जाने के समय और आज के दौर की वास्तुकला में जमीन-आसमान का अंतर आ चुका है?
प्राचीन काल में घर के बीच में खुला आंगन होता था, जबकि आज के आधुनिक फ्लैटों और मल्टी-स्टोरी इमारतों में पूरा फ्लोर छत से ढका होता है। ऐसे में पुराने नियमों को ज्यों का त्यों लागू करना न केवल मुश्किल है, बल्कि कई बार अनावश्यक भी होता है। आइए जानते हैं आधुनिक वास्तु के संदर्भ में ब्रह्म स्थान से जुड़ी उन सच्चाइयों को जो आपकी आर्थिक और मानसिक शांति को प्रभावित कर सकती हैं।
जनसामान्य में ब्रह्म स्थान को लेकर बहुत भ्रांतियां हैं, जैसे ब्रह्म स्थान में सीढ़ियां नहीं होनी चाहिए, बीम नहीं होना चाहिए, काॅलम नहीं होना चाहिए, दीवार नहीं होना चाहिए, भारी नहीं होना चाहिए, इत्यादि। जब वास्तुशास्त्र के प्राचीन ग्रंथ लिखे गए थे तब भवन की बनावट अलग होती थी। प्राचीन समय में घर के मध्य में आंगन होता था और आस-पास कमरे होते थे। वर्तमान में जो भवन बन रहे हैं उनमें पार्किंग, लॉन इत्यादि के लिए आस-पास खाली जगह रखते हुए मध्य में घर बनाये जा रहे हैं।
इसीलिए वर्तमान में भवन की बनावट प्राचीन काल के भवन से विपरीत हो चुकी है। ऐसे में घर बनाते समय ब्रह्म स्थान को लेकर विचार करने की जरूरत ही नहीं है। सामान्यतः घरों में और मल्टी स्टोरी बिल्डिंग में पूरे फ्लोर पर छत होती है, मध्य में कोई ओपन स्पेस नहीं होता है और यदि डक्ट होता भी है तो उसे लोहे के जाल या प्लास्टिक की छत से कवर कर दिया जाता है ताकि बरसात का पानी घर में न आ सके।
इसी प्रकार जब वास्तु के ग्रंथ लिखे गये थे, उस समय सीढ़ियां पूरी तरह ठोस बनाई जाती थीं, सीढ़ियों के ठोस होने के कारण यह बहुत भारी बनती थीं, इसीलिए ही उन ग्रंथों में इन्हें केवल दक्षिण पश्चिम में बनाने की सलाह दी गई। वर्तमान में सीढ़ियां स्लैब डालकर बनाई जाती हैं, जोकि नीचे से खोखली होती हैं, ठोस नहीं होती। इस कारण वर्तमान में सीढ़ियां सुविधा अनुसार कहीं भी बनाई जा सकती है और बनाई भी जा रही है यहां तक कि ब्रह्म स्थान में भी।
प्राचीनकाल में भवन के अंदर जो आंगन बनाया जाता था उसकी भी एक बहुत बड़ी समस्या थी जो वर्तमान में भी कई प्राचीन घरों, स्कूल, आॉफिस, आश्रम, इत्यादि के मध्य में आंगन देखने को मिलती हैं, जिसके चारों ओर भवन बना होता है। सामान्यतः आंगन का फर्श भवन के बाकी भाग के फर्श से 4-6 इंच नीचे होता है, पाइपलाइन द्वारा या नाली द्वारा इसका पानी भवन के बाहर निकाला जाता है, ताकि आंगन का पानी बहकर भवन में बने आस-पास के कमरों में न आए। आंगन की यह बनावट वास्तुदोष पूर्ण होती है, क्योंकि इस प्रकार के आंगन होने से भवन के मध्य में गड्ढा बन जाता है। वास्तुशास्त्र के अनुसार भवन के मध्य में गड्ढा आर्थिक रूप से सर्वनाश करता है। पैसे की बर्बादी करवाता है। अनावश्यक खर्च के हालात पैदा करता है।
यदि भवन के मध्य अर्थात ब्रह्म स्थान में आंगन बनाना हो तो आंगन के फर्श का लेवल भवन के बाकी फर्श के बराबर ही रखा जाना चाहिए। कुछ आंगन इस प्रकार होते हैं, जिसके थोड़े भाग पर भवन निर्माण न कर अंदर आने का रास्ता भी रखा जाता है, जहां सड़क से अंदर तक वाहन से भी आया-जाया जा सकता है। इस प्रकार बने आंगन में गड्ढा मध्य के गड्ढे की तरह परिणाम नहीं देता, लेकिन यह पैसेज किस दिशा में बना है उस दिशा की नीचाई और ऊंचाई और उसका प्रभाव वहां रहने वालों पर जरूर पड़ेगा।



























































